Book Title: Shrutsagar Ank 2013 03 026
Author(s): Mukeshbhai N Shah and Others
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba

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Page 47
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir अरणिकमुनि रास विमल विमलमति दायका, समरूं सारदमाईजी, गाउं अरणक मू(मु)निवरु, रसिक सू(सु)णउ चिति लाईजी. १ टक।। चिति लाय जेणि सहिउ परीसह, ऊहन अग्नि खमि आकरउ, पहिलू ते सिथिल थयउ प्रमादई, चारित्रआवरणिं धरिउ. २ तस चरित आखउं बुधिमा जनि, प्रेम धरी सुखदाइका, अहो साधुनइ गुणइं रमउ रंगई, विमल विमल मतिदायका, ३ तगरानगरी सोहामणी, रिद्धि-समृद्धि-विसालोजी, वासि वसि विवहारीया, सूखीया अतिचउसालोजी. ४ चउसाल तिहां कणि रहि सुंदर-दत्त सेठ मनोहरूं, तस सार रूपि भार्या भद्रा, ते नामि सुखकरूं. ५ संसारनां सुख विलसतां लहि, पुत्र मनुहर कांमिणी, कुमर अरणक चतुर सहिजई, तगरांनगरी सोहामिणी. ६ तिणि पुरि श्रीगुरू आवए, साधतणइं परिवारिंजी, दरिसन देखवा अलिजया', लोक सवे सुविचारिंजी. ७ सुविचार सेती दत्त गृहपति, जाइ मुनिनि वांदवा, सुभ भाव आंणी सुणी यांणी, थयउ कर्म निकंदिवा. ८ संवेगरंगई नारि सुतसिउं, लीयइं चारित भाव ए, गुरूराज साथि विहार करतो, तिणि पुरि श्रीगुरू आव ए. ९ दत्त-मुनि करि गोचरी, लई सुधउआहारोजी. दोष बइतालीस टालतउ, पालई पंच आचारोजी. १० For Private and Personal Use Only

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