Book Title: Stuti Tarangini Part 03
Author(s): Bhadrankarsuri
Publisher: Labdhi Bhuvan Jain Sahitya Sadan

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Page 418
________________ अज्ञातकर्तृक प्राकृत श्री स्तुति चतुर्विंशतिका । (शार्दूलविक्रीडितम् ) । जो चामीयरकंति-कायकलिओ जो सोम-सोमाणणो, जो नीलुप्पलपत्रवननयनो जो लोयणाणंदणो । जो संसारसमुद्दतारणतरी जो तारहारुजलो, सो नामेयजिणो जगुत्तम-जसो दिजा सुहं सासयं ॥१॥ उक्खित्तामलकुंभभासुरकरा दिपंतदेहप्पहा, . सेले हेममयंमि भत्तिभरिया चोसहिदेवेसरा । नाणातूरवोह-परियनहा न्हाविसु जं सो जिणो, . अम्हाणं जियसत्तुरायतणओ दिजाजिओ मंगलं ॥२॥ जं चकंकुसपंकयं-कियतला जे सोणपीणंगुली, जे आयंबनहप्पहापरिगया जे कुम्मजम्मुन्नया । जे भावेण य पाणिकप्पतरुणो जे पूयपावोदया, जे पाया जिणसंभवस्स सरणं मे हुन्तुऽसंताभया ॥३॥ जो संकंदणविंद-वदियपओ सव्वंगचंगप्पहो, सिद्धत्थामणमोयणो मुणिजणासेविजमाणकमो । लोयालोयविलोयणोवममहा-नाणो चउत्थो जिणो, हुजा मे अभिनंदणो पइदिणं कल्लाणमालाकरो ॥४॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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