Book Title: Shrutsagar Ank 2013 03 026
Author(s): Mukeshbhai N Shah and Others
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba
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मार्च - २०१३ यत्तः मूर्खा-निर्द्धन-दुरस्थो, यो हि मोक्षाभिलाषिण। त्रिगुणाधिक वर्षश्च, न देया कन्यका बुधैः ।। ४०।।
[विवेकविलास तरंग ५/श्लोक १३]
चालि।। वरसिउं तउ हिवि जाणिनइ रे लाल, रूडउ सागरचंद मनमोहिउ रे, किं वा अंग दझावसिउ रे लाल, पणि न वरूं वर मंद मनमोहिउ रे. ४१
कुंयर बोलि कूतिकी... किहां खरनि घोडउ किहा रे लाल, किहां काच मोतिणहार मनमोहिउ रे, कोढीसि काट्ठखावउ कसउ रे लाल, तिम नभसेनकुमार मनमोहिउ रे. ४२
कुंयर बोलि कूतिकी... सागरचंदनि मइ वरिउ रे लाल, पणि कूडउ हठ्ठ एह मनमोहिउ रे, मनोरथ पुण्यविहीणनउ रे लाल, दोहिलउ सीजइ तेह मनमोहिउ रे. ४३
कुंयर बोलि कूतिकी...
दुहा।। इम कुमरी चिंता भरी, शोचा करती देखि, नारदि बोलावी तिसई, रूडि-वचनविशेषि. ४४ खेद म धरि पुत्री हवि, द्रढ करि चित्त सुजांण, फलसि मनोरथ ताहरउ, होसि कोडिकल्याण. ४५ अनुरागी सो पति अछइ, तुझ मुख देखण चाहि, कुमरी कहि नारद किसिउं, मीठे बोलि म वाहि. ४६
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