Book Title: Dandak Prakaranam
Author(s): Gajasarmuni, Vijayodaysuri
Publisher: Granth Prakashak Sabha

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Page 171
________________ ॥ पं० पद्मवि०णि प्रणीतम || (१५५) तेर प्रतर पहेली नरकमां, तस उत्कृष्ट सुणो देइ कर्णरे. जि० ॥३॥ ने सहस तथा नेउ लक्ष छे, पुरव कोडि श्रीजे जाणोरे; एक सागरना दश भागमां, एक भाग चोथे मन आणोरे, जि० ॥४॥ एम भाग एकेक वधारतां, तेरमे थाय दश भागरे, सागर एक पुरुं थइ रहे, हवे जघन्यनी सुणो वागरे. जि० ॥५॥ दश सहस तथा दश लक्ष छे, नेतुं लाख ने पूरव कोडी रे; हवे आगलीनुं उत्कृष्ट जे, उत्तर जघन्ये जोडी रे. जि० ॥६॥ एकादश नव सत पण तथा, त्रण एक अनुक्रम धारोरे: प्रतरे गुणवान कहुं, आमनाय ते एक उदारोरे जि० ॥७॥ जे नरकनी स्थिति उत्कृष्ट छे, तस कीजे जघन्य ते बादीरे; प्रतर जेटला ते नरकना, कीजे भाग प्रतरे साधीरे. जि० ॥८॥ दस सहस वरस ते जघन्यथी, आयु भवनपति तणु होय रे; उत्कृष्ट चमरनुं सागरतणु, बलि इन्द्रनुं अधिकुं जोयरे. जि० ॥९॥ साडा त्रण तथा साडा चार छे, तस देवी तणु अनुक्रमे रे; हवे नव निकाय दक्षिणतणुं, आउखु दोढ पल्योपमरे. जि० ॥ १० ॥ पल्य दोय देशोन उत्तरतणुं, तस देवीनं अड एकोरे; देशे उण पल्योपम कहूं, क्रमे गणीए धरी विवेकोरे जि० ॥ ११ ॥ सन्ना शुद्धा विजी वालुका, चोथी मणशिला नाम शर्करा खर पूढवी जाणीए, अनुक्रमे सुणो आयु ठामरे, जि० ॥ १२ ॥ एक बार चउद सोल तेम वली, अष्टादश ने बावीसोरे: सहस शब्द ते तीहां जोडीए, आउखु भाखे जगदीशोरे; जि० ॥ १३ ॥ सात सहस वरस अपूकायनुं, वासर त्रण अग्निनुं आयुरे; त्रण सहस वरस वायुकायनुं, दश सहस वरस वणकायरे. जि० || १४ | बेइन्द्रिनुं बार वरसतणुं, तेइन्द्रिनुं ओगणपचास दिनरे; पट् मासनुं चौरेन्द्रितणु, वन्य मुहूर्त होय भिन्नरे. जि० ॥ १५ ॥

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