Book Title: Agam Sudha Sindhu Part 10
Author(s): Jinendravijay Gani
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala
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________________ RRRRRRRRRRR मी महानिशीधसूत्रे अपयन वपरियारा, देवराणवपश्या। पणइयण रियासा, मुगु- / समसुहावया // 32 // भोगिस्सरियं रायसिरि,गोथमा! तं तवज्जियं / जा दियहा केई मुंजंति, ताव मोहीए जाणिउं // 326 // स्वणभंगुरं अहो पयं, लच्छी पावविव. टणी। ता जाणंसावि किं अम्हे,चारितं नाणुचिरिखमो 1 // 327 // जायेरिस मणपरिणाम, ताव लोगंतिगा सुरा। मुणि भणंति जगज्जीवहियर्य तित्थ पवतिहा // 3 // ताहे वोसह चनदेहा, रिहवं सवजयुत्तमं / गोथमा ! तणमिव परिचिच्चा, जं इंदाणवि दुल्लहं॥३२९॥ नीसंगा उरगं कट्ठं, घोरं अदुस्करं तवं / भुयारसवि उस्कदलं, समुप्पायं चरंति ते // 330 // जे पुण खरहरपुरसिरे, एगजम्मसुहेरिणी। तेसिं दुल्ललिथापि, सुविनी हियरिज्यं // 331 गोयम! महुबिंद्रस्सेच, जावइयं तावश्यं सुटं। मरणंतेपीन संपज्जे, कथरं दुल्ललियनणं ? // 332 // अहवा गोयम! पचक्रखं, पेय जारिसर्थ नरा' दुल्ललियं सुहमणुति, जं निसुणिज्जा न कोइवी // 333 // कई का. ति मासलिलं, हालियगोवालत्तणं। दासतं तह पेसतं, गीतं सिप्पे बह // 334 // ीलग्ग किसिवाणिज्य, पाणयायकिलेसियं / हालिहऽविहवत्तणं कई, कम्म कारण घराधरिं // 335 // अत्ताणं विगोवे, दिणिरिणिते अहिंडिलं.. नग्ग्ग्घाडकिले सेणं, जो समजति परिहारmaan जरजुन्न फुरसछिलई कहकहवि ओटणं / जा अज्जा कल्लिं करिमो, फरटं ता तमवि परिह (पहिरणं॥३३॥ तहा. वि गीयमा ! बुज्झ, फुडवियपरिकुडं / एतेसिं चेव मज्झाउ, अणंतरं भणियाण कस्सई // 33 // लीयं लोथाचारंच, चिच्चा सयणकियं तहा। भोगोगभोग दाण च, भोत्तणं करसणासयं // 329. धावि गुप्पि सुइरं, विजिऊण अह..

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