Book Title: Apbhramsa Bharti 2014 21
Author(s): Kamalchand Sogani
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 103
________________ 90 अपभ्रंश भारती 21 शब्दार्थ 1.1 अर्थ जहाँ, जिसमें होऊँगा भव-भव में वहाँ शब्द जहिं होहम्मि भवे-भवे तहि देहम्मि णवे-णवे दुक्ख लक्ख णिणासणे होउ भंति जिणसासणे अवरु णिरंतर उज्झिय गव्हें देह में नये-नये/नई-नई दुःख (के) लक्ष्य विनाश में/विनाश के लिए होवे 1.2 भक्ति/श्रद्धा जिनशासन में अन्य, दूसरे निरंतर, व्यवधान-रहित परित्यक्त, विमुक्त मान से, अहंकार से इय मग्गेवउ मणुएं भब्वें 1.3 चित्तु माँगा जाना चाहिये मनुष्य भव में चित्त, मन वंचक, धोखा देनेवाले सिद्धान्त विमुख, उदासीन भव-भव में धुत्त सिद्धत परम्मुहुं भवि-भवि होउ जिणागमे सम्मुहुं पंचिदिय होवे जैन-शास्त्रों में सम्मुख, अभिमुख पाँचों इन्द्रियों (स्पर्शन-त्वचा, रसना-जीभ, घ्राण-नाक, चक्षु-आँख व श्रोत-कान) 1.4

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