Book Title: Shrutsagar Ank 2013 03 026
Author(s): Mukeshbhai N Shah and Others
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba

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Page 65
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर - २६ ६३ खेलकर कष्टप्रद यात्रा करके देश का नाम रोशन किया। विश्व-विख्यात नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्ययन करके अगाध पाण्डित्य प्राप्त किया हो, जो भारत के पवित्र बौद्ध-तीर्थों के दर्शन करके पतित-पावन हो चुका हो, जिसने अपने पाण्डित्य को भी अपने देश की सेवा में अर्पित कर दिया हो, वह भला देश की आँखों में क्यों न बसे! देश उसकी चरण-रज को मस्तक पर लगाकर कृत-कृत्य क्यों न हो ! इन यात्रियों ने भारत की तत्कालीन शिक्षण प्रणाली एवं विद्या - विहारों, गुरुकुलों आदि के विषय में अनेकविध महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ अपने यात्रा विवरणों में लिखी हैं। इन तथ्यों के आधार पर तत्कालीन भारतीय शिक्षण-पद्धति, अतिथिसत्कार एवं न्याय-व्यवस्था के अखण्ड प्रवाह का ज्ञान प्राप्त होता है। सात वर्ष की उम्र में विद्यार्थी आश्रम या मठ में गुरु के पास विद्याभ्यास हेतु जाता था । आश्रम के छोटे-बड़े सभी काम वह स्वयं करके गुरु के निकट रहकर गुरुमुख से ज्ञान प्राप्त करता था। इन संस्थाओं में सभी जाति एवं धर्म के विद्यार्थियों को अमीर-गरीब का भेद किये बिना प्रवेश दिया जाता था । इन संस्थाओं में विद्यार्थियों को शब्द ( व्याकरण - साहित्य), शिल्प (हुनरउद्योग), चिकित्सा ( रोगोपचार विधि), हेतु-विद्या ( न्यायशास्त्र ) तथा अध्यात्मविद्या (धर्म एवं तत्त्वज्ञान) से सम्बन्धित शास्त्रों का गहन अभ्यास कराया जाता था। तीस वर्ष की उम्र तक अध्ययन-कार्य चलता था । तत्कालीन विद्वान् अध्यापकों के अध्यापन कौशल एवं पाण्डित्य का ह्वेनसांग ने खूब बखान किया है। छोटेछोटे आश्रमों, गुरुकुलों एवं मठों के अलावा आज हम जिन्हें विश्वविद्यालयों की तरह जानते हैं वैसी ही अनेकों ख्याति प्राप्त संस्थाएँ उस समय विदेशों तक प्रसिद्ध थीं। उनमें से कई संस्थाएँ तो अलग-अलग प्रकार की प्रमुख विद्याओं के विशेष अध्ययन हेतु प्रसिद्ध थीं। उदाहरण स्वरूप तक्षशिला विद्यापीठ चिकित्सकीयअध्ययन हेतु, उज्जयिनी विद्यापीठ ज्योतिष - शास्त्रीय अध्ययन हेतु, वलभी विद्यापीठ जैन-धर्म-दर्शन के अध्ययन हेतु, काशी विद्यापीठ वेद-वेदांग के अध्ययन हेतु तथा नालन्दा विद्यापीठ महायानीय बौद्ध सम्प्रदाय के अध्ययन हेतु विशेषरूप से प्रसिद्ध थे। इन विद्यापीठों में विभिन्न देशों के हजारों विद्यार्थी एक-साथ अध्ययन करते थे । तत्कालीन भारतवर्ष ने विद्योपासना में कैसी अद्भुत प्रगति की थी इसका अनुमान इन विद्यापीठों की अध्यापनशैली एवं यहाँ के वैशिष्ट्य वर्णन से लगाया जा सकता है, जो निम्नवत है : For Private and Personal Use Only

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