Book Title: Shrutsagar Ank 2013 03 026
Author(s): Mukeshbhai N Shah and Others
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba

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Page 48
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 6 " मार्च - २०१३ त्रु.॥ आचार पालई सूत संभालई, पुत्र ऊपरि प्रेम ए, मीठई रे मेवई आणि पोषइं, तीन वारसू खेम ए. ११ बहु सरस रस वि स्वादि व्यंजन, विहरी दीयइं खप करी, फासू रे पाणी जाणि देवई, दत्त मुनि करि गोचरी. १२ इम पिता तस पोषए, दिन प्रति ऊत्तम रीतइंजी, भिक्षा काजि भली परि, साथि न तेडि प्रीतिइंजी. १३ प्रीतिसिउं ते वधिउ सुभ परि, योवनवइं आविउं जिसइं, तव अणष(स) करि केई साधु तससिउं, किसिउं पोषइं नव रसइं. १४ ए तरुण तनि सब काजि समरथ, वृद्ध तात विपोष ए, दाखिण' लगई नवि कोई जंपि, इम पिता तस पोष ए. १५ दूहा।। दत्तरिषीसर रोग वसि, समाधिपणि करि काल, पुण्य लगइं सुभ गति लहि, जिहां कणि सुख-चिरकाल. १६ राग-मारूणी इम को न जावि रे ए देसी।। पिता मरण पामइं अरणकरिषि, अणुरति' करतो चित्तइंजी, हा! हा! पिता परलोकि सिधायउ, इम करवू दुख पत्तइंजी. १७ तातजी आखउ रे कोई मतिपरपंच, सुभ गति भाखउ रे, इणि नवलइ जोवनवेसि, किम संजम पलसइं तुम पाखइं. १८ मुझसिउं कीधी वंच (आंकणी) सरस कवलि करी मुजनइं पोषिउं, बालपणा लगई आजोजी, भिक्षा काजि न भमवा दीधउ, सारंता सवि काजजी. १९ तातजी आखउ रे कोई... For Private and Personal Use Only

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