Book Title: Jain Dharm Prakash 1947 Pustak 063 Ank 12
Author(s): Jain Dharm Prasarak Sabha
Publisher: Jain Dharm Prasarak Sabha

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Page 4
________________ श्रीसिद्धचक्र ही कलिकाल में कल्पवृक्ष है। -- - - Bream सब चनो में सिद्धचक्र ही कल्पवृक्ष है कहलाया । चक्र सुदर्शन से तो, शत्रुजन का शीश है कटवाया ॥ १ ॥ सर्व शिरोमणी अरिहन्त प्रभुने, सर्व अरि को नसवाया । __ सर्व अरि का अन्त होने से, सिद्धप्रभु यह कहलाया ॥ २॥ अरिहन्त सिद्ध के पद अनुगामी, सूरिवर है महाराया। . . पाठक मुनि इनके अनुयायी, पंचपरमेश्वर कहलाया ॥ ३ ॥ दर्शन ज्ञान चारित्र तप उत्तम, धर्म विश्व में सुखदाया । आत्मलब्धि का यही विकाशक, सिद्धचक्र यह कहलाया ॥४॥ बारह आठ छत्तीस गुण पच्चीश, सत्तावीस है फलदाया । यह ऐकसो आठ गुणों का स्मरण, महाप्रभाविक बतलाया ॥ ५ ॥ कलिकाल में सिद्धचक्र यह, कल्पवृक्ष सम फलदाया । चिन्तित चिन्तामणि कहलाता, चिन्ता नष्ट कराया ॥ ६ ॥ सब योगों में सिद्धयोग ही, यह ज्ञानीने बतलाया । सत्य श्रद्धा सद्भाव से भक्ति, सर्व उपद्रव हटवाया ॥ ७ ॥ निराश हुवे है जो जीवन में, वह भी आशा धन पाया। सती शिरोमणि मैनासुन्दरी, कुष्ट रोग भी हटवाया ॥ ८ ॥ अनेक आत्माने अनुभव से, महाप्रभाविक बतलाया । तीर्थकर जैसी पदवी इससे, अनेक आत्मा है पाया ॥ ९ ॥ चैतर आसो मास आराधन. करना इसका बतलाया । शुद्धभाव से कलिकाल में सिद्धचक्र, यह कल्पवृक्ष है कहलाया ॥१०॥ राजमल भंडारी-आगर( मालवा ) - A (२८०)

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