Book Title: Dandak Prakaranam
Author(s): Gajasarmuni, Vijayodaysuri
Publisher: Granth Prakashak Sabha
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(१५८)
॥ दंढकस्तवनम् ॥
थावर विगल तिरि पणेन्द्र मनुज सहि करो जदा: श्री वीरजिनवर तणा पदयुगपद्मने अवलंबता, गत्यागति सवि दूर थाय पामीए सुख शाश्वता॥६॥
॥ ढाळ ५ मी.॥
॥ चोपाइनी देशी, ॥ (दार-२२) नारक थावर विगल नपुं वेद, देवने पुं त्रि वेद मन घेद; तिरि पंचेन्द्रि मनुज त्रण जाणं, हवे भुवन द्वार मन आण ॥१॥ सात नरकना अनुक्रमे सुणी, त्रीश पचवीश पन्नर दश त्रीणि; लाख शब्द सयले जोडीए, छठ्ठीए लखमां पण छोडीए ॥२॥ सातमीए पण नरकावास, चोराशी लख सर्वनि वास; चोत्रिश चोयालिश (४४)अडत्रीश, नवमी निकाय विना चालिश३ नवमीने पचास उदार, लक्ष शब्द सघळे विस्तार; दक्षिण दिशे दश इन्द्रना एह, चउ कोडि षट् लख सर्व गुणेह हवे उत्तर दश इन्द्रना कहुं, उणा प्रत्येके चउ लख लहु ; सात कोडि ने बहोतेर लाख, सर्व थइ ए जिनवर भाख ॥५॥ एक लाख अंशी सहप्त जोजन, स्त्नप्रभा पिंड भाखे जिन; सहस जोजन उपरि अध टाल, वचमां भुवनपतिने भाळ ॥६॥ संख्य असंख्यात जोजन मान, भवन कह्या छे तेहने थान; लोकव्यापी सूक्ष्म थावरा, वादर देशे कहे जिनवरा ॥७॥ बादर अग्नि मुनुज ए दोय, अढो द्वीपमां कहीए सोयः उपरी सहस जोजनमा थकी, उपरी अध शत जोजन मुकी ॥८॥ नगर असंख्याता तिहां कह्यां, नाना भरत जेवडा लह्या: महाविदेह सम मध्यम जाण, मोटा जंबुद्वीपप्रमाण ॥९॥
२३ स्त्रीवेद, पुरुषवेदन, पुसकवेद, ए ३ वेद छे,

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