Book Title: Apbhramsa Bharti 2014 21
Author(s): Kamalchand Sogani
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 55
________________ अपभ्रंश भारती 21 का ध्यान करने से निर्वाण पद मिलता है (179)। देह-देवालय में शिव का निवास है। तुम तीर्थ और मन्दिरों में उसे खोज रहे हो, फिर भी नहीं पा सके। (180,187)। जिससे विशेष बोध (आत्मज्ञान) उत्पन्न न हो, तीनलोक को जानने की शक्ति न मिले उस बहिर्मुखी ज्ञान से जीव अज्ञानी-बहिरात्मा रहता है। वह अशुभ परिणाम वाला है (83)। व्याख्यान करनेवाले विद्वान ने यदि आत्मा में चित्त नहीं लगाया तो उसका ज्ञान अनाजरहित घास (भूसा) संग्रह करने जैसा होगा। हे श्रेष्ठ पंडित! तुमने कण को छोड़ भूसे को कूटा है। तुम ग्रन्थ और उसके अर्थ में संतुष्ट हो, किन्तु परमार्थ (शुद्धात्मानुभव) के नहीं जानने से मूढ़ हो (86)। शब्दों को पढ़कर गर्व करनेवाले मूल भाव नहीं समझते हैं, वे वंशविहीन डोम के समान सिर धुनते हैं (87)। हे मूर्ख? बहुत पढ़ा, जिससे रटते-रटते तालू सूख गया। लेकिन उस एक अक्षर (आत्मा) को पढ़ ले जिससे शिवपुर में गमन हो सके। (98) हे मूर्ख? बहुत अक्षर (पढ़ने) से क्या लाभ, क्योंकि वे कुछ समय में क्षय को प्राप्त हो जावेंगे। जिससे मुनि अनक्षर (क्षयरहित) हो जाए, उस अक्षयता को मोक्ष कहते हैं (125)। अशुद्ध मन से शास्त्र पढ़ने से मोक्ष नहीं होता। वध करनेवाले शिकारी को भी हरिण के सामने झुकना पड़ता है। विनय (शुद्धभाव) भावपूर्वक ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है (147)। आचार्य कुन्दकुन्द ने भी शास्त्र-ज्ञान को ज्ञान नहीं माना (स. सार 390)। हे मूर्ख! बहुत पढ़ने से क्या? आत्मज्ञान (ज्ञान-स्फुलिंग) की शिक्षा प्राप्त कर जिसके प्रज्वलित होने पर क्षणभर में पुण्य-पाप भस्म हो जाते हैं (88)। धार्मिक क्रियाओं में अहिंसा की स्थापना हेतु मुनिश्री रामसिंह ने वनस्पतिएकेन्द्रिय जीवों की रक्षा का प्रभावी प्रतिपादन किया। उन्होंने कहा कि - मोह के आधीन होकर तुम सहसा पत्तियों को तड़ातड़ तोड़ रहे हो, मानो ऊँट ने ही प्रवेश किया हो। तुम नहीं जानते कि कौन तोड़ता है और कौन टूटता है (159)। पत्ती, पानी, दाभ, तिल आदि को अपने समान प्राणवान समझो। जो यदि मुक्ति को प्राप्त करना चाहते हो तो एकेन्द्रिय-हिंसा को छोड़ (160)। हे जोगी? भगवान की पूजा के लिए पत्ते मत तोड़ो और फलों को भी हाथ मत लगाओ। जिस

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