Book Title: Apbhramsa Bharti 2014 21
Author(s): Kamalchand Sogani
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 56
________________ अपभ्रंश भारती 21 43 (को चढ़ाने के) कारण तुम उनको तोड़ते हो वह शिव तो शरीर में ही विराजमान है अतः यहीं चढ़ा दे (161)। इसप्रकार मुनिश्री ने पत्ती, फल, फूल, तिल आदि सचित्त द्रव्य से पूजा का निषेध किया। कदाचित् पंचामृत अभिषेक की क्रिया उनके अनुभव में आती तो वे उसका भी निषेध करते। अहिंसा की साधना बहुत सूक्ष्म और गूढ़ है, साधक को उसका रहस्य समझना आवश्यक है। प्रत्यक्ष हिंसक साधनों से अहिंसा की उपासना करना विरोधी-प्रतिगामी कृत्य है। मुनिश्री रामसिंह ने दोहापाहुड में कुछ महत्त्वपूर्ण शब्दों की व्याख्या की है जो मननीय है, यथा - स्वभाव - अग्नि के संस्कार से शंख की सफेदी नष्ट नहीं होती, यह निःशंक समझो। अन्य किसी से मिलकर कोई अपना गुण नहीं छोड़ता। स्वभाव सदा एकरूप रहता है (150)। द्रव्यलिंग - जिस प्रकार साँप केंचुली छोड़ देता है, लेकिन विष नहीं छोड़ता है; उसीप्रकार अज्ञानी जीव द्रव्यलिंग धारण कर भीतर में विषय-भोगों की भावना नहीं छोड़ता (16)। __ मूलगुण - जो साधु मूलगुणों को खण्डित कर उत्तर गुणों से अलग हो जाता है वह डाल से चूके हुए बन्दर के समान बहुत नीचे गिर कर घायल/भग्न हो जाता है (21)। ' यति - हे आत्मन्! एक अपनी आत्मा को छोड़कर अन्य कोई वैरी नहीं है। जिस भाव (राग-द्वेष-मोह) के द्वारा कर्म निर्मित हुए हैं, उस पर-भाव को जो फेंट देता है, मिटा देता है, (वास्तव में) वही यति है (118)। निर्वाण - मन का व्यापार नाश होने तथा राग-द्वेष के अभाव होने पर आत्मा के परमपद में स्थित होते ही अतीन्द्रिय ज्ञान-परमानन्दमय जो (अविचल) अवस्था है, वही निर्वाण है (205)। योग - व्यवहार में श्वास को जीत लिया, नेत्र निश्चल हो गये, सभी व्यापार छूट जाने पर (निर्विकल्प आत्म-ज्ञान की) जो अवस्था होती है वह योग

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