Book Title: Anusandhan 2013 03 SrNo 60
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 224
________________ अनुसन्धान - ६० : विज्ञप्तिपत्र - विशेषाङ्क - खण्ड १ (Studies in Nirgranth Art and Architecture - M. A. Dhaky; 2012; Sambodhi Sansthan, 1, Bhagatbaug Society, New Shardamandir Road, Paldi, Ahmedabad - 380007, Gujarat; pp. 354+xiv+145; Price Rs. 3000) २०४ कहावली : एक सीमास्तम्भ रूप प्रकाशन उपा. भुवनचन्द जैन परम्पराए श्रुतज्ञानने - शास्त्राधारित अने गुरु तरफथी मळता ज्ञानने खूबज महत्त्व आप्युं छे. प्रत- पुस्तक - पोथी - पानां ए श्रुतज्ञाननुं मुख्य साधन छे. आथी पोथी-पुस्तक- ग्रन्थ- ग्रन्थभण्डार इत्यादिने आपोआप महत्त्व मळे. पुस्तक - पोथी लखवा - लखाववा, भण्डारनी सार-संभाळ वगेरेने एक धर्मनो दरज्जो मळ्यो छे. तेथी ज जैनो पासे विशाळ ग्रन्थराशि सुरक्षित छे. मुद्रणयुग आवतां हस्तप्रतोमां रहेल ग्रन्थोने मुद्रित रूप आपवानुं कार्य पण एवा ज उत्साहपूर्वक थयुं. छेल्ला सोएक वर्षथी ग्रन्थो छपाता आव्या छे अने मोटा भागना ग्रन्थो छपाइ चूक्या; हवे तो तेमना पुनर्मुद्रणनो तबक्को चाले छे अने E-library नो युग शरू थई रह्यो छे. आम छतां हजी सुधी अमुद्रित रह्या होय एवा पण थोडाक ग्रन्थो छे. एमांनो एक ग्रन्थ छे 'कहावली'. 'कथावली'नी पण एक कथा छे. केटलाक इतिहासना ग्रन्थो होय छे तो केटलाक ग्रन्थो पोते इतिहास सर्जे छे. 'कहावली'नो पण एक इतिहास रचायो छे छेक इ.स. १९३२मां जर्मन विद्वान डॉ. हर्मन जेकोबीए 'कहावली' नुं महत्त्व पिछाण्युं हतुं - नोंध्युं हतुं. आगमप्रभाकर श्रीपुण्यविजयजी महाराज, श्रीकस्तूरसूरीश्वरजी महाराज जेवा विद्याव्यासंगी गुरुजनोए आ ग्रन्थ प्रकाशित करवाना प्रयत्न कर्या हता. श्री भायाणी, श्री मालवणिया, डॉ. उमाकांत पी. शाह, श्री लालचंद गांधी, श्री ढांकी जेवा विद्वानो समये समये आ ग्रन्थ अने ग्रन्थकर्ता विशे अभ्यासलेखो लख्या हता. श्रीजिनविजयजी, श्रीकस्तूरसूरिजीए तो आ ग्रन्थनी प्रतिलिपि, प्रेसकोपी Jain Education International - For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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