Book Title: Apbhramsa Bharti 2014 21
Author(s): Kamalchand Sogani
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

View full book text
Previous | Next

Page 109
________________ 96 2.3 2.4 2.5 अवसप्पिणि उवसप्पणि य होइ हिं सुसमु-सुसमु णामेण कालि अवयरिउ पहिल्लाउ सुह विसालु तर्हि तिण्ण कोस देहु पमाणु आउसु do वि तिण्णि पल्लई वियाणु तहि कालि सयलु यहु भरहु खेत्तु कप्प छायउ विचित्तु अवसर्पिणी उत्सर्पिणी और होते हैं तब सुषमु- सुषमु (सुखमा - सुखमा) नाम से काल / समय आया पहला, प्रथम सुख उत्तम व्यापक उस (काल) में तीन को देह का प्रमाण (आकार) आयुष्य, आयु भी तीन पल्य जानो उस काल में समस्त यह भरत क्षेत्र कल्पवृक्षों द्वारा आच्छादित अद्भुत अपभ्रंश भारती 21

Loading...

Page Navigation
1 ... 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126