Book Title: Apbhramsa Bharti 2014 21
Author(s): Kamalchand Sogani
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 93
________________ अपभ्रंश भारती 21 दसण-णाण-चरित्त पयासें। भवे भवे मरणु होउ सण्णासें।।14।। मित्तहं रिउहं विसम चित्तहिं। विसम परीसह सहणुब्भासहिं। रोया तं कहिं कासहिं सासहि।।15।। जम्मण-मरण णिवंधे आइउ। एम खविजइ कम्मु पुराइउ।।16।। घत्ता- जिह हय णिज्झरणे, बद्धे चरणे, रवि करेहिं सरु सोसइ। तिह णियमिय करणे, रिसि तवचरणें, भव किउ कम्मु पणासइ।।॥ खंड्यं 2. अवसप्पिणि-उवसप्पिणिहिं। छह भेयहिं जहिं संट्ठियउ। कहि कालु चक्कु परमेसर। कहियह वहइअ णिठ्ठियउ।।।। परमेसरेण रविकित्ति वुत्तु। पढमाणिर्ड उ सुणि एय चित्तु।।।।। दह खेत्तहि भरहेरावएहिं। अवसप्पिणि उवसप्पिणि य होइ।।2।। तहिं सुसमुसुसमु णामेण कालि। अवयरिउ पहिल्लउ सुहविसालु।।3।। तहिं तिष्णिकोस देहहु पमाणु। आउसु वि तिण्णि पल्लई वियाणु।।4।। तहि कालि सयलु यह भरहु खेत्तु। कप्पडुमेहिं छायउ विचित्तु।।5।। रवि चंदु करहि तहिं पसरु णाहिं। कप्पहुमेहिं णर विद्धि जाहिं।।6।। इह भोयभूमि समसरिसु आसि। अणुहवहिं जीव वहु सुहहं रासि।।7॥ तहो कोडाकोडि चयारिमाणु। सायरहं कहिउ जु यलहं पमाणु॥8॥

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