Book Title: Agam Sudha Sindhu Part 02 of 01
Author(s): Jinendravijay Gani
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala
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________________ श्रीमत्सूत्रकृताङ्ग-सूत्रम् : श्रुतस्कंधः 2 अध्ययनं 2 ] [ 215 करेह इमं कनछिराणयं करेह इमं नक्कयो?सीसमुहछिन्नयं करेह वेयगछहियं अंगछहियं पक्खाफोडियं करेह इमं णयणुपाडियं करेह इमं दंसणुप्पाडियं वसणुप्पाडियं जिन्भुप्पाडियं अोलंबियं करेह घसियं करेह घोलियं करेह सूलाइयं करेह सूलाभिनयं करेह खारवत्तियं करेह वझवत्तियं करेह सीहपुच्छियगं करेह वसभपुच्छियगं करेह दवग्गि(कडग्गि)दड्डयंगं कागणिमंसखावियगं भत्तपाणनिरुद्धग इमं जावजीवं वहबंधणं करेह इमं अन्नयरेणं असुभेणं कुमारेणं मारेह 5 // जावि य से अभितरिया परिसा भवइ, तंजहा-माया इवां पिया इवा भाया इवा भगिणी इ वा भन्जा इ वा पुत्ता इ वा धूता इ वा सुराहा इवा, तेसिपि य णं अन्नयरंसि ग्रहालहुगंसि अवराहसि सयमेव गरुयं दंडं णिवत्तेइ, सीयोदगवियङसि उच्छोलित्ता भवइ जहा मित्तदोसवत्तिए जाव अहिए परंसि लोगंसि, ते दुक्खंति सोयंतिजूरंति तिप्पंति पिटंति परितप्पंति ते दुक्खण मोयणजूरणतिप्पणपिट्टणपरितप्पणवहबंधणपरिकिलेसायो अपडिविरया भवंति 6 // एवमेव ते इत्थिकामहिं मुच्छिया गिद्धा गढिया अज्झोववन्ना जाव वामाई चउपंचमाइं छहसमाई वा अप्पतरो वा भुजतरो वा कालं भुजित्तु भोगभोगाइं पविसुइत्ता वेरायतणाई संचिणित्ता बहूई पावाई कम्माइं उस्सन्नाइं संभारकडेण कम्मणा से जहाणामए अयगोले इ वा सेलगोले इ वा उदगंसि पक्खित्ते समाणे उदगतलमइवइत्ता अहे धरणितलपइट्ठाणे भवइ 7 / एवमेव तहप्पगारे पुरिसजाते वजबहुले धूतबहुले पंकबहुले वेरबहुले अप्पत्तियवहुले दंभवहुले णियडिबहुलं साइबहुले अयसबहुले उस्सन्नतसपाणघाती कालमासे कालं किच्चा धरणितलमइवइत्ता अहे णरगतलपइट्ठाणे भवइ 8 // सूत्रं 35 // ते णं णरगा अंतो वट्टा बाहिं चउरंसा ग्रहे खुरप्पसंठाणसंठिया णिच्चंधतमसा (णिच्चंधकारतमसा) ववगयगहचंदसूरनक्खत्तजोइसप्पहा मेदवसामसरुहिरप्यपडलचिक्खिललित्ताणुलेवणतला असुई वीमा परमदुभिगंधा कराहा अगणिवन्नाभा कक्खडफामा दुरहियासा असुभा
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