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(५५) उसी समय अकबर ने धार्मिक सम्मेलन संगठन किया, जिसमें श्री श्री हीर विजय जी मुनिवर ने भी योग दिया। दूर देश से श्रा आ कर सम्मिलत हुए उसमें विद्वान, सभी राज्यधानी में आ एकत्र हुए-पाया सम्मान ॥
सत्य विवेचन सभादेश था नहीं तनिक सा भी था स्वार्थ, सब से हीर विजय जी मुनि ने किया सभी में अति शास्त्रार्थ। किन्तु धन्य उनकी विद्वत्ता, धन्य जैन पथ सत्य उदार, विद्या धन्य, धन्य गुण गरिमा, धन्य धन्य पाण्डित्य विचार।
(५७)
अपने अद्भुत चमत्कार से प्रतिवादिगण किये निरस्त, कर उनके सिद्धान्त युक्ति से खण्डन उन्हें दिया कर व्यस्त । सभी तीनसौ वेसठ के लग भग थे गणना में विद्वान् जैन धर्म की छाप मान वे गये सभी यों किन्तु निदान
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