Book Title: Apbhramsa Bharti 2014 21
Author(s): Kamalchand Sogani
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 95
________________ 82 अपभ्रंश भारती 21 घत्ता- आहरण विहूसिय देहहिं। विलसहि मिहुणइ विविह सुहु। णवि कोहु मोहु भउ आवइ। णवि जर-मरण अकालि तहो।।।(1) 3. तहो कालहो पछइ सुसमु कालु। उप्पण्णु आसि वहु सुह विसालु।।।। उच्चत्तु आसि दुइ कोस देहु। णवि इट्ठ-विउ ण कोहु मोह।।2।। पल्लोपम तहि दुइ आसि आउ। जणु वसइ सयलु सुह जणिय भाउ॥3॥ - सो कोडाकोडिउ तिण्णि जाम। सायरहि कहिउ इह भरहि ताम।।4।। दह भेय कप्पतर वर विचित्त। आहार देहिं दिवि दिवि णिचिंत्त।।।। सेज्जासणु तरवर केवि दिति। उज्जोउ केइ रयणिहिं करंति।।6।। खज्जूर दाख वह रस सुयंधु। तरु देहिं म जु जुयलहिं सुयंधु।।7।। सोलह आहरण पमाण घडिया। संपाडहिं तरुवर रयण जडिया॥8॥ णाणा पयारु परिमलु वहंतु। तहं देहि वत्थ जुयलहं महंतु।।७।। घत्ता-जं अण्ण भवंतरि भावें। दाणु सुपत्तहं दिण्णउ। तं कप्पमहातरु वेसिं। तित्थु पुण्णि उप्पण्णउं।।101(2)

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