Book Title: Jainendra Siddhanta kosha Part 2
Author(s): Jinendra Varni
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 629
________________ निरनुयोज्यानुपेक्षण ६२१ १. निर्जराके भेद व लक्षण निरनुयोज्यानुपेक्षण भ. आ./वि./४३/१४२/२ तत् त्रितयमिह निर्ग्रन्थशब्देन भण्यते ।- सम्य ग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र रूप रत्नत्रयको यहाँ निर्ग्रन्थ न्या. सू./न./५/२/२२ अनिग्रहस्थाने निग्रहस्थानाभियोगो निरनुयोज्या शब्द द्वारा कहा गया है। नुयोगः ।२२। -निग्रहस्थान नहीं उठानेके अवसरपर निग्रहस्थानका उठा देना वक्ताका 'निरनुयोज्यानुयोग' नामक निग्रहस्थान है। प्र.सा./ता. वृ/२०४/२७८/१५ व्यवहारेण नग्नत्वं यथाजातरूपं निश्चयेन तु स्वात्मरूपं तदित्थं भूतं यथाजातरूपं धरतीति यथाजातरूपधरः नोट-(श्लो. वा. ४/१/३३/न्या. श्लो, २६२-२६३)-में इसका निरा निर्ग्रन्थो जात इत्यर्थः । = व्यवहारनयसे नग्नत्वको यथाजातरूप करण किया है। कहते हैं और निश्चयनयसे स्वात्मरूपको। इस प्रकारके व्यवहार व निरन्वय--(न्या. बि./वृ./२/११/११८/२४)-निरन्वयम् अन्वया- निश्चय यथाजातरूपको धारण करनेवाला यथाजातरूपधर कहलाता निष्क्रान्तं तत्त्वं स्वरूपम् । - अन्वय अर्थात् अनुगमन या संगतिसे है । 'निर्ग्रन्थ होना' इसका ऐसा अर्थ है। निष्क्रान्त तत्त्व या स्वरूप। २. निग्रन्थ साधु विशेषके अर्थमें निरपेक्ष-दे० स्याद्वाद/२ । स. सि./६/४६/४६०/१० उदकदण्डराजिवदनभिव्यक्तोदयकर्माण. ऊर्ध्व निरय--प्रथम नरकका द्वितीय पटल-दे० नरक/२/११ तथा रत्नप्रभा मुहर्तादुभिद्यमानकेवलज्ञानदर्शनभाजो निर्ग्रन्थाः । -जिस प्रकार निरर्थक-(न्या. सू /मू. व. वृ./५/२/८) वर्णक्रमनि शवन्निरर्थकम् जलमें लकड़ीसे को गयी रेखा अप्रगट रहती है, इसी प्रकार जिनके ८ यथा नित्यः शब्दः कचटतपाः जबडदशत्वाव झभवघढधषवदिति । कर्मोंका उदय अप्रगट हो, और अन्तर्मुहुर्तके पश्चाव ही जिन्हे केवलएवंप्रकारनिरर्थकम् । अभिधानाभिधेयभावानुपपत्तौ अर्थ गतेरभावाद ज्ञान व केवलदर्शन प्रगट होनेवाला है, वे निर्ग्रन्थ कहलाते हैं। वर्णाः क्रमेण निर्दिशन्त इति ।। =वर्णों के क्रमका नाममात्र कथन (रा. वा./६/४६/४/६३६/२८); (चा. सा./१०२/१) करनेके समान निरर्थक निग्रहस्थान होताहै। जैसे-क, च, ट, त, प नोट-निर्ग्रन्थसाधुकी विशेषताएँ-दे० साधु/५ । ये शब्द नित्य है। ज, ब, ग, ड, द, श, स्व, होनेके कारण, झ, भ, निर्जर पंचमी व्रत-प्रतिवर्ष आषाढ़ शु०५ से लेकर कार्तिक ब, घ, ढ, ध, ष की नाई । वान्यवाचक भावके नहीं बननेपर अर्थका शु०५ तक की कुल ६ पंचमियोंके उपवास ५ वर्ष पर्यन्त करे। ज्ञान नहीं होनेसे वर्ण ही क्रमसे किसीने कह दिये हैं, इसलिए यह __ नमोकारमन्त्रका त्रिकाल जाप्य करे। (वत विधान संग्रह/पृ०६७) निरर्थक है। निजरा-कर्मोके झड़नेका नाम निर्जरा है। वह दो प्रकार की हैनोट- (श्लो. वा. ४/१/३३/न्या./श्लो, १६७-२००/३८२) में इसका सविपाक व अविपाक । अपने समय स्वयं कर्मोंका उदयमें आ आकर निराकरण किया गया है। झड़ते रहना सविपाक तथा तप द्वारा समयसे पहले ही उनका निराकांक्ष-१. निराकांक्ष अनशन-दे० अनशन २. निराकाक्ष झडना अविपाक निर्जरा है । तिनमें सविपाक सभी जीवोको सदा गुण-दे० निःकांक्षित। निरन्तर होती रहती है, पर अविपाक निर्जरा केवल तपस्वियोंको निराकार-दे० आकार । ही होती है। वह भी मिथ्या व सम्यक दो प्रकारकी है। इच्छा निरोधके बिना केवल बाह्य तप द्वारा की गयी मिथ्या व साम्यताकी निराकुलता-दे० सुख । वृद्धि सहित कायक्लेशादि द्वारा की गयी सम्यक है। पहली में नवीन निरूपणा-(रा. वा./१/१२/११/१२/१८) तस्य नामादिभि' प्रकल्पना कर्मोंका आगमन रूप संवर नहीं रुक पाता और दूसरीमें रुक जाता प्ररूपणम् । नाम जाति आदिकी दृष्टिसे शब्दयोजना करना है। इसलिए मोक्षमार्गमें केवल यह अन्तिम सम्यक् अविपाक निरूपण कहलाता है। निर्जराका ही निर्देश होता है पहली सविपाक या मिथ्या अविपाक निरोध-(रा. वा./४/२७/१/६२५/२६ ) गमनभोजनशयनाध्ययना का नहीं। दिषु क्रियाविशेषेषु अनियमेन वर्तमानस्य एकस्याः क्रियायाः १. निर्जराके भेद व लक्षण कतृत्वेनालस्थानं निरोध इत्यवगम्यते । = गमन, भोजन, शयन, १. निर्जरा सामान्यका लक्षण और अध्ययन आदि विविध क्रियाओं में भटकनेवाली चित्तवृत्तिका एक क्रियामें रोक देना (चिन्ता) निरोध है। भ. आ./मू./१८४७/१६५६ पुम्बकदकम्मसडणं तु णिज्जरा। = पूर्वबद्ध निर्गमन-किस गतिसे निकलकर किस गति व गुणस्थान आदिमें कर्मोका झड़ना निर्जरा है। वा. अ./६६ बंधपदेशग्गलणं णिज्जरणं । -आत्मप्रदेशोके साथ कर्मजन्मे । इस सम्बन्धी गति अगति तालिका-दे० जन्म/६ । प्रदेशोंका उस आत्माके प्रदेशोंसे झड़ना निर्जरा है। (न. च. वृ./ निर्ग्रन्थ-1. निष्परिग्रहके अर्थ में १५७); ( भ. आ./वि./१८४७/१६५६/६)। . ध. १/४,१,६७/३२३/७ बवहारणयं पडुच्च खेत्तादी गंथो, अब्भंतरंग स. सि./१/४/१४/५ एकदेशकर्मसंक्षयलक्षणा निर्जरा। -एकदेश रूपसे कारणत्तादो। एदस्स परिहरण णिग्गंथं। णिच्छयणर्य पडच्च कर्मोंका जुदा होना निर्जरा है। (रा.वा./१/१/१६/२७/७); (भ.आ./ मिच्छत्तादी गंथो, कम्मबंधकारणत्तादो। तेसि परिच्चागो णिग्गथं । वि./१८४७/१६५६/१०); (द्र. सं/टी./२८/८/१३); (पं.का./ता.वृ./१४४/ णडगमणएण तिरयणाणुवजोगी बज्झम्भंतरपरिग्गहपरिच्चाओ २०६/१७) । णिग्गथं । = व्यवहारनयको अपेक्षा क्षेत्रादिक (बाह्य) ग्रन्थ हैं, क्योंकि स. सि./८/२३/३६६/६ पीडानुग्रहावात्मने प्रदायाम्यवहृतोदनादिविकावे अभ्यन्तर ग्रन्थ (मिथ्यात्वादि ) के कारण हैं, और इनका त्याग रवत्पूर्वस्थितिक्षयादवस्थानाभावारकर्मणो निवृत्तिनिर्जरा। जिस निर्ग्रन्थता है। निश्चयनयकी अपेक्षा मिथ्यात्वादिक ( अभ्यन्तर ) प्रकार भात आदिका मल निवृत्त होकर निर्जीर्ण हो जाता है, उसी ग्रन्थ हैं, क्योंकि, वे कर्मबन्धके कारण हैं और इनका त्याग करना प्रकार आत्माका भला बुरा करके पूर्व प्राप्त स्थितिका नाश हो जानेके निर्ग्रन्थता है। नैगमनयकी अपेक्षा तो रत्नत्रयमें उपयोगी पड़नेवाला कारण कर्मकी निवृत्तिका होना निर्जरा है। (रा. वा./८/२३/१/ जो भी बाह्य व अभ्यन्तर परिग्रह (ग्रन्थ ) का परित्याग है उसे ५८३/३०)। निर्ग्रन्थता समझना चाहिए।-(बाह्य व अभ्यन्तर परिग्रहके भेदोंका रा.वा.//सूत्र/वार्तिक/पृष्ठ/पंक्ति-निर्जीर्यते निरस्यते यथा निरसननिर्दश-दे० ग्रन्थ); (नि, सा./ता.व./४४)। मात्रं वा निर्जरा (४/१२/२७)। निर्जरेव निर्जरा। कः उपमार्थः। जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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