Book Title: Apbhramsa Bharti 2014 21
Author(s): Kamalchand Sogani
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

View full book text
Previous | Next

Page 58
________________ अपभ्रंश भारती 21 मोक्षमार्ग - व्यावहारिक दृष्टिकोण मुनि रामसिंह कहते हैं - हे जीव? इन्द्रियों के विषय और मोह को छोड़कर आत्मा-परमात्मा का निशिदिन ध्यान करने से यह कार्य होगा (203)। विशेषरूप से आत्म-साधनपूर्वक उपवास करने से संवर होता है। उपवास (आत्मा की समीपता) करने से अग्नि प्रदीप्त होती है जो देह को संतापित करती है। इन्द्रियों का घर उससे जल जाता है जो मोक्ष का कारण है (208/215)। हे जीव? तपपूर्वक जिनेन्द्र भगवान द्वारा कथित दशधर्मों का पालन कर, जिससे कर्मों की निर्जरा हो। उत्तम क्षमादि दशप्रकार का धर्म, जिसमें अहिंसा का सार है, उस धर्म की एकाग्र मन से भावना भाओ (209/210)। भव-भव में निर्दोष-निर्मल सम्यग्दर्शन हो, भव-मन में समाधि करूँ और भव-भव में मानसिक व्याधियों को दूर करनेवाले • ऋषि मेरे गुरु हों, ऐसी भावना कर (211)। हे जीव? एकाग्र मन से अनित्यादि बारह भावनाओं की भावना कर। इससे मुक्ति की प्राप्ति होती है, ऐसा मुनि रामसिंह कहते हैं (212)। हे जोगी? जिसका तप का दामन (बन्धन) है, व्रत का नियम से साज है तथा शम-दम की जीन (पलेंचा) है वह मनरूपी ऊँट संयमरूपी घर में उदासीन हुआ निर्वाण को प्राप्त होता है (114)। हे जोगी? जिसे शुद्धात्मानुभव रूपी हीरा मिल जाये उसे आत्मरूपी वस्त्र में बाँध कर एकान्त में अवलोकन करना चाहिये (217)। कोई ज्ञानी दयारहित धर्म का पालन नहीं करता, पानी बिलोने से क्या हाथ चिकना होता है (148)? चन्द्रमा पोषण करता है, सूर्य प्रज्वलित करता है, पवन हिलोरें लेता है, किन्तु सात राजूप्रमाण अन्धकार को भी पेल कर काल कर्मों को निगल लेता है (220)। इनसे अपनी रक्षा करें मुनि रामसिंह कहते हैं कि दुष्टों की संगति करने से भले लोगों के भी गुण नष्ट हो जाते हैं। अग्नि के साथ लोहा भी घनों से पिटता है (149)। वाद-विवाद करने पर जिनकी भ्रांति नहीं मिटती और स्व-प्रशंसा में मग्न है, वे भ्रान्त हुए भ्रमण ही करते रहते हैं, उनसे बचें (218)। मुनि रामसिंह कृत अपभ्रंश की कृति पाहुडदोहा अध्यात्म और रहस्यवाद की स्वानुभव-प्रधान अद्भुत रचना है। उसके माध्यम से पाठकों को स्व-शिव की अनुभूति हो, इस भावना से विराम लेता हूँ। वीर शासन जयवन्त हो।

Loading...

Page Navigation
1 ... 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126