Book Title: Paumchariu Part 4
Author(s): Swayambhudev, H C Bhayani
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 336
________________ ૨૮ पउमचरिय घत्ता तं वय सुपि लखण कोयणहूँ विधिलें चि तखर्गेण । अवको रावणु मच्छर प्रणं रासि गण सणिच्छण ॥१०॥ क घिउ लक्षणु गरुड रहें वळु वज्जात धरु [ 10 ] गारुडस्यु गरुड-सह | सीह - विन्धु वर - सोह- सन्दणु ॥ गय-चित्धु गय रहवरु प्रमय-महद्धव । विष्फुरन्तु किकिन्धाहिजे सण्णउ ॥१॥ अलोणि-पञ्च- सहि समाणु । मामण्डलु भक्लोहणि सहासु । अङ्गङ्गय अक्खोइणि-सएण | पनि लक्ख संखोहणीहि । सीसोणिलु अहि-माणि । तीसह दहिहु तीस महिन्दु । सोलह कुह सक्छु । दोयरसुड सप्तहिं सहाउ । सुग्गी णिवि समजामाणु ॥२॥ कुल पासु ॥३॥ ल-गील ताएँ अपुर्ण ॥४॥ मारु चाळीस खोपी ॥ ५ ॥ रहें घवि विडीसणु सूल-पाणि ॥ ६ ॥ बीसहिँ सुसेणु वीमहिं जें कुन्दु || ७ || कारहहिं गव अहिं गवक्खु ||८|| सुड वालि तेहत्तरिहि आउ ॥९॥ वसा सष्णहें वि पासु कहूँ वहाँ अक्षोणि-वोस सहूँ बड़ीं । विवि बहु संचलियाँ उहि मुद्दे उलियाँ ॥१०॥

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