Book Title: Bhagavati Jod 01
Author(s): Tulsi Acharya, Mahapragna Acharya
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 460
________________ क्रिया--कर्मबन्धन की की निमित्तभूत प्रवृत्ति चउरंस--चतुष्कोण चरिद्री-चार इन्द्रिय वाले जीव क्षमा-हर परिस्थिति को सहने की क्षमता चक्रवर्ती-छः खण्डों का सम्राट क्षयोपशम-कर्मों के विलय से होने वाली आत्मा की चक्षुइंद्री-आंख उज्ज्वलता या हल्कापन चक्षु दर्शन--आंख द्वारा होने वाला सामान्य अवबोध क्षयोपशम भाव-कर्मों के विलय से होने वाली आत्मा की चरण-मूल गुण, चारित्र अवस्था चरणकरणानुयोग–संयम के मूल और उत्तर गुणों की क्षयोपशम सम्यक्त्व-मोहनीय कर्म के क्षयोपशम से प्राप्त व्याख्या करने वाले आगम आचारांग आदि होने वाला सम्यक्त्व चरमशरीरी-उसी भव में मुक्त होने वाला जीव क्षायिक चारित्र-मोहनीय कर्म के सर्वथा विलय से प्राप्त चरित्त धर्म-आचरण-प्रधान धर्म होने वाला चारित्र चरित्र (चारित्र)-आचरण क्षीण मोह-वीतराग चरिम-जिसके जन्म-मरण की परम्परा का अन्त निश्चित क्षेत्र-आकाश क्षेम-प्राप्त की सुरक्षा चारित्त सामायिक-सामायिक का एक भेद चारित्र मोहनीय--चारित्र को विकृत बनाने वाला या उसका गणधर-तीर्थकरों के प्रधान शिष्य निरोध करने वाला मोहकर्म गणपति-आचार्य चारित्रावरणी-चारित्रमोहनीय गणितानुयोग---गणित की व्याख्या करने वाला आगम चन्द्र- चैत्य-उद्यान प्रज्ञप्ति आदि चोथ-भक्त-उपवास गति–एक जन्म-स्थिति से दूसरी जन्म-स्थिति को प्राप्त च्यार जाम-चार महाव्रत करना गिलाण-रुग्ण छट्ठाणवडिया--गुणों की न्यूनाधिकता के आधार पर एक गीतार्थ-बहुश्रुत वस्तु या व्यक्ति का दूसरे वस्तु या व्यक्ति से छह स्थानकों गुणठाण-आत्मा की कमिक विशुद्धि की भूमिका में विभाजन। वे छह स्थानक हैं—संख्यात भाग, असंख्यात गुणरत्न संवत्सर-एक प्रकार का विशिष्ट तप भाग, अनंतभाग, संख्यात गुण, असंख्यातगुण और अनंतगुत्तिदिय-इन्द्रियों पर संवरण करने वाला गुण हीन या अधिक गुप्ति-मन, वचन और काया का संवरण छठभक्त-दो दिन का उपवास गुरुलघु-हल्का और भारी--इन दोनों धर्मों से युक्त पुद्गल छन-चार घाती कर्मों का उदय का एक परिणमन छद्मस्थ-अपूर्णज्ञानी, असर्वज्ञ गोचरी-सामुदानिक भिक्षाचर्या छद्मस्थ-तीर्थकर—केवलज्ञान की साधना करने वाले अर्हत् गोत्र---जीव को ऊंची या नीची दष्टि से देखे जाने में हेतुभूत छेदोपस्थापनी-चारित्र का एक प्रकार, पांच महाव्रत, पांच कर्म पुद्गल समिति और तीन गुप्ति—इस विभागात्मक रूप में ग्रैवेयक-वैमानिक देव, जो लोकपूरुष की ग्रीवा के स्थान में स्वीकार किया जाने वाला संयम रहते हैं जघन-जघन्य चउट्ठाणवडिया-गुणों की न्यूनाधिकता के आधार पर चार जयणा-संयम के प्रति जागरूकता स्थानकों में विभाजन । बे चार स्थानक हैं—संख्यात जाझी-अधिक भाग, असंख्यात भाग, संख्यात गुण और असंख्यात गुण जाणक शरीर-ज्ञाता का शरीर हीन या अधिक जिन-अर्हत्, सर्वज्ञ चउदसपुवी-चौदह पूर्वो का ज्ञाता जिनकल्प-अर्हत् के समान आचार परिशिष्ट ४२७ Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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