Book Title: Painnay suttai Part 1
Author(s): Punyavijay, Amrutlal Bhojak
Publisher: Mahavir Jain Vidyalay

Previous | Next

Page 654
________________ ४९७ २०. तित्थोगालीपइन्नयं ४५१८. ओसप्पिणीइमाए जो होही(१ होहऽइ)दुस्समाए अणुभावो । सो चेव [य] अणुभावो उस्सप्पिणिपट्ठवणगम्मि ॥ ९७७॥ ४५१९. सी-उण्हपउलिएहिं वित्ती तेसिं तु होइ मच्छेहिं । इगवीससहस्साई वासाणं निरवसेसा उ॥९७८॥ ४५२०. सी-उण्हपउलिएहिं वित्ती तेसिं तु होइ मच्छेहिं । बायालीससहस्सा वासाणं निरवसेसा उ॥९७९ ॥ ४५२१. अवसप्पिणीए अद्धं अद्धं उस्सप्पिणीए तहिं(? ह) होइ। एयम्मि गते काले होहिंति उ पंच मेहा उ॥९८०॥ ४५२२. पुक्खलसंवट्टो १ वि य खीरोद २ घतोय ३ अमयमेहो ४ य । पंचमओ रसमेहो ५ सव्वे दसवरिसखेत्ता उ॥९८१॥ ४५२३. एकेको अणुबद्धं(? अणवरयं) वासीहिति सत्त सत्त दिवसाई । पंचत्तीसं(१ से) दिवसे वदलिया होहिती सोमा ॥ ९८२॥ ४५२४. पढमो उ निव्ववेहिति, धण्णं बितिओ करेहिई मेहो। तइओ नेहं जणयइ, ओसहिमादी चउत्थो उ॥९८३॥ ४५२५. पंचमतो रसमेहो तेसि चिय पुढवि-रुक्खमादीणं । एवं कमेण जायं धण्णाइगुणेहिं उववेयं ॥९८४ ॥ [गा. ९८५-९८. आगमेस्सुस्सप्पिणीए बिइयस्स दूसमासमाअरगस्स भावा] ४५२६. उस्सप्पिणिदूसमदूसमाए पत्ताइ चरिमरातीए । वासिहिति सव्वराई महंतर(? य) निरंतरं वासं ॥९८५ ॥ ४५२७. तेण हरिया य रुक्खा तण-गुम्म-लेया-वणप्फतीओ य । अमियस्स किरणजोणी पंचत्तीसं अहोरत्ता ॥९८६ ॥ २० १. 'लया व जेणप्फत्तीओ सं० । 'लया य जेणप्पत्तीमो की०। लया व जेण प्पत्तीनो हं० ला। अत्र मूले सम्पादकेन परिकल्पितः पाठोऽस्ति । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 652 653 654 655 656 657 658 659 660 661 662 663 664 665 666 667 668 669 670 671 672 673 674 675 676 677 678 679 680 681 682 683 684 685 686 687 688 689