Book Title: Jain Dharm Vikas Book 02 Ank 12
Author(s): Lakshmichand Premchand Shah
Publisher: Bhogilal Sankalchand Sheth

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Page 34
________________ ४०२ नधर्म विस. ણામ આવે, એની શક્તિની જે અનેરી જમાવટ થાય અને ઉત્સાહ તથા આશાનાં પુર સમાજ પર ફરી વળે એને ખ્યાલ કે કલ્પના અત્યારે આપવી મુશ્કેલ છે. હિંદ અને હિંદબહારના દેશોમાં યુવાનોએ જે કરી બતાવ્યું છે તેની સાક્ષી ઈતિહાસ આપે છે, ત્યારે જૈન યુવાને પોતાનું સંગઠન કરે છે તેમાંથી ભારે સુંદર ફળ નીપજે એ આશા વધારે પડતી તે નથી જ. %3 संसार परिवर्तन शील है लेखक-कल्याणकिंकर जैन भिक्षु कुशलविजय, अहमदाबाद. प्रिय मित्रों! प्रकृति का यह अटल नियम है कि पदार्थों को पर्याय समय २ पर पलटती ही रहती है। या यों कहना चाहिये कि संसार परिवर्तन शील है। आज हम जिस वस्तु को नूतन रुपमें देखते हैं वही कालान्तर से जीर्ण शीर्ण देखि जाति है। वस्त्र, पात्र, मकान आदि किसी भी वस्तु को देख लिजिये। संसार में एसी कोई भी वस्तु नही मिलेगी जो कि सदाकाल एकसी रहती हो। एसा क्यों होता है ? इसि लिये कि संसारका स्वभावही परिवर्तनशील है। मनुष्य का बास्यजीवन कितना सुन्दर और प्रिय होता है। शरीर पर वस्त्र-दागीने आदि नही होने पर भी वह बालक कितना प्रिय लगता है ? स्वच्छता से रहने वाले भी उस बच्चेको गोदिमें लेकर खेलाते हैं। प्यार करते हैं। परन्तु कालान्तर में वही बालक जब परिवर्तन अवस्थामें आ जाता है तब उनका रुप और ही हो जाता है। कपडे दागीने आदि पहनने पर भी पूर्ववत् मनोहरता नही रहती। अगर जो कपड़े आदि नहीं पहनाये जाय तब तो उनका रुप दर्शनिय (१) ही हो जाता है। ज्यों २ परिवर्तन होता जाता है वहां वहां विकारभी उत्पन्न होते रहते है, वृद्ध, अवस्था तक की परिवर्तनतामें मनुष्यकी क्या २ स्थिति होती है यह तो प्रत्यक्ष अपन अनुभव कर ही रहे है। मतलब यह है कि, परिवर्तन धर्म सर्व पदार्थों में रहा हुआ है। इसी लिये तो एक गंभीर वेदना के साथ कहना पड़ता है कि इस नियमसे तीर्थंकरोंका शासनभी वंचित नही रह सका। चरम तीर्थकर प्रभु महावीर परमातमा के शासन की आज २५ वीं शताब्दि जा रही है। इस लम्बी अवधि तक शासन में कितना परिवर्तन और विकारको स्थान मिला है यह तो इतिहास ही. घोषित कर रहा है।

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