Book Title: Apbhramsa Bharti 2014 21
Author(s): Kamalchand Sogani
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 89
________________ अपभ्रंश भारती 21 भोग-भूमि/काल की समाप्ति तथा कर्मभूमि की ओर अग्रसर है। इस काल में कल्पवृक्ष समाप्त होने लगते हैं। इस काल की कुछ अवधि (1/8 पल्य) शेष रहने पर कुलकरों की उत्पत्ति प्रारंभ हो जाती है, कुल चौदह कुलकर उत्पन्न होते हैं, जो मनुष्यों को कर्म द्वारा जीवन-यापन की शिक्षा देते हैं, नई व्यवस्थाएँ करते हैं। 4. दुसमा-सुसमा (दुखमा-सुखमा) इस काल में सुख कम होने लगते हैं, दुःख बढ़ने लगते हैं। कल्पवृक्ष समाप्त हो जाते हैं। तब इन्हें कुलकरों द्वारा असि (शस्त्र विद्या), मसि (लेखन विद्या), कृषि (खेती), विद्या (गान-नृत्य आदि), वाणिज्य (व्यापार) और शिल्प (हस्तकला) इन छः कर्मों के द्वारा जीवन-यापन करना सिखाया जाता है। इस काल में त्रेसठ शलाका पुरुष - 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती, 9 बलभद्र, 9 नारायण, 9 प्रतिनारायण जन्म लेते हैं। इस काल की अवधि एक कोडाकोडी सागर (में 42,000 वर्ष कम) होती है। 5. दुसमा (दुखमा) ___ इस काल में दुःख की अधिकता होती जाती है। वर्तमान में यही काल (अवसर्पिणी का पंचम काल - दुसमा) वर्त रहा है। इस काल की अवधि 21,000 वर्ष है। इस अवसर्पिणी के अन्तिम (चौबीसवें) तीर्थंकर महावीर के मोक्ष प्राप्ति के तीन वर्ष, आठ माह व एक पक्ष के पश्चात् यह काल प्रारंभ हुआ था। इस समय पंचम काल के लगभग 2537 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। इस काल में मनुष्यों की ऊँचाई, बल व आयु घटती जाती है। अधिकतम आयु 120 वर्ष तथा ऊँचाई सात हाथ तक हो सकती है। 6. दुसमा-दुसमा (दुखमा-दुखमा) इस काल में दुःख ही दुःख होता है। इस काल में अग्नि का ह्रास हो जाने के कारण मनुष्य ‘कच्चा' भोजन ही करते हैं, दुराचारी व दरिद्री होते हैं,

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