Book Title: Agam 12 Upang 01 Aupapatik Sutra Sthanakvasi
Author(s): Amarmuni, Shreechand Surana
Publisher: Padma Prakashan

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Page 369
________________ वीईवइत्ता विजय - वेजयंत - जयंत - अपराजिय - सव्वट्टसिद्धस्स य महाविमाणस्स सव्वउवरिल्लाओ थुभियग्गाओ दुवालसजोयणाई अबाहाए एत्थ णं ईसीपब्भारा णाम पुढवी पण्णत्ता । पणयालीसं जोयणसयसहस्साइं आयामविक्खंभेणं, एगा जोयणकोडी बायालीसं च सयसहस्साइं तीसं च सहस्साइं दोण्णि य अउणापण्णे जोयणसए किंचि विसेसाहिए परिरएणं । १६२. भगवन् ! सिद्ध भगवान कहाँ, किस स्थान पर निवास करते हैं ? गौतम ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी के बहुसम रमणीय भूभाग से ऊपर, चन्द्र, सूर्य, ग्रहगण, नक्षत्र तथा तारों के भवनों से बहुत योजन, बहुत सैकड़ों योजन, बहुत हजारों योजन, बहुत लाखों योजन, बहुत करोड़ों योजन तथा बहुत क्रोडाक्रोड योजन से ऊर्ध्वतर- बहुत ऊपर जाने पर सौधर्म, ईशान, सनत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्म, लान्तक, महाशुक्र, सहस्रार, आनत, प्राणत, आरण, अच्युतकल्प तथा तीन सौ अठारह ग्रैवेयक विमान आवास से भी ऊपर ( नव ग्रैवेयक में तीन-तीन के तीन त्रिक समूह हैं । प्रथम त्रिक में 999, दूसरे त्रिक में १०७ तथा तीसरे त्रिक में १०० इस प्रकार तीन सौ अठारह ग्रैवेयक विमान हैं) विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और सर्वार्थसिद्ध महाविमान के शिखर के अग्र भाग से बारह योजन ऊपर ईषत्प्राग्भारा पृथ्वी (सिद्धशिला ) है । वह पृथ्वी पैंतालीस लाख योजन लम्बी-चौड़ी है। एक करोड़ बयालीस लाख तीस हजार दो सौ उनचास योजन से कुछ अधिक परिधि वाली है । 162. Bhante ! Where do the Siddhas reside ? Gautam Many Yojans above the beautiful land known as Ratnaprabha Prithvi and abodes of Moon, Sun, planets, constellations and stars; in fact hundreds of Yojans, thousands of Yojans, hundreds of thousands of Yojans, millions of Yojans, million times millions of Yojans above them, even above the heavens (devlok) known as Saudharma, Ishan, Santkumar, Mahendra, Brahma, Lantak, Mahashukra, Sahasrar, Anat, Pranat, Aran, Achyut and the three hundred eighteen Graiveyak Vimans (they are in three groups having 111, 107 and 100 Vimans in this class of heavens) and twelve Yojans above the highest point of Vijaya, Vaijayant, Jayant, Aparajit and Sarvarthasiddha Anuttar Vimans is located the Ishatpragbhara Prithvi (Siddhashila). (Ishatpragbhara Prithvi literally means 'the land or world just before the edge'.) अम्बड़ परिव्राजक प्रकरण ବହୁତ ବଳ ବହୁଳ ମଦ ବହୁତ ବ Jain Education International (323) For Private & Personal Use Only Story of Ambad Parivrajak www.jainelibrary.org

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