Book Title: Apbhramsa Bharti 2014 21
Author(s): Kamalchand Sogani
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 97
________________ 84 अपभ्रंश भारती 21 4. उप्पण्णउ तिज्जउ कालु आसि । किंचूण किंप्पि सो सुक्खरासि ।।1।। तो सुसमुदुसमु इहु कहिउ जाउ । जणु कालवसें मणे किसिय काउ ।।2।। तहि एक्क पल्लु आवसु कहंति । अवसाणि पिंडु छिंकइ मुयंति ॥3॥ उप्पजहि जायवि सग्ग लोइ । पल्लोपम आउसु एक्क होइ ||4|| जे जयल भोयभूमिहि मरंति । खीरोवहि पिंडु विंतर खिवंति।।5।। अवसप्पिणि आयहिं तिण्णि काल । वर भोयभूमिसम सुह विसाल ।।6।। अवसप्पिण्णिए अवसाणि होंति । वढत्तु आउ सुहु अणुहवंति ।। 7 । उच्चत्त आसि तहि कालि कोसु । गउ कोडाकोडिउ दुइ असेसु ॥ 8 ॥ घत्ता- अवसाणि तासु वहु लक्खण। कुल गुण णय संपुण्ण । इह भरहि चउद्दह कुलयर। आसि पुव्वि उप्पण्ण । । १ ।। (3) 5. कुलयरहं णिवेसिय देसगाम । कुल गोत सीम किय पुर पगाम।। 1 ।। परिगलिय तिण्णि तहि काल एम। अणुकम्मेण भरहि अवयरिय जेम ॥ 2 ॥ चउथ पुणु कालु कमेण आउ । उप्पण्णु जणहो तहि धम्म भाउ ।।3।। तो दुसमुसुसमु इहु गाउ कहिउ । वा याल वरिस सहसेहिं रहिउ ।।4।। सो एक्क कोडिकोडिहिं वूहु । सायरहं गणिउ कालहं समूह ||5|

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