Book Title: Sumitra Charitram
Author(s): Shubhshil Gani
Publisher: Hiralal Hansraj Pandit
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ DEDISSERISEDSSISERS DEDIO // श्रीसुमित्राचारित्रम् // // श्रीजिनायनमः // (भाषांतरसहित) ___ (कर्ता-श्रीवर्धमानसूरि) 0000000 सने 1934 छपावी प्रसिद्ध करनार-पंडित श्रावक हीरालाल हंसराज (जामनगरवाळा) किंमत रु..-८-० 1 श्रीजन भास्करोदय प्रिन्टिग प्रेसमा छाप्यु---जामनगर. सर्वत् 1991 DODESDEDEOSEED86660 Page #2 -------------------------------------------------------------------------- _ Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ মিনু // 1 // ACEAECASHA RA // श्रीजिनाय नमः // // अथ श्रीसुमित्राश्राविकाचरित्रं प्रारभ्यते // .. गुजराती भाषांतर कर्ता-पंडित श्रावक हीरालाल हंसराज (जामनगरवाळा) (द्वितीयावृत्तिः) (मूळकर्ता-वर्धमानसूरि) दानं चतुर्विधाहारवस्त्रपात्रोकसां मुनौ / शिक्षावतं तदतिथिसंविभागं तुरीयकम् // 1 // अ० चा प्रकारना आहार, वस्त्र, पात्र तथा उपाश्रयो- मुनिओने जे दान आप, तेने चोधुं अतिथिसंविभागनामनुं शिक्षा-18 व्रत कहेलुं छे. // 1 // एकावयवतोऽप्येतत्सेवितं श्रद्धयाधिकम् / सुमित्राया इवोन्नत्यै जायते द्वादशं व्रतम् // 2 // अ०-एक देशथी पण अधिकपणे श्रद्धापूर्वक सेवेलं आ बारमुं व्रत सुमित्रानीपेठे उन्नतिमाटे थाय छे. // 2 // तद्यथा पृथिवीभूषा श्रीवसन्तपुराभिधम् / पुरन्दरपुरश्रीणां विवों वर्तते पुरम् // 3 // अ०-ते सुमित्रानुं उदाहरण नीचेमुजब छे-पृथ्वीने शोभावनारुं, इन्द्रनी नगरीनी लक्ष्मीना घेरावा सरखं श्रीवसंतपुरनामनु नगर छे. SAIBAROBARA B Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विक्रमाक्रान्तदिक्चक्रः क्षमाशको विक्रमाभिधः / नृपः / कृपापवित्रोऽभूत्तत्र क्षत्रशिरोमणिः // 4 // सुमित्रा अ०-ते नगरमां पराक्रमथी जीतेल छे दिशाओनो समूह जेणे, पृथ्वीपर इन्द्रसमान, अने क्षत्रीओमां शिरोमणि विक्रमनामे राजा इतो. 18 चरित्रम् तन्मन्त्रीशो वसुर्जज्ञे यबुद्धिभरनीरजे / राज्यलक्ष्मीः सुखं तस्थौ विकाशाढ्ये दिवानिशम् // 5 // // 2 // अ०-वसुनामे तेनो मंत्रीश्वर हतो के जेनी बुद्धिना समूहरूपी विकस्वर कमलपर राज्यलक्ष्मी हमेशां सुखेथी रहेती हती.॥५॥ जिनदासाभिधः श्रेष्ठी तस्ध पृथ्वीपतेः प्रियः बभूव तीर्थकृद्धर्मधौरेयः श्रेयसां निधिः // 6 // अ० ते राजाने व्हालो तथा जिनधर्ममां अग्रेसर, अने कल्याणना भंडारसरखो जिनदासनामनो शेठ हतो. // 6 // है तदर्जितैरसंख्यातैः स्वर्णरत्नैरपि ध्रुवम् / निष्पौद्यते क्षितौ भेरुरोहणावपरावपि // 7 // अ०-तेणे मेळवेलां असंख्यातां स्वर्ण अने रनोथी पण खरेखर पृथ्वीपर बीजा मेरु अने रोहणाचल पण बनावी शकाय. // 7 // यक्षराजो धनाध्यक्ष इत्येव ख्यातिमहति / धनदो जिनदासस्तु स स्तुतोऽर्थिगणैरपि // 8 // __ अ०-कुबेर तो धनना मालिकपणानीज प्रख्यातिने लायक छे, अने आ जिनदास तो धन आपनारो छे, एम याचकोना समूहो तेनी स्तुति करता हता. // 8 // धनस्य सार्थवाहस्य सुतां काशिनिवासिनः। ख्यातां रत्नवतीं नाम्ना व्वहारी युव्यवाह स // 9 // SRAलसर Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुमित्रा चरित्रम // 3 // GEOG अ-काशीनगरीना रहेवासी धननामना सार्थवाहनी रत्रवती नामनी प्रख्यात पुत्रीने ते व्यापारी परण्यो हतो. // 9 // जिनदासस्य विश्वासपात्रं लक्ष्मीधराभिधः / विप्रो बभूव भ्रातेव चरमः परमः सुहृत // 10 // अ०-ते जिनदासनो लक्ष्मीधरनामनो ब्राह्मण विश्वासु अने न्हाना भाइ सरखो परम मित्र हतो. // 10 // न मन्त्री न कलत्रं न पुत्रो धात्रीपतेः पुनः / नान्य किचिच्च तस्याभूजिनदास इव प्रियम् // 11 // अ.--वळी ते राजाने ते जिनदासनीपेठे नही मंत्री, नही स्त्री, नही पुत्र, के वीजु कंइ पण प्रिय होतं. // 11 // मित्रे नृपः कदाप्यत्र मन्त्रितामपि दास्यति / राजमन्त्रीति तं हन्तु विरुद्धं विदधे मनः // 12 // अ० *राजा कोइ पण दिवसे (पोताना) आ मित्रने मंत्रीनी पदवी पण आपी देशे, एम विचारी ते राजानो मंत्री ते जिनदासने | मारवाने विरुद्ध विचार करतो हतो. // 12 // जिनदासस्तु दाक्ष्येण परचित्तोपतक्षकः / चक्षुर्वचोविकारेण तं विरुद्धमबुध्यत // 13 // अ०-चतुराइथी परना हृदयने ओळखनारा ते जिनदासे तो आंखोना तथा वचनोना विकारथी ते मंत्रीने शत्रु तरीके जाणी लीधो. तसो भृपालमापृच्छय तीर्थयात्रापदेशतः / पत्नी रत्नवतीं प्रेषीदसौ पितृगृहं प्रति // 14 // अ०-पछी राजानी रजा लेइने तीर्थयात्राना मिपथी तेणे पोतानी पत्नी रत्रवतीने (तेणीना) पिताने घेर मोकली दीधी. // 14 // Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ FR E : 0 अथ चारच्छलेनासौ तमालब्धं कृतादरः / मन्त्री निशि तदावासमार्ग मृत्यैररोधयत् // 15 // 5 अ०-पछी ते मंत्रीए चोरना मिषथी तेने पकडवाने सावधान रहीने रात्रिए तेना घरना मार्गने चाकरोवडे रोकी राख्यो. // 15 // 6 मत्वेति कर्मकृद्वेषः सह लक्ष्मीधरेण सः। प्रभाववन्ति रत्नानि गृहीत्वा निःसृतः पुरात् // 16 // है अ०-एम जाणीने नोकरनो वेष लेइ ते जिनदास शेठ प्रभाविक रत्नो लेइने (पोताना मित्र) लक्ष्मीधरनी साथे नगरमांर्थी IPL नीकळी गयो. // 16 // अजानन्नपि पन्थानं गच्छन्नेष निरन्तरम् अरण्ये पतितः क्वापि तृष्णातरललोचनः // 17 // अ०-मार्ग नही जाणतां छतां पण निरंतर चालतो ते शेठ तृषाथी चपल चक्षुओवाळो थयो थको कोइक जङ्गलमा जइ चड्यो तत्र वस्त्रलवाबद्धां रत्नाली सुहृदः करे। रीणोऽयमर्पयामास जीवितव्यमिवात्मनः // 18 / / अ० त्यां पोताना जीवितव्य सरखी, अने वस्त्रना टुकडामां बांधेली ते रत्नोनी श्रेणीने, गभरायेला ते शेठे मित्रना हाथमां सोपी. क्वापि पश्यन्पयः कूपे रत्नलोभाद्विजेन सः कराभ्यां पतितः प्रेर्य विश्वासः कोऽस्तु जीवताम् // 19 // अपळी कोडक कुवामां जलने जोता एवा ते शेठने रत्नोना लोभथी ते ब्राह्मणे बन्ने हाथथी हडसेलीने फेंकी दीधो, जीवता माणसनो विश्वास शानो होय ? Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चरित्रम सुमित्रा // 5 // % ...] त तदा पतितः कूपे कोऽयमित्यशृणोद्वचः / उपलक्ष्य स्वरेणाथ प्राह रत्नवती प्रियाम् // 20 // & अ०-कूवामां पडेला ते शेठे ते वखते 'आ कोण छे ?' एवं वचन सांभळ्यु, पछी स्वरथी पोतानी स्त्री रत्नवतीने ओळखीने / ते बोल्यो के, // 20 // अयि त्वमपि पेऽत्र पतितासि कुतः प्रिये / स ते परिजनः क्वास्ति धिग्धिग्विधिविडम्बितम् // 21 // अ०-अरे मिया! तुं पण आ कुवामां क्याथी पडी छे? तारो ते परिवार क्यां छे? धिक्कार छे! धिक्कार छे ! विधातानी विडंबनाने ! साप्यवस्थागतं कान्तं वीक्ष्य प्राप्तं च संनिधौ / बाष्पं दृशि दधौ दुःखानन्दसंकरसंकटम् // 22 // अ०-पछी ते रनवती पण आपत्तिमां पडेला. तथा (पोतानी) पासे आवेला (पोताना) स्वामीने जोइने दुःख तथा हर्षथी मिश्रित थयेलां आंसुओ चक्षुमां धरवा लागी. // 22 // मन्वाना धन्यमात्मानं तत्रापि प्रियदर्शनात् / ऊचे सतीशिरोरत्नमियं रत्नवती ततः // 23 // अ०-पछी सतीओमां शिरोमणि एवी ते रत्नवती त्यां पण स्वामीना दर्शनथी पोताने धन्य मानतीथकी कहेवा लागी के, // 23 // तत्सर्वमटवीमध्ये गृहीतमिह तस्करैः / कान्दिशीकः समग्रोऽपि ययौ परिजनः क्वचित् // 24 // २०-ते सघळं अहीं बननी अंदर चोरोए लुटी लीधुं, अने पछी सघळो परिवार पण गभराइने क्यांक चाल्यो गयो. // 24 // ACCECare Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुमित्रा चरित्रम तेषु मद्भोगलुब्धेषु वेगादहमिहापतम् / वरं हि मरणं स्त्रीणां न पुनः शीलखण्डनम् // 25 // __ अ० तेओ मारी साथे भोग भगववाने लालचु थये छते, हुं एकदम आ कूवामां पडी, केमके स्त्रीओने माटे मृत्यु पामबुं सारं, | परंतु शीलनु खन्डन थQ सारुं नथी. // 25 // कृतान्तमुखरूपेऽस्मिन्कूपेऽपि पतिता प्रिय / जीवितास्मि भवद्वक्तालोकभोक्तव्यकर्मभिः // 26 // अ०-हे स्वामी ! यमना मुख सरखा आ कूवामां पड्या छतां पण आपनु मुख जोवाना भोगावली कर्मोथी हुँ जीवती रही हूं. कथ्यतां च कयं पातः कूपेऽत्र भवतामपि / सचिवः स च विद्वेषी विदधे किं विरोधतः // 27 // अ०-वळी कहो के, आ कुवामां आपनुं पण शांथी पडवू थयु ? अने ते द्वेषी मंत्रीए विरोधथी शुं कर्यु ? // 27 // जगाद जिनदासोऽथ सचिवे मारणोत्सके गृहतः कर्मकत्कटादेकोऽहं निशि निःसृतः // 28 // अ०-पछी जिनदासे का के ते मंत्री ज्यारे मारवाने उद्यमवन्त थयो, त्यारे हुं नोकरनो वेष लेइ एकाकी घरमांथी रात्रीए नीकळी गयो. निरन्तरविहारेण कान्तारेऽत्र समागतः / तृषितोऽस्मिन्पयः पश्यन्पादस्खलनतोऽपतम् // 29 // अ०-पछी निरंतर चालतो थको हुँ आ वनमां आवी चडयो, तथा तृषा लागवाथी आ कुवामां जल जोतोथको पग सरीपडवाथी (अंदर) पडी गयो.॥ 29 // मनावर Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुमित्रा CRE CSABA अनुक्तमित्रदौष्ट्यस्य तदा तस्यातिसत्त्वतः / कूपेऽस्मिन्निर्जलेऽप्यम्मो नाभिदनं ददुः शिराः // 30 // चरित्रम् 4 अ०-ते समये मित्रनो दोष नहीं बोलनारा एवा ते जिनदासशेठेना अतिशयथी ते निर्जल कूवामां पण सरवाणीओए इंटी || A सुधीनुं जल आप्यु. // 30 // __ अथ तौ प्रथितस्वेदखेदतृष्णापरम्परौ। जितक्षीरेण नीरेण तेन प्रीतिं परां गतौ // 31 // . अ०-पछी थयेल छे, पसीनानी, थाकनी तथा तृषानी परंपरा जेओने एवा तेओ बन्ने धने पण जीतनारां ते जलवडे परम आनंद पाम्या. // 31 // / अथ कूपेऽत्र केनापि सज्जरज्जुनियन्त्रितः क्षिप्तोऽम्भःकृतये कुम्भः पुण्यकुम्भ इवैतयोः // 32 // अ०-एवामां ते कूवामा जल लेवामाटे, तेओ बन्नेना पुण्यकुंभनी पेठे दोरीमां बांधेलो घडो कोइए नाख्यो. // 32 // ततोऽन्तः कुम्भरोधेन तो मत्वा तेन धीमता / मेलयित्वा जनान्कृष्टौ कूपान्मृत्योर्मुखादिव // 33 // 4 अ०-पछी अंदरथी घडो पकडी राखवाथी, तेओ बन्ने अंदर पडेला जाणीने ते बुद्धिवाने लोकोने एकठा करीने, मृत्युना 8 मुखमांथी जेमतेम ते कूवामांथी (बहार) खेंची कहाड्या. // 33 // . . . . . . & यावत्तो निःसृतो सार्थस्तावदने स्थितो महान् / निर्गतं मिथुनं कूपादिति कोलाहलं व्यधात् // 34 // करवाकर Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SAGAR अ०-जेवामां तेओ बन्ने (बहार) नीकळ्या, तेवामां आगळ रहेला लोकोना ते म्होटां टोळांए " कूवामांची जोडकुं नीकळ्यु " एम कोलाहल कर्यो. // 34 // तच्छब्दात्कौतुकी सार्थवाहोऽपि द्रुतमागतः। सुतां पतियुतामग्रे पश्यन्मनसि विस्मितः // 35 // अ०-ते कोलाहलथी ते कौतुक जोवानी इच्छावाळो ते सार्थवाह पण तुरत (त्यां) आव्यो तथा आगळ (पोताना) पति सहित Puc // पुत्रीने जोइने मनमां आश्चर्य पाम्यो. // 35 // धनाख्यं जिनदासोऽपि सार्थवाहं निरीक्ष्य तम / श्वशरोऽयमिति ज्ञात्वा नमश्च चमकती अ०-जिनदासे पण ते धन नामना सार्थवाहने जोइने, आ तो मारा ससरा छे, एम जाणीने आश्चर्य पामी नमस्कार कर्यो. // ननाम नितरां प्रीत्या पितरं रत्नवत्यपि / अहो भाग्यस्य सौरभ्यं चिन्तयन्ती स्वचेतसि // 37 // अ०-अहो! भाग्यनी केवी खुबी छे? एम पोताना मनमां चिंतवती रत्नवतीए पण अत्यंत आनंदथी (पोताना) पिताने नमस्कार कर्यो. अथास्मै सार्थवाहाय किमेतदिति पृच्छते। जिनदासः स्ववृत्तं तदादितोऽपि न्यवेदयत् // 38 // अ०-पछी आ ते शुं थयु? एम पूछता ते सार्थवाहने ते समये जिनदासे पण पोतानुं वृत्तांत पहेलेथी कही संभळाव्यु. // 38 // तादक्स्वजनसंपर्कनिपीतव्यापदूर्मयः / अथ ते तोषपोषेण तस्थुर्वसनवेश्मनि // 39 // COACEबर Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुमित्रा चरित्रम A%- // 9 // अ०-पछी तेवी रीतना खजनोना मेलापथी नष्ट थयेल छे दुःखनी ऊर्मिओ जेओनि एवा तेओ सर्वे आनंदथी तंबूझोमा रह्या. अथास्मिंश्चरिते चित्रे गत्वार्केणेव शंसिते / तद्वीक्षाकौतुकेनेव संध्यायां विधुरुद्ययौ // 42 // अ०-पछी आ आश्चर्यकारक वृत्तांत सूर्ये जइने जाणे कह्यो होय नहीं! तेम ते जोवाना कौतुकथी जाणे संध्याकाळे चन्द्रनो उदय थयो. तोयपात्रं गृहीत्वाथ जिनदासो निशागमे / तरूनन्तरयामास देहचिन्ताकृते बहून् // 43 // अ०-एवामां रात्रिपडवाबाद ते जिनदासशेठ जलनुं पात्र लेइने शरीर चिंतामाटे (जतोयको) घणां वृक्षोने वटावीने (भागळ चाल्यो.) अथेन्दद्यतिभिर्वीक्ष्य सुप्तं कंचिदसौ नरम् / यावद्यात्यग्रतस्तावन्मृतो लक्ष्मीधरः पुमान् // 44 // अ०पछी ते जिनदास चन्द्रना तेजथी कोइक पुरुषने सुतेलो जोइने, जेवामां तेनी पासे जाय छे, तेवामां ते पुरुषने मृत्यु पामेला लक्ष्मीधर तरीके (ओळख्यो.) / / 44 // मृतमक्षतमेवैनं वीक्ष्यासौ मित्रवत्सलः भुजङ्गदशनं तस्मिन्निश्चिनोति स्म दुःखितः // 45 // अ०-घायल थयाविनाज तेने मृत्यु पामेलो जोइने,मित्रपरना प्रेमवाळा ते जिनदासे दुःख पामीने तेने सर्प दंशेलोछे, एवो निश्चय कर्यो. - आदाय स्वान्मणीस्तस्मात्कृष्ट्वा फणिमणि ततः। तदीयस्पर्शपूतेन पयसा तमजीवयत् // 46 // अ०-पछी पोताना मणिओने लेइने, तथा तेमांथी फणामणिने कहाडीने, तेना स्पर्शथी पवित्र धयेलां जलवडे तेणे तेने जीवतो कर्यो. कवक A Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ a उपकृत्युपकुर्वाणा ध्रियन्ते धरया न के। अपकृत्युपकारी यस्तेन तु ध्रियते धरा // 47 // सुमित्रा 31 अ०-उपकार करनारपर उपकार करनारा केटला माणसोने पृथ्वी धारण करती नथी ? परंतु जे अपकार करनार पर उपकार 8/चरित्रम् ल करे छे, ते माणसज आ पृथ्वीने धारण करे छे. // 47 // // 10 // वीक्ष्य लक्ष्मीधरो जीवञ्जिनदासमथाग्रतः / त्रपानतमुखाम्भोजस्तत्सोहार्दमिवानमत् // 48 // // 10 // अ०-पछी जीवतो थयेलो ते लक्ष्मीधर (पोतानी) आगळ (उभेला) जिनदासने जोइने, तेनी मित्राइनीपेठे लज्जाथी ( पोतानुं ) मुखकमल नमावीने नम्यो. // 48 // / अर्थनमाह माहात्म्यमयो रत्नवतीपतिः / अन्तःप्रेमसुधासिन्धुतरङ्गोत्तरया गिरा // 49 // अ०-पछी ते महिमावत जिनदासशेठ हृदयनी प्रीतिरूपी अमृत सागरना मोजांसरखी उत्तम वाणीथी तेने कहेवा लाग्या के, पादस्खलनतः कूपे पतितोऽहं त्वयोज्झितः / इति किं लजसे केन स्वोऽप्यनुम्रियते जनः // 50 // अ०-पग सरी पडवाथी हुँ कूवामां पडी गयो, अने तें मने तजी दीधो एमां तुं शामाटे शरमाय छे ? केमके पोताना संबन्धिनी पाछळ पण मरवाने कोण तैयार थाय छे ? // 50 // मिलितोऽस्मिन्ममारण्ये सार्थवाहोऽधुना धनः / काशी यास्याम्यहं गच्छ स्वावासं प्रति संप्रति // 51 // कालवाल Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुमित्रा // 11 // // 11 // % A4GRAPPEC अ०-आ जंगलमां हमणाज धनसार्थवाह मने मळ्या छे, अने हुं काशी जाउं छु, अने तुं पण हवे तारे पोताने घेर जा? // 51 // इत्युक्त्वा प्रेषितो विप्रस्त्रपमाणस्तदा ययौ। सहैव सार्थवाहेन सोऽपि वाणारसीमगात् // 52 // अ०-एम कहीने मोकलेलो ते ब्राह्मण ते समये लज्जातुर थयोथको (त्यांथी) चाल्यो गयो, अने से जिनदास पण ते सार्थवाहनी साथे वाणारसी नगरीमा गयो. // 52 / / यावल्लक्ष्मीधरो याति वसन्तपुरपत्तनं / जिनदासवियोगेन तावदातोऽस्ति भूपतिः // 53 // अ०-हवे ते लक्ष्मीधर जेवामां बसंतपुर नगरमा पहोंच्यो, एवामां राजा ते जिनदासना वियोगथी पीडित थयेलो हतो. // 53 // इति लक्ष्मीधरो मत्वा गत्वा क्षितिपतेः पुरः / स्वरूपं जिनदासस्य मन्त्रिणश्चन्यवेदयत् // 54 // अ०-लक्ष्मीधरे ते वृत्तांत सांभळीने राजा पासे जइ जिनदासनी तथा मंत्रीनी ते हकीकत जाहेर करी. / / 54 // श्रुत्वेति भूभुजा मन्त्रि कारागारे नियन्त्रितः / पश्यतो जिनदासस्य हन्तव्योऽयमिति कुधा // 55 // अ०-ते हकीकत सांभळीने जिनदासना देखतांज आने मारवो छे, एवा क्रोधथी राजाए तेने छेदखानामां पूर्यो. // 55 // अथ जडालकरभारूढो वीरद्वयान्वितः। जगाम जिनदासाय काशी गुप्तो नृपः स्वयम् // 56 // / अ०-पछी ते राजा पोते वेगवाला उटपर चडीने वे सुभटो सहित गुप्त रीते काशी नगरीमा जिनदास पासे गयो. // 56 // Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ HAR ब- // 12 // // 12 // % कार्यों मन्त्री स एवेति वचो निश्चित्य धर्मधीः / सभार्यः सह भूपेन स वसन्तपुरं ययौ // 57 // / अ०-तेने मंत्री करवो, एवं वचन लेइने धर्मबुद्धिवाळो ते जिनदास स्त्रीसहित राजानी साथे (पाछो) बसन्तपुरमा गयो. // 57 // 1 सर्वैश्वर्य नृपादाप्य सचिवायापकारिणे / मन्त्रित्वं स ददौ धीमान द्विष्टा पकारिणः // 58 // & अ०-राजापासेथी सर्व अधिकार मेळवीने ते बुद्धिवान जिनदासे ते अपकार करनारा मंत्रीने मंत्रीपणुं आप्यु, केमके परोप-6 कारी मनुष्यो द्वेषवाळा होता नथी. // 58 // अथागाद्वनपालोऽत्र वर्धयन्निति भूपतिम् / वनेऽभूत्केवलज्ञानं शङ्करस्तपस्यतः // 59 // अ०–एवामां वनपाल एवी वधामणी आपतो थको त्यो राजा पासे आव्यो के, वनमां तप करता शङ्करनामना मुनिराजने 1 केवळज्ञान थयुं छे. // 59 // तुष्टिदानं प्रदायास्मै वनेऽगाद्विक्रमो नृपः / सहैव जिनदासेन धुर्या धर्मे हि तादृशाः // 6 // अ०-पछी विक्रमराजा तेने तुष्टिदान आपीने जिनदाससहित वनमा गयो, केमके तेवा मनुष्यो धर्ममा अग्रेसर होय छे. // 6 // मुनि नत्वोपदेशं च श्रुत्वावादीददो नृपः / मन्मित्रे जिनदासे कि सापदः संपदः प्रभो // 61 // अ०-मुनिराजने वांदीने, तथा धर्मोपदेश सांभळीने राजाए एम का के, हे भगवन् ! (भा मारा मित्र जिनदासने विपत्तिसहित % व जर Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॐ चरित्रम् // 13 // समित्रा संपदा केम थइ ? // 6 // अथ ज्ञानामृताम्भोधिर्दशनद्युतियोचिभिः / तत्पुण्यवेलाविपिनं प्लावयन्प्रभुरभ्यधात् // 6 // // 13 // अ०-त्यारे ज्ञानरूपी अमृतना महासागर सरखा ते केवली भगवान दांतोनी कांतिना मोजांओथी तेना पुण्यरूपी किनारापरना 6 बगीचाने सींचता थका बोल्या के, n 62 // कौशाम्ब्यां दत्तनामाभून्मातृभक्तो धनी वणिक् / सुमित्राख्या जनन्यस्य दयिताच जयाह्वया // 33 // अ०-कौशांबीनगरीमा दत्तनामे (एक) मातानी भक्ति करनारो धनवान् वणिक हतो, तेने मुमित्रानामनी माता, तथा जया४/ नामनी स्त्री हती. // 63 // दानमेव गृहस्थानां मुख्यो धर्म इति स्फुटम् / स्वगुरोर्वाचमाचख्यो सुमित्रा सूनवेऽन्यदा // 64 // अ०-दानज गृहस्थोनो प्रगट रीते मुख्य धर्म छे, एम पोताना गुरुनी वाणी सुमित्राए एक दिवसे (पोताना) पुत्रने कही. // 64 // दानोन्मुखं मनो मातुर्मत्वा मतिमतां वरः / आनन्दाजननीं नत्वा सभायः स व्यजिज्ञपत् // 65 // अ०-माताना मनने दानमाटे उत्सुक जाणीने ते उत्तम बुद्धिवान दत्तवणि के स्त्री सहित आनंदथी माताने का के, // 65 // यथाविधि सुपात्रेषु कृपापात्रेष्वपि स्वयम् / देहि त्वं हि धनं धान्यं त्वत्प्रसादाद् गृहे बह // 66 // अ०, सुपात्रोने तथा दया करवालायक मनुष्योने पण विधिपूर्वक तमो पोते धन धान्य आपो ? केमके तमारी कृपाथी (आपणा) UARCREAL 31 Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुमित्रा // 1 // घरमा ते घणां छे. // 66 // सत्फलं नियमान्मत्वेत्येषाभिग्रहमग्रहात् / स्वेच्छया विधिवदानं दत्वा भोक्ष्येऽहमन्वहम् // 67 // चरित्रम् अ०-नियम लेवाथी उत्तम फल मळे छे, एम जाणीने, मारी इच्छा मुजब हमेशां विधिपूर्वक दान आपीने हुं भोजन करीश, | // 14 // एवो तेणीए अभिग्रह लीधो. // 67 // ततः सुतस्नुषाभ्यां चानुमताभिमतं निजम् / पूरयन्ती मुदा कालं कियन्तं सात्यवाहयत् // 68 // अ०-पछी पुत्र अने पुत्रवधूए अनुमोदेलां पोतानां वांछितने पूरती एवी ते हर्षथी केटलोक समय निर्गमन करवा लागी. 684 दैवज्ञैः कथितेऽत्यर्थमवृष्टे दारुणेऽन्यदा / दुर्भिक्षे सर्वतो जाते जया दत्तमदोऽवत् // 6 // अ०-पछी एक दिवसे ज्योतिषीओए अत्यंत भयंकर अवृष्टि थवानुं कहेवाथी चोतरफथी दुष्काळ यये छते जयाए दत्तने एम कर्दा के, मुलेऽपि रौरवः कालोऽपत्यपूर्ण च ते गृहम् / अतः स्वां जननी दानात्कुटुम्बाधार वारय // 70 // अ०-हे कुटुम्बना आधारभूत स्वामी ! मूलमां आ दुष्काळ पण भयंकर छे, अने तमारुं आ घर छयांछोकरांओथी भरेलुं छे, माटे आपनी माताजीने हवे दान देतां अटकावो? अथ तेन निषिद्धाम्बा सुमित्रा दानतः क्षणात् / निःसत्वतामपि ह्यङ्गीकुर्वन्ति स्त्रीजिता नराः // 71 // जबरAALAB Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ // 15 // समित्रा अ०-पछी तेणे क्षणवारमा ते सुमित्रामाताने दान आपती अटकावी, केमके स्त्रीने वश थयेला पुरुषो निर्बलपणानो पण चरित्रम् स्वीकार करे छे. // 71 // // 15 // IMI संस्मृत्य नियम सा स्वं निश्चिकायेति चेतसि / अदत्ते भोज्यमात्रेऽपि न भोक्ष्येऽन्तेऽपि जन्मनः / 72 / MI अ०-(पछी) तेणीए पोताना नियमने याद करीने मनमां एवो निश्चय कर्यो के, भोजन जेटलं पण दान दीधा विना हुं जीव है। जतां पण जमीश नहीं. // 72 // उपवासाष्टकस्यान्ते तस्याः सत्त्वमहानिधेः / वृत्तमज्ञापयतं दुर्यशःशङ्किता जया // 73 // 5 अ०-हिंमतना महान् भंडारसरखी एवी तेणीने आठ उपवासो थयाबाद अपयशनी शंकावाळी जयाए दत्तने ते वृत्तांत जणाव्यो. दत्तेन बन्धुभिः सार्ध निर्बन्धं बन्धताधिकम् / नवमेह्नि भोक्तुमुपवेशिता सेत्यचिन्तयत् // 74 // अ०-पछी बन्धुओ सहित ते दत्ते अत्यन्त आग्रह करीने नवमे दिवसे भोजन करवामाटे बेसाडेली ते एम चिंतववा लागी के, कारणं भोजनत्यागे विदन्नपि सुतः स्वयम् / न मां दापयते किंचिद्धिग्मे दुःकर्मजम्भितम् // 75 // अ०-आ पुत्र पोते मारां भोजन तजवाना कारणने जाणता छतां पण मने [दानमाटे] कंइ अपावतो नथी, माटे मारां दुष्कर्मना 4 उदयने धिक्कार छे. // 75 // मायकल Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ar चरित्रम // 16 // तत्स्वभोज्यमिदं किंचित्कस्मैचिच्चेद्ददेऽधुना / तन्मे स्यान्नियमः श्लाघ्योऽश्लाघ्यो न स्याच्च मे सुतः 76/4 सुमित्रा / अ०-माटे आ मारुं किंचित् भोजन आ समये जो हुँ कोइने आपुं, तो मारो नियम प्रशंसनीय थाय, अने आ मारा पुत्रनो अपयश न थाय. // 76 // // 16 // ध्यायन्त्येति गृहायातः सहसैव मुनिस्तदा / अदृश्यत तया मूर्तः पुण्यराशिरिवात्मनः // 77 // अ०-एम विचारती ते मुमित्राए पोताना मूर्तिवंत पुण्यना समूह सरखा, अचानक ते समये धेर आवेला मुनिराजने जोया. 77 साधो विशुद्धमाहारं गृहाणानुगृहाण माम् / वदन्त्येति सहर्षाश्रु प्रत्यलाभि मुनिस्तया // 78 // अ०-हे मुनिराज! आ शुद्ध आहार ग्रहण करो ? अने मारापर कृपा करो ? एम बोलती ते सुमित्राए हर्षाश्रुसहित ते मुनिराजने पतिलाभ्या. // 78 // गन्धाम्बुपुष्पवर्षान्तेऽवदच्छासनदेवता / धन्ये मासोपवासी यत्पारणं कारितस्त्वया // 79 // 18 तत्ते सत्त्वभवादानाच्छान्ता वृष्टिहृतो ग्रहाः / अस्माद्गर्जिरवादिव्याद् वृष्टो दुर्भिक्षहृद्घनः ॥४०॥युग्मम॥ अ०--सुगंधि जल तथा पुष्पोनी वृष्टिने अन्ते शासनदेवीए कह्यु के, हे धन्ये! तमोए जे एक मासना उपवासी मुनिराजने पार IR कराव्यु, // 79 // तेथी हिम्मत भरेला तमारां दानथी वृष्टिने हरनारा ग्रहो शांत थया छे, अने आ दिव्य गर्जारवथी दकालने 30%-REAC% RESS-CRAFACEUTENT Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुमित्रा चरित्रम् // 17 // // 17 // हरनारो वरसाद वरस्यो छे. // 80 // युग्मम् / अत्रोत्सवे कृते राज्ञा पौरैश्चाक्षतपात्रिभिः / भातरं क्षमयामास नत्वा दत्तो जयान्वितः॥६६॥ अ०-( पछी ) त्यां राजाए तथा ( हाथमां ) अक्षतना पात्रोवाळा नगरना लोकोए महोत्सव करते छते दत्ते जयासहित माताने | नमीने खमावी. // 81 // तेऽथ धम व्यधुः शुकं श्रद्धावंतो निरन्तरम् / भुक्त्वायुस्तत्र जज्ञेऽत्र सुमित्रात्मा नृपो भवान् // 82 // अ०--पछी तेओए श्रद्धापूर्वक निरंतर शुद्ध धर्मने आराध्यो, तथा त्यां आयु संपूर्ण करीने ते सुमित्रानो जीव अहीं तुं राजा थयो. दत्तात्मा जिनदासोऽभूज्जयात्मा रत्नवत्यपि / दानरोधादमूलक्ष्मीस्वन्मित्रे सकृदन्तरा // 83 // अ०–ते दत्तनो आत्मा आ जिनदाप्त थयो, अने आ रत्नवती पण जयानो आत्मा थयो, एरीते दान देवानी अटकायत करवाथी ल आ तारा मित्रने कइंक अंतरवाळी लक्ष्मी प्राप्त थइ. // 83 // M श्रुत्वेति प्राग्भवं स्मृत्वा गुरुं नत्वा गताः पुरम् / धर्मध्यानरताः प्रापुञपाद्यास्ते महोदयम् // 84 // अ०-ते सांभळीने ( तथा जातिस्मरण ज्ञानथी) पूर्व भवने याद करीने, अने गुरुने वांदीने राजाआदिक तेओ नगरमां गया, अने धर्मध्यानमां लीन थइने मोक्षे गया. // 84 // Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चरित्रम् A- // 18 // 3 इत्याकर्ण्य जनाः सौम्यं सुमित्राया निदर्शनम् / व्रतं सेवध्वमतिथिसंविभागं शुभास्पदम् // 85 // सुमित्रा अ०-हे मनुष्यो ! एरीते ते सुमित्रानुं मनोहर दृष्टांत सांभळीने कल्याणना स्थानरूप अतिथिसंविभागवतने सेवो? // 85 // // इति श्राअतिथिसंविभागवतफलोपदर्शने सुमित्राचरित्रं समाप्तम् / // 18 // आ चरित्र श्रीवर्धमानमूरिए रचेला श्रीवासुपूज्यचरित्रमाथी ओधरी तेनुं गुजराती भाषांतर पण्डित श्रावक हीरालाल हंसराजे करी स्वपरना श्रेय माटे पोताना श्रीजैनभास्करोदय प्रेसमां छापी प्रसिद्ध ___कयु. // श्रीरस्तु // // समाप्तोऽयं ग्रंथः गुरुश्रीमच्चारित्रविजय सुप्रसादात् // SGA%95%AASAR सलवाल समाप्त. Page #21 -------------------------------------------------------------------------- _ Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ΌΞΞΞΞΞΞΞΞΞΞΞΞΞΞΞΞΞΞIS hobbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbb ΕΕΕΕΕΕ φφφφφφR ΦΦΦΦΦΦΕ. // इति श्री सुमित्राश्राविकाचरित्रं समाप्तम् / / @@@0000 φφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφφR SelΞΙΦΙΞΙΞΞΞΞΞΞΞΞΞΞΞΞΞΕΟ