Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 17 Sthanakvasi Author(s): Ghasilal Maharaj Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti View full book textPage 5
________________ મળવાનું ઠેકાણું : श्रीम. ली. वे स्थानवासी નશાઓદ્ધાર સમિતિ, ४. गरेडिया वा रोड, रा०, ( सौराष्ट्र ). 過 ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवज्ञाँ, जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नैष यत्नः । उत्पत्स्यतेऽस्ति मम कोऽपि समानधर्मा, कालोह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी ॥ १ ॥ Published by: Shri Akhil Bharat S, S Jain Shastroddhara Samiti, Garedia Kuva Road, RAJKOT, (Saurashtra), W. Ry, India. 5 हरिगीतच्छन्दः लिये ॥ करते अवज्ञा जो हमारी यत्न ना उनके लिये । जो जानते हैं तव कुछ फिर यत्न ना उनके जनमेगा मुझसा व्यक्ति कोई तव इससे है काल निरवधि विपुलपृथ्वी ध्यान में यह लायगा ॥ १ ॥ पायगा । પ્રથમ આવૃત્તિ પ્રત ૧૨૦૦ વીર સંવત ૨૪૯૮ વિક્રમ સવત્ ૨૦૨૮ ઇસવીસન १८७२ શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૭ भूल्यः ३. ३५=00 : भुद्र : મણિલાલ છગનલાલ શાહ નવપ્રભાત प्रिन्टींग प्रेस, घीठांटा रोड, अभहाबाहPage Navigation
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