Book Title: Jain Dharm Vikas Book 02 Ank 12
Author(s): Lakshmichand Premchand Shah
Publisher: Bhogilal Sankalchand Sheth

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Page 16
________________ 3८६ જૈનધર્મ વિકાસ. चटपटी अजब मिठाई का स्वाद चाखिये। लेखकः मुनी भद्रानंदविजय. बिलाड़ा (मारवाड़.) (dis ५४ ३५८ था मनुस धान) कहना तो सरल, और अतीव सरल है पर उपयोग में लाना पूरी टेढी खीर है। प्राणीमात्र में, समस्त जीवधारियों में इन कषायों का प्रमुखतम बिशेष स्थान है। इसे हठाने के लिये त्याग ही की पूरी जरूरत है। बिना त्याग के यही कषाय रूपी भयंकर राक्षस मनुष्य को अपने मदसे उन्मत्त बना नरकाब्धि के गहरे भंवरमें धकेल देते हैं श्रीकृष्णने गीता में कहा है: ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्संजायतेकामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाबुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ और भी कहा है कि त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामक्रोधस्तथा लोभस्तमादेतत् त्रयंत्यजेत् ॥ इति इसी लिये ज्ञानी महात्माओंने भगवान् महावीर की स्तुति करते हुवे कहा है कि नमोदुर्वार रागादिवैरिवार निवारिणे । अर्हते योगिनाथाय महावीराय तायिने ।। इन्होंने इस मीठी मिठाई की भाधुरी को चख्खा था, इन्होने इसके स्वाद से संसार को लालायित करने का भगीरथ यत्न किया था, अब देखना है कि क्या इन कषायों पर विजय पाना सरल है, नहीं, नहीं नहि देह भृताशक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः। ___ यस्तु कर्मफल त्यागी सत्यागी त्यभिधीयते ॥ देहधारियों के लिये सबसे कठिन यदि कोई कार्य है तो एक मात्र यही है। तो फिर इसे किस प्रकार जीता जा सकता है ? इसका उत्तर एकमात्र यही है कि "अभ्यासेन तु कौंतेय वैराग्येणैव गृह्यते" जब यह होगा तो चिंतामणी के थालमें भरी प्यारी मिठाई चखते क्या देर लगेगी। जब हम इन प्रबल और प्रचंड शत्रुओं को परास्त कर देंगे तो शिवनारी स्वयं हमारे लिये इस महनीय मिठाई को लेकर उपस्थित होगी। यही, यही तो षड्दर्शनों का कथन है कषाय ही ज्ञानपट पर पड़ा हुआ परदा है, यही आवरण परमानंद प्राप्ती में बाधक रूप है, यदि यह अरिहंत महाप्रभु की असीम अनुकंपा से कहीं हट जाय तो

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