Book Title: Nirgrantha Pravachan
Author(s): Chauthmal Maharaj
Publisher: Jain Divakar Divya Jyoti Karyalay Byavar

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Page 252
________________ मोक्ष -स्वरूप २२७ गुरुजनों के आसन से नीचे बैठने वाला हो, (अचवले ) चपलता रहित हो (माई) निष्कपट हो ( अऊहले) कुतुहल रहित हो । -- भावार्थ:- हे गौतम! पन्द्रह कारणों से मनुष्य विनम्र शीलवान् या विनीत कहलाता है - वे पन्द्रह कारण यों हैं (१) अपने बड़े-बूढ़े व गुरुजनों के साथ नम्रता से जो बोलता हो, (२) उनसे नीचे आसन पर बैठता हो, पूछने पर हाथ जोड़ कर बोलता हो; दोलने, चलने, बैठने आदि में जो चपलता न दिखाता हो ( ३ ) सदैव निष्कपट भाव से जो बर्ताव करता हो (४) खेल तमाशे, आदि कौतुकों के देखने में उत्सुक न हो । मूलः -- अप्पं चाहिक्खिवई, पबंधं च न कुब्बई । मेत्तिज्जमाणो भयई, सुयं लद्ध न मज्जई ॥१०॥ न य पावपरिस्वी न यो कु अप्पियस्सावि मित्तस्स, रहे कल्लाण भासई ॥ ११॥ कलहडमरवज्जए, बुद्ध अभिजाइए । हिरिमं पडिलीणे, सुविणीए ति बुच्चई || १२ || " छाया: -- अल्पं च अधिक्षिपति, प्रबन्धं च न करोति । मंत्रीषमाणो भजते श्रुतं लब्ध्वा न माद्यति ॥ १० ॥ न च पापपरिक्षेणी, न च मित्रेषुः कुप्यति । अप्रियस्यापि मित्रस्य, रहसि कल्याणं भाषते || ११|| कलहडमरवर्जकः, बुद्धोऽभिजातकः । होमान् प्रतिसंलीनः सुविनीत इत्युच्यते ॥ १२ ॥ 1 अग्वयार्थ :- हे इन्द्रभूति ! (अहिविस्ववई ) बड़े-बूढ़े तथा गुरुजन आदि किसी का भी जो तिरस्कार न करता हो (घ) और (पबंध) कसहोत्पादक कमा (न) नहीं ( कुब्बई) करता हो, (मेन्तिज्जमाणो ) मित्रता को (भयई) निभाता हो, (सुर्य) श्रुतज्ञान को (लद्ध ) पा करके जो (न) नहीं (मज्जई) भद करता हो (य) और (न) नाही करता हो ( पावपरिक्लेवी ) बड़े-बूढ़े तथा गुरुजनों की

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