Book Title: Dandak Prakaranam
Author(s): Gajasarmuni, Vijayodaysuri
Publisher: Granth Prakashak Sabha

View full book text
Previous | Next

Page 172
________________ ॥ दंडकस्तवनम् ॥ जनपर गर्भज समुर्छिम तथा, गर्भज उरभूजपरिसप्परे; पूष कोडी वरसनु आउखु, भिन्नमुहूर्त सप्पनुं भल्परे. जि० ॥१६॥ थरुचर गर्भम प्रण पल्यनु, समूर्छिम वर्ष सहस चोरासीरे: भाग पल्योपम असंख्यातमो, गर्भज खेचरनुं खासीरे. जि० ॥१७॥ खेचरनुं बहोतेर सहस, उरपरिनुं त्रेपन हजार रे भूजपरिनुं बेतालीश सहस, ए त्रण सम्मूर्छिम धाररे. जि०॥१८॥ गर्भज नरनुं त्रण पल्यन, जघन्यथी भिन्नमुहूर्त रे। दश सहस वरस व्यन्तरतणुं उत्कृष्ट पल्य- इंतरे. जि० १९॥ भय पल्यन तस देवी तणु, लाख वरस ने पल्य शशिकेरुरे; सहस वरस ने पल्योपमतणु, सूर्यनु ग्रह पल्य धारुं रे. जि० ॥२०॥ चंद्र सूर्य ने ग्रह देवीतj. निज आयु अरध करी दीयोरे; अर्ध पल्य तथा पा पल्यनु, नभत्र तारानुं लहीयोरे. जि० ॥२१॥ चोथो आठमो भाग झाझेरडो पल्यनो देवीनो मान रे; बे सागर सोहम जाणीए, बे उदधि झाझेरां इशान रे. जि० ॥२२॥ एक पल्य तथा अधिकरई, जघन्य आउखु सारो रे सात सागर अथ झाझेरडं, त्रीजे ने चोथे उदारोरे. जि० ॥२३॥ बे सागर अधीकेरडं, आयु जघन्य का तासरेः । हवे उत्कृष्ट अनुक्रमे कहूं, सुणजो ते धरी उल्लासरे, जि० ॥२४॥ दश चउद सत्तर अष्टादश, सागरनुं अनुक्रमे जाणीरे; आगळे एकेक वधारीए, एकत्रीश अवेक लगे आणीरे. जि० ॥२५॥ तेत्रीश सागर विजयादिके, चारने एकत्रिश जघन्यरे; आगळने उत्कृष्ट जघन्य ते, उत्तरतुं धारो सज्जनरे. जि० ॥२६॥ ॥ ढाल ४ थी. ॥ देशी एकत्रीशानी.

Loading...

Page Navigation
1 ... 170 171 172 173 174 175 176 177 178 179 180 181 182 183 184 185 186 187 188 189 190 191 192 193 194 195 196 197 198 199 200 201 202 203 204 205 206 207 208 209 210 211 212 213 214 215 216 217 218 219 220 221 222