Book Title: Jain Vidya 22 23
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 131
________________ 122 8. द्यूते हिंसानृतस्तेय लोभमायामये सजन्। क्व स्वं क्षिपति नानर्थे वेश्यानेटान्यदारवत ॥ 2.17 ॥ - • सागारधर्मामृत जैनविद्या 9. ण गणेइ इट्ठमित्तं ण गुरुं ण य मायरं पियरं वा । जूवंधो वुज्जाई कुणइ अकज्जाई बहुयाई ॥ 63 ॥ सजणे य परजणे वा देसे सव्वत्थ होइ णिल्लज्जो । मायाविण विस्सासं वच्चइ जूयं रमंतस्स ॥ 64 ॥ वसुनंदि श्रावकाचार - 10. ऋग्वेद, 10/34/13 11. मंसासंणेण वड्ढइ दप्पो दप्पेण मज्जमहिलसइ । जूयं परमइ तो तं पिवण्णिए पाउणइ दोसे || 86 ॥ - वसुनंदि श्रावकाचार 12. महाभारत, अनुशासन पर्व, 115/24 13. ‘नारकृत्वा' प्राणिनां हिंसा, मांसमुत्पद्यते क्वचित् । - मनुस्मृति, अ. 5 14. प्राणिहिंसार्पितं दर्पमर्पयन्तरसं तरां । रसयित्वा नृशंसः स्वं विवर्तयति संष्टतौ ॥ 2.8 ॥ - सागारधर्मामृत 15. हिंस्र : स्वयंम्रतस्यापि स्याद श्रन् वा स्पृशन्यलं । पक्कापक्का हि तत्पश्यो निगोदौध सुतः सदा ।। 2.7 ॥ - वही 16. स्थाने श्रुतं पलं हेतोः स्वतश्चाशुचिकश्मलाः । श्वादि लाला वदप्पद्युः शुचिंमन्याः कथंनुतत् ॥ 2.6 ॥ - वही 17. भ्रमतिपिशिताशना भिध्यानादपि सौरसेनवत्कुगतिः । तद्विरतिरतः सुगतिं श्रयति नरश्चंडवत्खदिरवद्वा ॥ 2.9 ॥ - वही 18. मज्जेण णरो अवसो कुणेइ कम्माणि णिंदणिज्जाई । इहलोए परलोए अणुहवइ अनंतयं दुक्खं ॥ 70 ॥ - वसुनन्दि श्रावकाचार - 22-23 19. यदेकबिंदो : प्रचरंति जीवाश्चेत्तत् त्रिलोकीमपिपूरयति । यद्विक्लवाश्चेमममुं च लोकं यस्यंति तत्कश्मवश्यमस्येत् ॥ 2.4 ॥ - सागारधर्मामृत 20. पीते यत्र रसांगजीवनिवहाः क्षिप्रंम्रियन्तेऽखिलाः । कामक्रोधभयभ्रमप्रभृतयः सावद्यमुंद्यति च। तन्मद्यं व्रतयन्न धूर्तिल परास्कंदीव यात्यापदं तत्पायी पुनरेकपादिव दुराचारं चरन्मज्जति ॥ 2.5 ।। वही 21. सुरावैमलमन्नानां तस्माद् ब्राह्मण - राजन्यौवैश्चश्च न सुरापिवेत् । - मनुस्मृति, 11/93 22. महाभारत, शान्तिपर्व, 165/47-48, 76 23. कुम्भ जातक, प्रथम खण्ड 471, पंचम खण्ड, गा. 37, 39, 45, 51 पृष्ठ 107। 24. सागारधर्मामृत, पं. आशाधर, 2.17 ।

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