Page #1
--------------------------------------------------------------------------
________________
९६
अनुसन्धान-५६
श्रीमतिकीर्त्यपाध्यायविरचिता स्वोपज्ञवृत्तिविभूषिता गुणकित्त्व - षोडशिका
म. विनयसागर
गुणकित्त्व-षोडशिका व्याकरण के एक लघु-अंश पर विचार-विमर्श करती है | व्याकरण शब्दों पर अनुशासन करता है अर्थात् शब्दों के उद्गम स्थान से लेकर उच्चारण पर्यन्त इसका अनुशासन चलता है । इन्हीं वर्णों से मन्त्र और तन्त्रों का भी निर्माण होता है । इसीलिए महाभाष्यकार भगवान पतञ्जलि भी कहते हैं कि 'एक शब्द के भी शुद्ध उच्चारण से समस्त प्रकार का मङ्गल होता है और स्वर या वर्ण का अशुद्ध उच्चारण शत्रु की तरह अनर्थकारी होता है ।' वैयाकरणों की यह मान्य परम्परा रही है कि वे शब्दों के लाघवमात्र से पुत्रजन्मोत्सव की तरह उत्सव मनाते हैं । लेखक परिचय :
मतिकीर्ति खरतरगच्छ की परम्परा में क्षेमकीर्ति शाखा में महोपाध्याय श्रीजयसोम के प्रशिष्य और गुणविनयोपाध्याय के शिष्य हैं । इनका कोई ऐतिहासिक परिचय प्राप्त नहीं होता है, किन्तु मतिकीर्ति में 'कीर्ति' नन्दी को देखते हुए दीक्षा समय का अनुमान किया जा सकता है | युगप्रधान जिनचन्द्रसूरि स्थापित ४४ नन्दियों में 'कीर्ति'नन्दी का क्रमाङ्क ४०वाँ है | कीर्ति नामांकित सहजकीर्त्ति द्वारा सं० १६६१ में रचित सुदर्शन चौपाई, पुण्यकीर्ति द्वारा सं० १६६२ में रचित पुण्यसार रास, विमलकीर्त्ति द्वारा सं० १६६५ में रचित यशोधर रास आदि कृतियों के आधार पर यह अनुमान किया जा सकता है कि 'कीर्त्ति’नन्दी की स्थापना सं० १६५२-५५ के लगभग हुई होगी । अत: मतिकीर्त्ति का दीक्षाकाल भी यही है ।
गुणविनयजी के सहयोग के रूप में इनका उल्लेख सर्वप्रथम सं० १६७१ में मिलता है । 'निशीथचूर्णि' प्रति का संशोधन गुणविनयजी ने मतिकीर्त्ति की सहायता से किया था । उल्लेख इस प्रकार
I
•
" संवत् १६७१ जैसलमेरदुर्गे श्रीजयसोममहोपाध्यायानां शिष्य
Page #2
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
श्रीगुणविनयोपाध्यायैः शोधितं स्वशिष्य - पं० मतिकीर्त्तिकृतसहायकैर्निशीथचूर्णिद्वितीयखण्ड ।"
शाहरुशाह भण्डार, जेसलमेर
सं० १६७३ में प्रणीत 'प्रश्नोत्तरमालिका' में तथा सं० १६७४ में रचित 'लुम्पकमततमोदिनकर चौपाई' में गुणविनयजी ने मतिकीर्त्ति का सहायक के रूप में उल्लेख किया है ।
साहित्य-रचना :
मतिकीर्ति-प्रणीत साहित्य का अवलोकन करने से स्पष्ट है कि ये जैनागमों के प्रौढ विद्वान् थे, शास्त्रीय चर्चा में भी अग्रगण्य थे । व्याकरणशास्त्र के भी ये अच्छे अभ्यासी थे, और राजस्थानी भाषा पर भी इनका अच्छा अधिकार था । इनका साहित्य-सर्जन काल सं० १६७४ से १६९७ के मध्य का है । इनकी प्रणीत १२ कृतियाँ प्राप्त है, जो निम्नांकित है :
१. दशाश्रुतस्कन्धसूत्र - टीका - रचना संवत् १६९७, श्लोक परिमाण१८००० । इसकी एक मात्र प्रति जैनशास्त्र - माला - कार्यालय, लुधियाना में प्राप्त है । महोपाध्याय समयसुन्दरजी ने आपने 'कथाकोश' में इसका उद्धरण भी दिया है । सुना है कि कोई आचार्य महोदय इस टीका का सम्पादन कर रहे
हैं
९७
I
२. निर्युक्तिस्थापन
इसका प्रसिद्ध नाम 'प्रश्नोत्तरशास्त्र' है । आवश्यकनिर्युक्ति के विसंवादपूर्ण वक्तव्यों को १० प्रश्नों के माध्यम से आगमों के प्रमाणों द्वारा सिद्ध करने का प्रयत्न किया है । इसकी रचना संवत् १६७६ के पश्चात् की गई है ।
३. २१ प्रश्नोत्तर साधु लखमसी कृत २१ प्रश्नोत्तर के प्रत्युत्तर दिये गए हैं । गणिपंद का उल्लेख होने से रचना संवत् १६७६ के पश्चात् की गई है ।
I
४. भाष्यत्रय-बालावबोध
रचना संवत् १६७७, स्थल जैसलमेर है । भणसाली - गोत्रीय शाहरुशाह, जैसलमेर के आग्रह से हुई है ।
५. सम्यक्त्वकुलक-बालावबोध - इसकी संवत् १६५५ की लिखित प्रति प्राप्त है ।
-
Page #3
--------------------------------------------------------------------------
________________
९८
६. गुणकित्त्व - षोडशिका
७. अघटकुमार - चौपाई
राज्य में हुई है |
61
खण्डन किया गया है ।
परिचय आगे दिया जाएगा ।
रचना संवत् १६७४ में जिनसिंहसूरि के
-
८. धर्मबुद्धि - सुबुद्धि - चौपाई ९. ललितांग - रास
-
१०. लुम्पक-मतोत्थापक-गीत
अनुसन्धान-५६
-
रचना संवत् १६९७, राजनगर ।
११. पञ्चकल्याणकस्तव - बालावबोध
१२. सप्तस्मरण - स्तबक
इन कृतियों का परिचय देखें
इसमें लोकाशाह के मत का
खरतरगच्छ-साहित्य - कोश |
गुणकित्त्व - षोडशिका
इसमें मूल श्लोक १६ हैं । गुण और कित्त्व पर विचार होने के कारण गुणकित्त्व - षोडशिका नामकरण किया गया है । इस पर स्वोपज्ञ टीका है । यह ग्रन्थ व्याकरण शास्त्र से सम्बन्ध रखता है । धातुरूपों में किस अवस्था में कित्त्व या गुण होता है इस पर सम्यक् रीति से विचार किया गया है । फक्किका स्वरूप इसकी रचना है । टीका में पाणिनि-व्याकरण के सूत्र और धातुपाठ देते हुए इसका सम्यक् प्रकार से प्रतिपादन किया है।
प्रशस्ति में रचना संवत् प्राप्त नहीं है, किन्तु " श्रीजिनसिंहसूरिविजयिराज्ये" उल्लेख होने से स्पष्ट है कि श्रीजिनसिंहसूरि का साम्राज्यकाल १६७० से १६७४ का है, अतः इसकी रचना भी इसी मध्य में हुई होगी । प्रतिलिपिकार :
प्रान्त पुष्पिका में "पं० श्रीजिवकीर्त्तिगणि- लिखितं " लिखा है । इसमें लेखन-संवत् नहीं दिया है । जीवकीर्त्ति में 'कीर्ति'नन्दी को देखते हुए यह अनुमान किया जा सकता है कि मतिकीर्ति के साथ ही इनकी दीक्षा हुई होगी या उसी संवत् के आस - पास हुइ होगी । मतिकीर्ति के साथ या उसके पश्चात् दीक्षा होने से यह स्पष्ट है कि ये भी श्रीगुणविनयोपाध्याय के शिष्य थे । इसके द्वारा रचित साहित्य प्राप्त नहीं है, किन्तु गुणविनयोपाध्याय -रचित भाव
Page #4
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
विवेचन, नल-दमयन्ती-प्रबन्ध और मूलदेव-चौपाई की लिखित प्रतियाँ प्राप्त
इसकी एकमात्र ७ पत्रों की प्रति श्रीखरतरगच्छ ज्ञानभण्डार, शिवजीराम भवन, जयपुर में २०६/५५९ में सुरक्षित है। मैंने इसी प्रति के आधार से सन् १९४५ में प्रतिलिपि की थी । इस भण्डार के अधिकारियों से कई बार अनुरोध करने पर भी यह प्रति पाठमिलान के लिए प्राप्त नहीं हो सकी ।
शब्दानुशासन सम्बन्धी यह लघुकाय ग्रन्थ व्याकरण अध्येताओं के लिए अत्यन्त उपयोगी होगा ।
ठे. प्राकृतभारती,
जयपुर
१. नोंध : आ कृति-लेख घणो अशुद्ध हतो. तेमां पूर्ति अने सुधारा तथा टिप्पणो पण
आवश्यक हतां. ओ बधुं कार्य, मूल प्रतना अभावमां घणुं कठिन अने श्रमसाध्य हतुं. वळी, पाणिनीय व्याकरण पर आधारित रचना होवाथी पण घणी महेनत करवी पडे तेम हतुं. ए बधुं श्रमभयुं काम मुनि त्रैलोक्यमण्डनविजयजीए यथामति-शक्ति करी आप्युं छे, अने ए रीते कृति सम्पादन-कार्यमां तेमणे सिंहफाळो आपेल छे, एटलुं वाचको-सम्पादकनी जाण सारु. - शी.
Page #5
--------------------------------------------------------------------------
________________
१००
अनुसन्धान-५६
गुणकित्त्व - षोडशिका
सर्वत्रेको गुणः प्रोक्तो, विद्भिः सार्व ( र्वार्द्ध )धातुके । उपधाया लघोरेव, पुगन्तस्याऽघोरपि ॥१॥
व्याख्या : सर्वत्रेति निर्विशेषणे सार्वार्द्धधातुके इकः - इगन्तस्याऽङ्गस्य धातोः विद्भिः- शब्दानुशासनरहस्यबोधकैः गुणः प्रोक्तः- कथितः ।' अकारैकारौकारा भवन्तीत्यर्थः । तत्र 'तिशित् सार्वधातुकं' [३/४/११३] तिङिति लट् लुट् लृट् लेट् लोट् लङ् लिङ् आशिषिव्यतिरिक्तस्य ग्रहणं, लिङ्लृटामष्टादशाऽऽदेशा गृह्यन्ते । शितस्त्वमी - शप्, श्लु, श्यन्, श्नु, श, श्नम्, श्ना, शतृ, शानच्, चानश् इति । शेषमार्द्धधातुकं लडादि । तत्र सार्वधातुके उदाहरति- तरति, नयति, भवति, एति । आर्द्धधातुके - कर्त्ता, चेता, स्तोता । सार्व[र्वार्द्ध] धातुके इति किं ? अग्नित्वम् । अग्नित्वमित्यत्र धातोरित्यनधिकृत्य विहितत्वान्नाऽऽर्द्धधातुकसञ्ज्ञा । अग्निकाम्यति । यदि हि प्रत्यये सतीत्युच्येत तदा इहाऽपि स्यात् ।
उपधाया लघोरेवेति उपधाया यदि गुणो भवति तदा लघोरेव ।३ यथा– भेदनं, छेदनं, तोषणम् । न च भेत्ता, छेत्तेत्यत्र संयोगे गुरुरिति, गुरुत्वात् कथं गुणइति शक्यम् ? ' त्रसिगृधिधृषिक्षिपे: क्नु:' [३ / २ / १४० ] 'हलन्ताच्च' [१/२/१०] ति क्नु-सनोः कित्त्वकरणेन ज्ञापितत्वात्, प्रत्ययादेरङ्गावयवस्य च हलोरानन्तर्यत्वे सत्यपि लघूपधायां गुणो न व्यावर्त्यत इति । यदि गुरुत्वादेव गुणो न स्यात् तदा कित्करणमनर्थकमेव स्यात् ।
पुगन्तस्याऽलघोरपीति दीर्घस्याऽपि गुणो भवति । यथा- श्लेपयति, हेपयति, क्नोपयति ॥१॥
७/३/८४
१. सार्वधातुकार्धधातुकयोः २. आर्धधातुकं शेषः ३/४/११४ ३. पुगन्तलघूपधस्य च - ७/३/८६
Page #6
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
तथाऽन्त्यस्याऽञ्णिति प्रोक्तो ऽविचिण्णङित्सु जागरेः । अभ्यस्तस्योपधाया नो, अचि पित्सार्वधातुके ॥२॥ व्याख्या : अन्त्यस्य- अवसानवर्त्तिनः इकस्तथेति ह्रस्वस्य दीर्घस्य च गुणो अणिति प्रोक्त इति, ञिति णिति प्रत्यये गुणो न भवति, तत्र वृद्ध्या तस्य बाधितत्वात् ।९
अविचिण्णङित्सु जागरे इति जागृ इत्यस्याऽङ्गस्य गुणो भवति अविचिण्णल्ङित्सु परतः । इदं बाधकबाधनार्थं न क्ङिती [ १ / २ / ५ ]त्यस्य ञिति णिति परेऽन्त्यवृद्धेश्च बाधनार्थमित्यर्थः । तथा च जागरयति, जागरकः, साधु जागरी, जागरं जागरं, जागरो (घञ्) वर्त्तते इत्यादौ वृद्ध्या न बाधः । कृते च गुणे 'अत उपधाया' [ ७/२/११६] इति वृद्धिः प्राप्नोति सा न भवति । यदि हि स्यादनर्थक एव गुणस्स्याच्चिण्णलोश्च प्रतिषेधवचनमनर्थकम् । विचिण्णल्ङित्सु यथाप्राप्तं कृगृजागृभ्यः क्विनः कित्वाद् गुणाभावो - जागृविः, चिण्- अजागारि, णल्- जजागार, अत्रोभयत्र वृद्धिः ङित् - जागृतः, जागृथ:, ङित्त्वाद् गुणाभावः । वीति केचिदिकारं उच्चारणार्थं वर्णयन्ति, तेन क्वसावपि वकारादौ गुणो न भवति- जजागृवान् । येषां तु नोच्चारणार्थस्तन्मते– जजागर्वानिति रूपम् । अजागरुः, अहं जजागर इत्यत्र गुणस्य प्रतिषेधः प्राप्नोति, नाऽप्रतिषेधात् । अविचिण्णल्ङित्सु इति पर्युदासोऽयम् । ततश्चाऽयमर्थः - विचिण्णल्ङि - व्यतिरिक्ते प्रत्यये गुणो भवति । विनादौ तु न विधिर्न प्रतिषेधः न गुणानुज्ञा । यदि केनापि प्राप्नोति तदा प्राप्नोत्येव । तेन जुसि चेति [ ७/३/८३] गुणोऽजागरुरित्यत्र । लि तु णिद्भावपक्षे 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः ' [ ७/३/८४] इति गुणस्तेन जजागरेति सिद्धम् । अथवा जाग्र इति या प्राप्तिरसावानन्तर्याद् विचिण्णल्ङित्सु इति प्रतिषिध्यते । कित्यप्राप्तं प्राप्य: (प्य) प्राप्तं प्रतिषेधयति ।
I
१०१
अभ्यस्तस्येति अभ्यस्तसंज्ञकस्याऽङ्गस्य उपधाया इक इउऋलृनां [अचि] इत्यजादौ पिति सार्वधातुके नो इति गुणाभावः गुणो न भवतीत्यर्थः। नेनिजानि, अनेनिजं, वेविजानि, अवेविजं, परिवेविषाणि, पर्य्यवेविषम् । अभ्यस्तस्येति किं? वेदानि । अचीति किं ? नेनेति । पिग्रहणमुत्तरार्थम् ।
१. अचो ञ्णिति ७/२/११५ ३. नाऽभ्यस्तस्याऽचि पिति सार्वधातु
-
२. जाग्रोऽविचिण्णङित्सु - ७/३/८५
७/३/८७
Page #7
--------------------------------------------------------------------------
________________
१०२
अनुसन्धान- ५६
सार्वधातुक इति किं ? निनेजः । उपधाया इति किं ? जुहवानि, अजुहवम् । बहुलं छन्दसीति वक्तव्यं जुजोषदिति यथा स्यात् ॥२॥
भूसुवोस्तिड्युतो वृद्धि-र्लुकि हलि सार्वधातुके । विभाषोर्णोर्गुणोऽपृक्ते, न क्ङिति क्वचनाऽपि हि ॥३॥ व्याख्या : भूसुवोस्तिङि इति । नो इति वर्त्तते । ततश्चाऽयमर्थःभूसुवो इत्येतयोः तिङि सार्वधातुके गुणो न भवति । अभूत्, अभूः, अभूवं, सुवै, सुवावहै, सुवामहै । सूतेर्लुग्विकरणस्येदं ग्रहणं, सुवति-सूवत्योर्विकरणेन तिडो व्यवधानात् । विकरणस्यैव च ङित्त्वाद् गुणाभावः सिद्धः । तिङ्ग्रहणं विकरणव्युदासार्थं, तेन तत्र गुणो भवत्येव यथा भवति । सार्वधातुक इत्येवव्यतिभविषीष्ट । लिङाशिषीत्यार्द्धधातुकसंज्ञत्वाद् गुणो वृत्तः । अथ बोभवीति यङ्लुकि गुणप्रतिषेधः कस्मात् न भवति, ज्ञापकाद्, यदयं बोभूत्विति गुणाभावार्थं निपातनं करोति ।' यदि यङ्लुक्यपीदं भूसुवोस्तिडीति प्रावर्त्तिष्यत् तदा गुणाभावार्थं बोभूत्विति निपातनं नाऽकरिष्यत्, तत्तु कृतं तेन यङ्लुकि गुणः सिद्धः । प्राप्तमेव प्रतिषिध्यत इति वचनाद् नाऽभ्यस्तस्येत्यनुवर्त्तनाद्वाऽभ्यस्तस्य न गुणप्रतिषेधः ।
उतो वृद्धिर्लुकि हलीति [७/३/१८९] । पितीत्यनुवर्त्तते । इदमपि प्राप्तगुणे प्रतिषेधार्थम् । उकारान्तस्याऽङ्गस्य वृद्धिर्भवति लुकि सति हलादौ पिति सार्वधातुके । यौति, यौषि, यौमि, नौति, नौषि, नौमि, स्तौति, स्तौषि, स्तौमि । उत इति किं ? एति, एषि, एमि । लुकि इति किं ? सुनोति, सुनोषि, सुनोमि । हलीति किं ? यवानि, रवाणि । पितीत्येव - युतः, रुतः । अपि स्तुयाद्राजानं इत्यत्र हि ङित् पिन्न भवति, पिच्च ङिन्न भवतीति प्रतिषेधाद् वृद्धेरभावः । अत्राऽयं भावस्तिपः पित्त्वाद् वृद्धौ प्राप्तायां यासुटो ङित्वेन सा प्रतिषिध्यते । ननु लिङो ङित्त्वात् तदादेशेषु स्थानिवद्भावेन तिङां ङित्त्वादेव वृद्धेरभावः सिद्धस्तत्किमर्थमिदमुच्यते ? मैवं, यासुट एव ङित्करणात् ज्ञायते लाश्रितं ङित्त्वं लादेशेषु न प्रवर्त्तते । यदि हि समुदाये ' स्थानिवद्' [ १/४/१६] भावेन ङित्कार्यमभविष्यत् तदा यासुटो ङित्त्वं न व्यधास्यत् । विहितं च तत् ज्ञापयति
१. भूसुवोस्तिङि - ७/३/८८ ३. यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च
-
२. दाधर्ति-दर्धर्षि- बोभूतु० ७/४/६५
३/४/१०३
Page #8
--------------------------------------------------------------------------
________________
ओगस्ट २०११
१०३
ङिति यत् कार्यं तल्लादेशेषु न भवतीति ङितो यत् कार्यं 'नित्यं डित' [३/ ४/९९] 'इतश्चे' [३/४/१००] त्यादिकं तद् भवत्येव । नाभ्यस्तस्येति एतदिहानुवर्त्तते, योयोति, नोनोति इत्येवमाद्यर्थम् ।
विभाषोर्णोरिति' वृद्धिरित्यनुवर्तते हलादौ पिति सार्वधातुके लुकि इति च । ततश्च हलादौ पिति सार्वधातुके लुकि सति ऊर्णोतेविभाषा वृद्धिर्भवतीत्यर्थः। प्रो}ति, प्रोर्णोति, प्रोर्णोषि, प्रो#षि, प्रोर्णोमि, प्रो#मि । हलीत्येव- प्रार्णवानि ।
गुणोऽपृक्ते इति [७/३/९१] ऊर्णोते तोरपृक्ते पिति हलि सार्वधातुके गुणो भवति । प्रौर्णोत्, प्रौर्णोः। हलीत्यनुवर्तमाने यत् पृक्तग्रहणं क्रियते तेन तज्ज्ञाप्यते, भवत्येषा परिभाषा यस्मिन् विधिस्तदादावल्ग्रहणे इति पूर्वेण विभाषाबाधे नित्यार्थमिदम् ।
न क्डिति क्वचनाऽपि हीति । क्ङितीति निमित्तसप्तम्येषा, क्ङिन्निमित्तो यो गुणः प्राप्नोति स न भवति ।२ चितं, चितवान्, स्तुतं, स्तुतवान् । ङिति खल्वपि- चिनुतः, चिन्वन्ति । गकारोऽप्यत्र चर्वभूतो निर्दिश्यते । 'ग्लाजिस्थश्च ग्स्नुः' [३/२/१३९], जिष्णुः ॥३॥
विहायैतान् वक्ष्यमाणान्, जुसीगन्तं मिदि शिति ।
तथा ड्यूदृशं लिटि च, संयोगादिमृतं तथा ॥४॥
व्याख्या : विहायैतान् वक्ष्यमाणानिति । योऽयं 'न किती'ति निषेधः सः वक्ष्यमाणानपवादान् विहाय- परित्यज्य । तानेवाऽऽह
जुसीगन्तमिति । जुसि प्रत्यये परतः इगन्तमङ्ग विहाय, तस्मिन् गुणो भवतीत्यर्थः । अजुहवुः, अबिभयुः, अबिभरुः । अथ विनुयुः, सुनुयुरित्यत्र कस्मान्न भवति, अत्र द्वे ङित्त्वे सार्वधातुकाश्रयं यासुडाश्रयं च । तत्र नाऽप्राप्ते सार्वधातुकाश्रयङित्त्वनिमित्ते प्रतिषेधे जुसि गुणः आरभ्यमाणस्तमेव बाधते । यासुडाश्रयङित्त्वनिमित्तं तु न बाधते, तत्र हि प्राप्ते चाऽप्राप्ते चाऽऽरभ्यत इति ।
मिदि शितीति मिदि- मेद्यति शिति प्रत्यये विहाय । तत्र हि शिति प्रत्यये परतो मिदेरङ्गस्येको गुणो भवति । यथा- मेद्यतिः, मेद्यन्ति । शितीत्येव१. ऊर्णोतेर्विभाषा - ७/३/९०
२. क्डिति च - १/१/५ ३. खल्वपीति समस्तमव्ययं यथार्थे - ह.टि. ४. जुसि च - ७/३/८३ ५. मिदेर्गुणः - ७/३/८२
Page #9
--------------------------------------------------------------------------
________________
१०४
अनुसन्धान-५६
मिद्यते । तथा ड्यदृशमिति । अडिवात्(ङि) ऋवर्णान्तं दृशं च विहायेति सम्बन्धः । तत्र न कितीति न प्रवर्त्तते इत्यर्थः, किन्तु ऋवर्णान्तानां दृशेश्चाऽपि डिपरतो गुणो भवतीत्यर्थः । शकलाङ्गष्टकोऽकरत् अहं तेभ्योऽकरं नमः (?)। असरत्, आरत्, जरा । दृशेः- अदर्शत्, अदर्शतां, अदर्शन्निति ।
लिटि च संयोगादिमृतं तथेति । लिटि च परोक्षे संयोगादिसंयुक्तादिमृतं- ऋकारान्ताङ्गमपहाय न कितीति निषेधः प्रवर्त्तते । तत्र तु 'ऋतश्च संयोगादेर्गुणः' [७/४/१०] इति गुणो भवति । यथा- स्वृ शब्दोपतापयोः [पाणि. धा. ९९८]- सस्वरतुः, सस्वरुः । धृ कौटिल्ये [पाणि धा. १००५]दध्वरतुः, दध्वरुः । स्मृ स्मरणे [पाणि धा. ८५९]- सस्मरतुः, सस्मरुः । ऋत इति किं ? चिक्षियतुः, चिक्षियुः । संयोगादेरिति किं? चक्रतुः, चक्रुः । वृद्धिविषये तु वृद्धिरेव भवति । विप्रतिषेधेन संयोगोपधस्याऽपि लिटि गुणो भवतीति विज्ञेयं- संचस्करतुः, संचस्करुः । अत्र हि पूर्वं धातुः साधनेन युज्यते, पश्चादुपनतोपसर्गेणेत्यत्र दर्शने लिटि कृते तदाश्रये च द्विर्वचने पश्चादुपसर्गयोगे सत्यभ्यासव्यवायेऽपीति [पाणि. वा. २५३९] सुडिह क्रियते । एवंकृत्वा संस्कृषीष्टेत्यत्र सुटो बहिरङ्गलक्षणस्याऽसिद्धत्वात् 'ऋतश्च संयोगादे'रिति[७/२/ ४३] इडागमो न भवति ॥४॥
ऋच्छत्य॒तश्च याद्येषु, लिङ्-यङ्यक्षुपरेषु च ।
संयोगादिं तथाऽत्र्तिं च, दिधीवेव्योरिटश्च न ॥५॥
व्याख्या : ऋच्छय॒तश्चेत्येतान् विहायेति प्राग्वत् । चकारेण लिटीत्यनुकृष्यते । ततश्च लिटि परोक्षे ऋच्छतेरङ्गस्य ऋ-इत्येतस्य ऋकारान्तानां च गुणो भवतीत्यर्थः । ऋच्छ- आनछु, आनछुतुः, आनछुः । ऋ- आर, आरतुः, आरुः । ऋकारान्तानां- कृ विक्षेपे [पाणि. धा. १५०२]- निचकरतुः, निचकरुः । गृ निगरणे [पाणि. धा. १५०३]- निजगरतुः, निजगरुः । ऋच्छेरलघूपधत्वात् सर्वथाऽप्राप्तो गुणो विधीयते । ऋतां तु न कितीति प्रतिषेधे । वृद्धिविषये पूर्वविप्रतिषेधेन वृद्धिरेवेष्यते- निजगार ।
याद्येषु लिङ्यङ्यक्षु परेषु च संयोगादि तथाऽतिं चेति च- पुनः याद्येषु लिङ्-यङ् –यक्षु परेषु संयोगादिं तथाति च परित्यज्य न कितीति १. ऋदृशोऽङि गुणः - ७/४/१६ २. ऋच्छत्यताम् - ७/४/११
Page #10
--------------------------------------------------------------------------
________________
ओगस्ट २०११
प्रतिषेधः प्रवर्त्तते इति सण्टङ्कः । अर्तेः संयोगादेश्च ऋत: निषेधं प्रतिषिध्य गुणो भवतीत्यर्थः।' लिङीति आशीषिविहितलिडादेशा आर्धधातुकसंज्ञका गृह्यन्ते । लिङि- अर्यात् । संस्क्रियते, संस्क्रियात् । इह सुटो बहिरङ्गलक्षणस्याऽसिद्धत्वात् अभक्तत्वाद् वा संयोगादित्वं नाऽस्तीत्यङ्गस्य गुणो न प्रवर्त्तते । यङिअरार्यते, सास्वर्यते, दीध्वर्यते, सास्मर्यते । अर्तेरङयर्त्यश्रृणोतीनामुपसंख्यानामिति यङ्नन्द्राः संयोगादय इति द्विर्वचनप्रतिषेधो यकारपरस्य नेष्यते इति (?) । यकि- अर्यते, स्मर्यते । याद्येष्विति संभवाद् व्यभिचाराच्च विशेषणं भवतीति । लिडो व्यभिचाराद् विशेषणम्, आत्मनेपदे सीष्टादौ लिडादेशत्वेऽपि यादित्वाभावाद् गुणो न प्रवर्त्तते । यङ्यको: संभवाद् विशेषणं, व्यभिचाराभावात् ।
१०५
न ङ्कितीत्यस्याऽपवादा:- दीधीवेव्योरिटश्च नेति । दीधीङ् दीप्तिदेवनयो: [पाणि धा. ११५२] वेवीङ् वेतिना तुल्ये [पाणि धा. ११५३] । इट—श्चाऽऽ ऽर्धधातुकस्येड्वलादेः ' [ ७ / २ / ३५ ] इत्यादिना प्रकरणेन विहित आगमस्तस्य च गुणवृद्धी न भवति (त:), निमित्तानुपादानात् सर्वत्रेति भावः । वृद्धिरिटो न संभवति, [परं] यस्मात् प्रत्ययविधिस्तदादिप्रत्ययेऽङ्गमिति परिभाषया इटोऽप्यङ्गेऽन्तर्भावात् अकारिषमित्यादौ लघूपधगुणः प्राप्तः सोऽनेन प्रतिषिध्यते । श्व: कणिता, श्वो रणितेत्यादावन्त्यस्य गुणे प्राप्ते निषेधः । आदीध्यनं, आदीध्यकः, आवेव्यनं, आवेव्यकः । गुणवृद्धयोरभावादेरनेकाचोऽङ्गस्य यण् । 'इको गुणवृद्धी' [१/१/३] इत्यतो गुणवृद्धीति पदमनुवर्त्तते ॥५॥
सर्वत्र न धातुलोपे, स भवेदार्धधातुके । परस्मैपदे सिचीगन्ते, वृद्धिर्भवति बाधिका ॥६॥
व्याख्या :- ते इति गुणवृद्धी सर्वत्र धातुलोपे आर्धधातुकेतिशिद्व्यतिरिक्ते प्रत्यये न भवेत्, निमित्ते सत्यपि । क्डिद्व्यतिरिक्ते सार्वधातुकार्धधातुकप्रत्यये निमित्तं तस्मिन् सत्यपि तद्विधायकं सूत्रं न प्रवर्त्तते इत्यर्थः । धातुलोप इति अवयवे समुदायोपचाराद् धात्वेकदेशो धातुस्तस्य लोपो
२. दीधीवेवीटाम् - १/१/६
१. गुणोऽर्त्तिसंयोगाद्योः
७।४।२९
३. एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य ६/४/८२
४. टीकायां ‘स’ स्थाने 'ते' इति प्रतीकोपादानम्, पुनः तत्सम्बन्धि क्रियापदं ‘भवेत्' इत्येव निर्दिष्टमित्यसमञ्जसता कथं समाधेयेति विद्वद्भिश्चिन्तनीयम् ।
Page #11
--------------------------------------------------------------------------
________________
१०६
अनुसन्धान-५६
यस्मिन्नार्द्धधातुके तदार्धधातुकं धातुलोपं, तत्र ये गुणवृद्धी प्राप्नुतस्ते न भवति इति गर्भार्थः । यथा- लोलुवः, पोपुवः, मरीमृजः । लोलूयादिभ्यो यङन्तेभ्यः पचाद्यचि विहिते यङोऽचि च [२/४/७४] इति यङ्लुकि कृते तमेवाऽचमाश्रित्य ये गुणवृद्धी प्राप्ते तयोः प्रतिषेधः । धातुग्रहणं किं ? लूञ्, अनुबन्धलोपे भवत्येव, यथा- लविता । धातुग्रहणादेव प्रत्ययलोपे भवत्येव । यथा- रेट, रिषे हिंसार्थस्य [पाणि. धा. ७३९] । विच्प्रत्ययलोपे उदाहरणम् । आर्धधातुकग्रहणात् सार्वधातुके भवत्येव । यथा- बोभोति, वरीवर्त्ति । इक इत्येव- अन्यत्र पापाचकः, अभाजि, रागः । पापाचक इत्यत्र यडो धात्ववयवस्य लोपे; अभाजि, राग इत्यत्र अनुस्वारस्य धात्ववयवस्य लोपेऽपि इग्लक्षणवृद्धेरभावा'दत उपधाया' इति [७/२/११६] वृद्धिर्भवत्येव ।
परस्मैपदे सिचीगन्ते वृद्धिर्भवति बाधिका इति परस्मैपदे सिचि परतः इगन्ताङ्गे वृद्धिर्बाधिका भवति अर्थाद् गुणस्य । अवैषीत्, अनैषीत्, अलावीत्, अवावीत्, अकार्षीत् । अन्तरङ्गमपि गुणमेषा वृद्धिआपकत्वाद् बाधत इत्यर्थः । अन्तरङ्गत्वं पुनर्गुणस्याऽऽर्द्धधातुकमात्रापेक्षत्वात् । वृद्धस्तु आर्धधातुकविशेषपरस्मैपदपर-सिचमपेक्षमाणाया बहिरङ्गत्वं च । ज्ञापकं त्विदम्- यद्यन्तरङ्गो गुणो वृद्धेः प्राक् प्रवर्तेत तदा सर्वत्राऽयादेशे कृते यान्तत्वादेव 'म्यन्तक्षणे'ति [७/ २/५] वृद्धिनिषेधे सिद्धे, तत्रैव णिश्वि-ग्रहणं न कुर्यात्, तत्तु कृतं, तत्करणाज्ज्ञायते अन्तरङ्गमपि गुणं वृद्धिर्बाधत इति । परस्मैपद इति किं ? अच्योष्ट, अश्लोष्ट । इगन्त इति किं ? अदेवीत्, असेवीत् । इगुपधस्य गुणो भवत्येव ॥६॥
जागणिश्वीन विहायैवा-ऽनिटां चैवाऽविशेषतः ।
बाधते वृद्धिरत्यन्तं, मृजेर्वृद्धिर्गुणाद् भवेत् ॥७॥ व्याख्या : जागृणिश्वीन् विहायैवेति एतान् परित्यज्य वृद्धिर्बाधिका भवति, एतेषु गुण एव भवतीत्यर्थः । जागृ- अजागरीत् । अत्र जागृ-ई इति स्थिते पूर्वं यण् प्राप्तस्तं सार्वधातुकगुणो बाधते, तं सिचि वृद्धिस्तां जागर्त्ति गुणस्तत्र कृते हलन्तलक्षणा वृद्धिः । अङ्गवृत्त इत्येतत्तु निष्ठितत्वाच्च दुर्ज्ञानत्वादनाश्रित्य यदि, तर्हि गुणे रपरत्वे च कृति लक्षणान्तरेण वृद्धिर्भवति तदा जागरक इत्यादावजन्तलक्षणां वृद्धिं बाधित्वा गुणे प्रवृत्ते रपरत्वे च 'अत १. न धातुलोप आर्धधातुके - १/१/४ २. सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु - ७/२/१
Page #12
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
१०७
उपधाया' [७/२/११६] इति वृद्धिः प्राप्नोति, नैष दोषः, चिण्णमुलोर्गुणप्रतिषेधाल्लिङ्गादुपधालक्षणवृद्धिर्न भवति इत्यवसीयते । अन्यथा चिण्णमुलोः गुणरपरत्वयोः कृतयोरुपधालक्षणया वृद्ध्या सिध्यति रूपमिति प्रतिषेधं न विदध्यात् ।' 'यदि तु गुणे कृते वृद्धिमात्राप्रवृत्ते लिङ्गं चेण्णमुलोः प्रतिषेध आश्रीयते तदा जागृग्रहणं शक्यमकर्तुं, सो 'नेटि' इत्यनेन [७/२/४] प्रतिषिध्यते तस्यां च प्रतिषिद्धायां 'अतो हलादे'रिति [७/२/७] विकल्पः प्राप्नोति, तमपि बाधित्वा दतो ल्रान्तस्ये'ति [७/२/२] नित्या वृद्धिः । तां बाधितुं जागृणिश्वी[ति] जागृग्रहणम् । तथोक्तम्
"गुणोवृद्धिर्गुणो वृद्धिः, प्रतिषेधो विकल्पनम् ।।
पुनर्वृद्धिनिषेधोऽतो, यण्पूर्वाः प्राप्तयो न वा ॥" इति
क्ङित्यचि मृजेर्वृद्धिर्वेष्यते', तेन मृजन्ति, मार्जन्तीति रूपद्वयसिद्धिः, सा तु गुण(णा)विषयकत्वान्नोक्ता । णि- ऊनयीत्, एलयीत् । श्वि- अश्वयीत् ।
अनिटां चैवाऽविशेषतः बाधते वृद्धिरत्यन्तमिति च पुनरनिटां धातूनां अविशेषत एव सामान्यत एव अन्ते उपधायां चेत्यर्थः, अत्यन्तमपवादराहित्येन वृद्धिर्बाधते । अकार्षीत्, अहार्षीत्, अभैत्सीत्, अच्छेत्सीदिति ।।
मृजेवृद्धिः [७/२/११४] गुणाद् भवेत् इति गुणाद् गुणनिमित्ताद् गुणकारणात् क्डिद्वर्जसार्वधातुकार्द्धधातुकादिति, यावदर्थाद् गुणं बाधित्वा वृद्धिर्भवति निरवकाशत्वात् । मार्टा, माटव्यं, परिमाष्टि ॥७॥
तथैव शीङः सर्वत्र, गुणः स्यात् सार्वधातुके ।। सिच् ऊ(च्यू)ोतेर्विकल्पेन, गुणस्य विषयस्त्वयम् ॥८॥
व्याख्या :- तथैव शीङः सर्वत्र गुणः स्यात् सार्वधातुके इति शीङः सर्वत्र सार्वधातुके गुणस्स्यात् ।। सर्वत्रग्रहणं न क्ङितीति निषेधबाधनार्थम्, तेन तत्रापि गुणो भवतीत्यर्थः । शेते, शयाते, शेरते । सार्वधातुक इति किं ? १. चिण्णमुलोर्दीर्घोऽन्यतरस्याम् - ६/४/९३ २. मृजेरजादौ सङ्क्रमे विभाषा वृद्धिरिष्यते - वा० । ३. 'नेटि' [७/२/४] इत्यनेन सूचितमिदम् । ४. सिचि वृद्धि० - ७/२/१, वदव्रजहलन्तस्याऽचः - ७/२/३ ५. शीङः सार्वधातुके गुणः - ७/१/२१
Page #13
--------------------------------------------------------------------------
________________
१०८
शिश्ये। लिडादेशानां तिङ्क्षितां 'लिङचे' ति [ ३/३/१५९] सूत्रेणाऽऽर्द्धधातुकत्वप्रतिपादनात् प्रत्युदाहरणम् ।
सिचीति ऊर्णोतेः इडादौ सिचि परस्मैपदे परे परतो विकल्पेन गुणो भवति । प्रौर्णवीत् । पक्षे वृद्धिः - प्रौर्णावीत् । ' विभाषोर्णोः ' [१/२/३] इत्यङित्त्वपक्षे वृद्धिविकल्पोऽयम् । ङित्त्वपक्षे तु गुणवृद्ध्योरभावे तु उवङ् भवति- प्रौर्णुवीत् । अयं - पूर्वोक्तो गुणस्य विषयः गोचरं, प्रोक्तः इति गम्यते, तुः पादपूर्त्तो ॥८॥
अनुसन्धान-५६
-
१. ऊर्णोतेर्विभाषा - ७/२/६
३. विज इट्
T
१/२/२
कुटादिभ्योऽञ्णितः सर्वे, गाङश्चाऽपि ङितः स्मृताः । विज इड् विभाषोर्णोते - स्तथाऽपित् सार्वधातुकम् ॥९॥
व्याख्या : कुटादिभ्योऽञ्णितः सर्वे गाङश्चापि डित स्मृता इति । गुणप्रतिषेधविषये ‘न क्ङिति क्वचनाऽपिही'त्युक्तम् । तत्रौपदेशिकस्य सुखाभिगम्यत्वादातिदेशिकं ङित्त्वं दर्शयन्नाह - कुट कौटिल्ये [पाणि. धा. १४५४] इत्यत आरभ्य यावत् कुङ् शब्दे [पाणि. धा. १४९३] एते कुटादयो गृह्यन्ते, तेभ्यस्तथा गाङः इति ङकारस्याऽनन्यार्थत्वादिङादेशो गृह्यते, न गां गता [पाणि. धा. १०१६] इति धातु:, तस्माच्च मे ( परे ) ऽञ्णितो ञिणि - तद्व्यतिरिक्ताः सर्वे समस्ताः प्रत्यया डितः स्मृता इति द्विद् भवन्तीत्यर्थः । कथं पुनरन्तरेण वतिं - वत्यर्थो गम्यते ? उच्यते- अन्तरेणाऽपि वतिं - वत्यर्थो गम्यते । यथा- सिंहो माणवकः, यथा वा अब्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्त इत्याह (इत्युक्ते) ब्रह्मदत्तवदयं भवतीति प्रतीयते, एवमिहाऽपि अङितं ङिदित्याह, ङिद्भवतीति गम्यते । कुटादिभ्यःकुटिता, कुटितुं, कुटितव्यम् । गाङ् - अध्यगीष्ट, अध्यगीषातां अध्यगीषत् । अञ्णित इति किं ? उत्कोटयति, उत्कोटकः, उत्कोटो वर्त्तते । व्यचेः कुटादित्वमनसीति वक्तव्यं [वा०] - विचिता; विचितुं, विचितव्यम् । अनसीति किं ? उरुव्यचा: ।
विज इडिति । ओविजी भयचलनयोरस्मात् पर इडादिप्रत्ययो ङिद् भवति। उद्विजिता, उद्विजितुं, उद्विजितव्यम् । इडिति किं ? उद्वेजनीयम् । विभाषोर्णोतेरिति । इडित्यनुवर्त्तते । ऊर्णुञ् आच्छादने [पाणि. धा. २. गाङ्कुटादिभ्योऽञ्णिन्डित् - १/२/१
Page #14
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
१११४] अस्मात् पर इडादिप्रत्ययो विभाषा - विकल्पेन ङिद्भवति । प्रोर्णुविता, प्रोर्णविता । इडित्येव - प्रोर्णवनं, प्रोर्णवनीयम् ।
तथाऽपित् सार्वधातुकमिति तथा अपित् सार्वधातुकं द्विद् भवति । इडिति निवृत्तम् । कुरुतः कुर्वन्ति, चिनुतः, चिन्वन्ति । सार्वधातुकमिति किं ? कर्त्ता, कर्त्तुं कर्त्तव्यम् । अपिदिति किं ? करोति, करोषि करोमि ॥९॥
लिड् वाऽसंयोगतः कित् स्यात्, तथेधेर्भवतेः परः । क्त्वा मृडादिगणात् सेट्को, रुदादिभ्यः सना युतः ॥१०॥ व्याख्या : लिड् वाऽसंयोगतः कित् स्यादिति वा-शब्द एवकारार्थः । असंयोगत एव- असंयोगादेव धातोः परो लिट्प्रत्ययः अपित् किद् भवति । ३ बिभिदतुः, बिभिदुः, चिच्छिदतुः, चिच्छिदुः, ईजतुः, ईजुः । असंयोगादिति किं ? सस्त्रंसे, दध्वंसे । केचितु संयोगाल्लिटः कित्त्वं विकल्पयन्ति । तन्मते - ममथतुः, ममथुः ममन्थतुः, ममन्थुः । अपिदित्येव - बिभेदिथ । पूर्ववदत्राऽपि वतिमन्तरेणाऽपि वत्यर्थो गम्यते ।
१०९
तथेधेर्भवतेः पर इति । तथा इधेर्भवतेश्च परे लिट्प्रत्ययः किद् भवति । समीधे दस्युहतमम् । पुत्र ईधे अथर्वणः । भवतेः खल्वपि - बभूव, बभूविथ । इन्धेः संयोगार्थं ग्रहणम्, भवते: पिदर्थं, तेन बभूवेत्यत्राऽऽतिदेशिककित्त्वेन स्वनिमित्तौपदेशिकणित्त्वस्योपहतत्वाद् वृद्धिसूत्रं न प्रवर्त्तते । गुणस्त्वविशेषविहितत्वेन तत्रापि प्रवर्त्तते एवेति तन्निवृत्तिर्न क्ङिीतित्यनेन ।
यत्तु कृष्णपण्डितेन- “ननु इग्लक्षणयोर्गुणवृद्धयोः क्ङिति चेति निषेध इत्युक्तं, तत्कथमज्लक्षणाया वृद्धेर्निषेध: ? न च कित्त्ववैयर्थ्यं, थलि उत्तमे णलि च गुणनिषेधार्थत्वेनोपपत्तेः, सत्यं, कित् डिदित्युभयमत्राऽनुवर्त्तते । तत्र कित्त्वेनैव सिद्धे ङित्त्वविधेरज्लक्षणाया अपि निषेधो भवतीत्युक्तं तत्तु न सम्यक् प्रतिभाति, कित्त्वेन णित्त्वबाधात् किति तु विधिसूत्राभावादेव वृद्धेरभावस्ततो न क्ङितीति सूत्रेण तत्प्रतिषेधविधानं व्यर्थमेव । यदि विधायकसूत्राभावेऽपि वृद्धेः प्रतिषेधः क्रियेत, तदा भवतीत्यादौ पित्यपि प्रसजन्ती वृद्धिः कथं वार्या स्यात् ? कित् ङिदित्युभयमनुवर्त्तते इति यदुक्तं, तदपि न, अधिकारान्तरेणा
१/२/३
१. विभाषोर्णोः ३. असंयोगाल्लिट् कित् - १/२/५
२. सार्वधातुकमपित् - १/२/४
४. इन्धिभवतिभ्यां च
१/२/६
-
Page #15
--------------------------------------------------------------------------
________________
११०
अनुसन्धान-५६
ऽधिकारस्य बाध इति किदधिकारेण डिदधिकारस्य बाधितत्वात् । उभयानुवृत्तौ हि वचिस्वपियजादीनां जागर्तेश्च संप्रसारणगुणयोर्विकल्पः प्रसज्येत ।
ननु कृताकृतप्रसङ्गत्वेन नित्यत्वाद् वुगेव गुणवृद्धी बाधिष्यते तत् किं कित्त्वेन प्रतिषेधार्थेन ? न च कृतयोर्गुणवृद्ध्योरेजन्तस्य प्राप्नोत्यकृतयोस्तूदन्तस्येति शब्दान्तरप्राप्त्या वुकोऽनित्यत्वम् । एकदेश विकृतस्याऽनन्यत्वेन शब्दान्तरप्राप्त्यभावात् । सत्यं, तदेतद् वार्त्तिककारस्य मतम् । यदाह- 'इन्धेः छन्दोविषयत्वाद् भुवो वुको नित्यत्वात्, ताभ्यां लिटः किद्वचनानर्थक्यमिति । सूत्रकारस्तु मन्यते वुगनित्य इति । तद्विधौ हि 'ओः सुपि' [६/४/८३] इत्यतः ओरित्यनुवर्त्तते । उवर्णान्तस्य भुवो वुग् यथा स्यात्, बोभावेति यङि लुकि मा भूदिति । तत्र हि इन्धिभवतिभ्यां च इति श्तिपा निर्देशेन कित्त्वं व्यावर्त्यते, तेन वृद्धिरेव भवति । एवं च यथा तत्राऽनुवर्णान्तत्वाद् वुग् न भवति, एवं बभूवेत्यत्रापि वृद्धौ कृतायां न प्राप्नोतीत्यनित्यो वुक् परया वृद्ध्या मा बाधीत्यारम्भणीयं कित्त्वम् । एष एव च कित्त्वे श्तिपा निर्देशं लुकि च तदभावं कुर्वतः सूत्रकृतोऽभिप्रायः । अत्रेष्टिः (त्र) श्रन्थिग्रन्थिदम्भिस्वञ्जीनामिति वक्तव्यम् (वा०) । ग्रेथतुः, ग्रेथुः, देभतुः, देभुः, परिषस्वजे, परिषस्वजाते ।
क्त्वा मृडादिगणात् सेटक इति । मृड् मृद् गुध् कुष् क्लिश् वद् वस् एते मृडादयः । एभ्यः परः सेट्क्त्वाप्रत्ययः किद्भवति ।। 'न क्त्वा सेडि'ति [१/२/१८] प्रतिषेधं वक्ष्यति, तस्याऽयं पुरस्तादपकर्षः, अपवाद इति यावत् । गुधकुषक्लिशानां तु 'रलो व्युपधा'दिति विकल्पे प्राप्ते नित्यार्थं वचनम् । मृडित्वा, मृदित्वा, गुधित्वा, कुषित्वा, क्लिशित्वा ।।
रुदादिभ्यः सना युतः इति । रुदादिभ्य इति रुदादिगणात्, रुद् विद् मुष ग्रहि स्वपि प्रच्छ इत्येतेभ्यः सना युतः क्त्वा, सन्प्रत्ययेन सहितः क्त्वाप्रत्ययः किद्भवति ।२ रुदविदमुषाणां 'रलो व्युपधा'दिति विकल्पे प्राप्ते नित्यार्थं वचनं ग्रहे विध्यर्थमेव, स्वपिपृच्छयोः सनर्थं ग्रहणं, किदेव हि क्त्वा । रुदित्वा, रुरुदिषते, विदित्वा, विविदिषते, मुषित्वा, मुमुषिषति, गृहीत्वा, जिघृक्षति, सुप्त्वा, सुषुप्सति, पृष्ट्वा, पिपृच्छिषति । ग्रहादीनां कित्त्वात् संप्रसारणं भवति । 'किरश्च पञ्चभ्यः' [७/२/७५] इति पृच्छेरिडागमः । १. मृडमृदगुधकुषक्लिशवदवसः क्त्वा - १/२/७ २. रुदविदमुषग्रहिस्वपिप्रच्छ: संश्च - १/२/८ ३. ग्रहिज्यावयिव्यधि० - ६/१/१६
Page #16
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
इगन्तादिगुपान्त्याच्च, झलादिसन् किदिष्यते । झलादी लिसिचावात्म-नेपदेष्विगुपान्त्यतः ॥११॥ व्याख्या : इगन्तादिगुपान्त्याच्च झलादिः सन् किदिष्यत इति । सन्ग्रहणात् क्त्वेति निवृत्तम् । चिकीर्षति, जिहीर्षति । इगन्तादिति किं ? पिपासति, तिष्ठासति । कित्त्वाभावाद् घुमास्थेतीत्वाभाव: [६/४/६६] | झलादिरिति किं ? शिशयिषते । इगुपान्त्याद् - बिभित्सति, बुभुत्सते। इगुपान्त्यादित्येवयियक्षति । अकित्त्वात् सम्प्रसारणाभावः । झलादीत्येव - विवर्द्धिषते । इटा व्यवहितत्वात् सनो न कित्त्वं, तेनोपधागुणः। पाणिनीयसूत्रापेक्षया हल्ग्रहणस्य जातिवाचकत्वात् सिद्धं - धिप्सति ।
झलादी लिसिचावात्मनेपदेष्विगुपान्त्यत इति । इक उपान्त्यन्तस्थसमीपे यस्य स इगुपान्त्यः - इगुपध इत्यर्थः । तस्मात् परौ झलादी लिङ्सिचौ आत्मनेपदेषु परतः कितौ भवतः । भित्सीष्ट, भुत्सीष्ट । सिचि खल्वपिअभित्त, अबुद्ध । इगुपान्त्य इति किं ? यक्षीष्ट, अयष्ट । अकित्त्वात् संप्रसारणाभावः। आत्मनेपदेष्विति किं ? अस्राक्षीत्, अद्राक्षीत् । अत्र कित्त्वाभावात् 'सृजिदृशोर्झल्यमकिति' [ ६ / १ / ५८ ] इत्यमागम: ।
ऋवर्णान्ताद् वा गमश्च हनः सिच् गन्धने यमः । दक्षो दाक्षीसुतश्चख्यौ, वा चोपात् पाणिपीडने ॥१२॥
व्याख्या : ऋवर्णान्तादिति । ऋवर्णान्ताद् धातोः परौ लिङ्सिचावात्मनेपदेषु झलादी कितौ भवतः । कृषीष्ट, हृषीष्ट । सिचि खल्वपिअकृत, अहृत । 'हूस्वादङ्गा' [८/२/२७]दिति सिचो लोपः । झलीत्येववरिषीष्ट, अवरिष्ट ।
वा गमश्चेति चकारो लिङ्सचोरनुकरणार्थः । ततोऽयमर्थः- वेति विकल्पेन गमः परौ लिङ्सिचौ आत्मनेपदेषु झलादी कितौ भवतः । " संगसीष्ट,
१/२/९, हलन्ताच्च
१. इको झल् २. लिङ्सिचावात्मनेपदेषु १/२/११
३. खल्वपीति यथार्थेऽव्ययम्
ह. टि.
४. उश्च
१/२/१२
-
१११
1
-
१९/२/१०
५. वा गमः १/२/१३
Page #17
--------------------------------------------------------------------------
________________
११२
अनुसन्धान-५६
समगत, समगंस्त। संगंसीष्ट, अत्र कित्त्वपक्षेऽनुनासिकलोपो भव' त्यनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीना'[६/४/३७]मित्यनेन ।
हनः सिच् [१/२/१४ ] इति हन्तेर्धातो परः सिच् किद् भवति । आहत, आहसातां, आहसत । सिचः कित्त्वादनुनासिकलोपः । सिज्ग्रहणं लिङ्निवृत्यर्थं, उत्तरत्राऽनुर्वृत्तिर्मा भूत् । आत्मनेपदग्रहणमुत्तरार्थमनुवर्त्तते, इह तु परस्मैपदेषु हन्तेर्वधभावस्य नित्यत्वात् कित्वस्य प्रयोजनं नास्ति ।
I
गन्धने यम इति सिचावात्मनेपदेष्विति वर्त्तते । यमेर्धातोर्गन्धने वर्त्तमानात् परः सिच्प्रत्ययः किद् भवति आत्मनेपदेषु परतः । गन्धनं सूचनं परेण प्रच्छाद्यमानस्याऽवद्यस्याऽऽविष्करणम् । अनेकार्थत्वाद् धातूनां यमिस्तत्र वर्त्तते । उदायत, उदायसातां, उदायसत । सूचितवान् इत्यर्थ: । सिचः कित्त्वादनुनासिकलोपः।
तथा दक्षो दाक्षीसुतः - पाणिनिश्चख्यौ - अचीकथत् । किं ? वा चोपात् पाणिपीडने इति यमः सिश्वात्मनेपदेष्विति वर्त्तते । यमेर्धातोः परः सिच्प्रत्ययो विभाषा किद् भवति आत्मनेपदेषु परतः । उपायत कन्यां, उपायंस्त कन्याम्। उपायत भार्यां, उपायंस्त भार्याम् । पाणिपीडनं विवाहनं दारकर्मेति यावत् । उपाद्यमः स्वकरणे [१/३/५६] इत्यात्मनेपदम् ॥१२॥
स्थाघ्वोरिच्च विभाषा क्त्वा, थफान्तान्नोपधाच्च सेट् । “वञ्चिलुञ्चिऋतश्चाऽपि, काश्यपस्य तृषेर्मृषेः ॥१३॥
व्याख्या :- स्थाघ्वोरिच्चेति [१/२/२७] सिजात्मनेपदेष्विति वर्त्तते। तिष्ठते-धातोर्घुसंज्ञकानां च इकारोऽन्तादेशः सिच्च किद् भवति आत्मनेपदेषु परत:। उपास्थित, उपास्थिषातां उपास्थिषत । घुसंज्ञकानां - अदित, अधि । कित्त्वादन्त्यस्य न गुणः ।
विभाषा क्त्वा थफान्तान्नोपधाच्च सेडिति । नकारोपधाद् धातोः थकारान्तात् फकारान्ताच्च परः क्त्वा प्रत्यय: सेड् वा किद् भवति । ग्रथित्वा, ग्रन्थित्वा, श्रथित्वा, श्रन्थित्वा, गुफित्वा, गुम्फित्वा । नोपधादिति किं ?
१/२/१५
२. यमो गन्धने ४. अत्र समाहारद्वन्द्वे पञ्चमी ह.टि.
१. हनश्च वधः - ३/३/७६
३. विभाषोपयमने १/२/१६
५. नोपधात् थफान्ताद् वा
-
१/२/२३
-
-
Page #18
--------------------------------------------------------------------------
________________
ओगस्ट २०११
रेफित्वा, गोफित्वा । “रलो व्युपधादि' त्यपि [ १ / २ / २६] विकल्पोऽत्र न भवति, नोपधाग्रहण-सामर्थ्यादिति स्थित "मित्युक्तं कृष्णेन । तत्र नोपधाग्रहणस्य कीदृशं सामर्थ्यं ? किं रलो व्युपधेति सर्वत्र नोपधाऽनोपधयोरविशेषेण कित्त्वप्राप्ते इदमारभ्यते ?, येन सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः इति सामर्थ्यं स्यात् ? यतो नोपधग्रहणेनैव व्युपधत्वस्य व्यवहितत्वाद् रलो व्युपधेति विकल्पस्य सर्वथा बाधितत्वाद् व्यर्थ-मेवेदम् । अत एवाऽभिन्नविषयत्वात् व्युपधाभावेऽपि 'श्रथित्वा, श्रन्थित्वे'-त्युदाह्रियते । अत एव भाष्यकृद्भगवता बाध्यबाधकभावोऽपि नाऽऽविश्चक्रे। तेन सामर्थ्यान्तराभावाद् रिफित्वा, रेफित्वा, गुफित्वा, गोफित्वेति विकल्पेन भाव्यं, तथा चार्फित्वेति प्रत्युदाहर्तुं युज्यते । तथा तु नो प्रत्युदाहृतं वामनाचार्येण । तेन तदभिप्रायं सम्यग् नावसीयते । हैमधातुपारायणे रिफत् कथन-युद्ध-हिंसा-दानेषु [सिद्ध. धा. १३७६ ] - रिफति, रिरेफ, रेफिता, रिफितः, न्युपान्त्य इति व्यावृत्तिबलात्, ऋत्तृषमृषेति [ सिद्ध. ४ / ३ / २४] वौ व्यञ्जनादेरिति [सिद्ध. ४/३/२५] च वा कित्त्वाभावे क्त्वेति [सिद्ध. ४/३/२९] नित्यमकित्त्वे रेफित्वेत्युक्तं तदपि विचार्यमाणं विशीर्यते । थफान्तादिति किं ? संस्रित्वा, ध्वंसित्वा ।
वञ्चिलुञ्चिऋतश्चाऽपि इति वञ्चि लुञ्चि ऋत इत्येतेभ्यः परे क्त्वाप्रत्ययः सेड् वा किद् भवति । वचित्वा, वञ्चित्वा, लुचित्वा, लुञ्चित्वा, ऋतित्वा, अर्तित्वा । ‘ऋतेरीयङ्' [३/१/२९]आर्द्धधातुके विकल्पितः, स यत्र पक्षे नाऽस्ति तत्रेदमुदाहरणम् । सेडित्येव - वक्त्वा ।
I
काश्यपस्य तृषेर्मृषेः ॥१३॥
११३
कृशो हलादेर्व्युपधा-द्रलन्तात् संस्तथैव च ।
अतिदेश- क्ङितः प्रोक्ताः सुबोधा उपदेशिकाः ॥१४॥ व्याख्या :- कृश इति काश्यपस्याऽऽचार्यस्य मतेन तृषेर्मृषेः कृशश्च
परः सेट् क्त्वाप्रत्ययो वा किद् भवति । तृषित्वा, तर्षित्वा, मृषित्वा, मर्षित्वा, कृशित्वा, कर्शित्वा । काश्यपग्रहणं पूजार्थम् । वेत्येव वर्त्तते ।
हलादेर्व्युपधाद्रलन्तात् संस्तथैव चेति । उश्च इश्च वी, वी उपधे
२. आयादय आर्धधातुकेवा
३/१/३१
१. वञ्चिलुञ्च्यृतश्च - १/२/२४ ३. तृषिमृषिकृशेः काश्यपस्य
१/२/२५
Page #19
--------------------------------------------------------------------------
________________
११४
अनुसन्धान-५६
यस्य धातुगणस्य स व्युपधः, तस्मादुकारोपधादिकारोपधाच्च धातोर्हलादेः रलन्तात् परः संश्च क्त्वा च सेटौ कितौ भवतो वा । द्युतित्वा, द्योतित्वा, दिद्युतिषति, दिद्योतिषति, लिखित्वा, लेखित्वा, लिलिखिषति, लिलेखिषति । रल इति किं? देवित्वा, दिदेविषति । व्युपधादिति किं ? वर्त्तित्वा, विवर्तिषति । हलादेरिति किं ? एषित्वा, एषिषिषति । सेडित्येव- भुक्त्वा, बुभुक्षते ।
अतिदेशक्डिन्तः प्रोक्ता इति स्वरूपेण(णाऽ?)क्ङितोऽपि सन्तः अतिदेशेन तद्वत्करणेन क्ङित्कार्यभाक्त्वेन क्ङितः अतिदेशक्ङितः प्रोक्ताः- पूर्वं प्रतिपादिताः ।
सुबोधा उपदेशिका इति उपदेशपाठः तत्र भवाः उपदेशिकाः क्त्वादयः सुबोधाः- सुखज्ञेयाः ॥१४॥
सुबोधा इत्युक्तं तदेवाऽपवादविषयं प्रदर्शनेन स्पष्टयति न क्त्वा सेट्क इत्यादिना सार्द्धश्लोकेन -
न क्त्वा सेट्कस्तथा निष्ठा, धृष्शीभ्यां स्विन्मिदिक्ष्विदः । मृषस्तितिक्षावचनात्, तथा भावादिकर्मणोः ॥१५॥ उदुपान्त्याद् विकल्पेन, तथा पूङः कितौ मुनेः ।
व्याख्या :- न क्त्वा सेटक इति सह इटा वर्त्तते यः स सेटकः । सेट्कः क्वाप्रत्ययः किन्न भवति ।२ देवित्वा, सेवित्वा, वर्त्तित्वा । सेट्क इति किं ? कृत्वा, धृत्वा । क्त्वाग्रहणं किं ? जिगृहीतिः, उपस्निहितिः, निकुचितः ।
धृष्शीङ्भ्यां स्विन्मिदिक्ष्विद इत्येतेभ्यः परा- धृषादिपरा निष्ठा किन्न भवति । तथेति सेट्का निष्ठा 'क्तक्तवतू' [१/१/२५] रूपा किन्न भवति । धृष्- प्रधर्षितः, प्रधर्षितवान् । शीङ्- शयितः, शयितवान् । स्विदिप्रस्वेदितः, प्रस्वेदितवान् । [मिदि-] प्रमेदितः, प्रमेदितवान् । [क्ष्विदि-] प्रक्ष्वेदितः, प्रक्ष्वेदितवान् । सेडित्येव- स्विन्नः, स्विन्नवान् । स्विदादीनां 'आदितश्चे' [७/२/१६]ति निष्ठायामिट प्रतिषिध्यते । 'विभाषा भावादिकर्मणो'रिति पक्षे [७/२/१७] इडनुज्ञायते स विषयः कित्त्वप्रतिषेधस्य । १. रलो व्युपधाद्धलादेः सँश्च - १/२/२६ २. न क्त्वा सेट- १/२/१८ ३. निष्ठा शीस्विदिमिदिक्ष्विदिधृषः - १/२/१९
Page #20
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
११५
मृषस्तितिक्षावचनादिति । मृषेर्धातोः तितिक्षावचनात् तितिक्षार्थात् सेड्निष्ठा किन्न भवति इति । मर्षितः, मर्षितवान् । तितिक्षावचनादिति किं ? अपमृषितं वाक्यमाह । तितिक्षा- क्षमा, शान्तिरिति यावत् ।।
__ तथा भावादिकर्मणोः उदुपान्त्याद् विकल्पेनेति, उदुपान्त्यात्उकारोपधात् परा भावादिकर्मणोः सेण्निष्ठा वा किन्न स्यात् । द्योतितं, द्युतितं, तेन प्रद्युतितः, तेन प्रद्योतितः । मुदितमनेन, मोदितमनेन, प्रमुदितः, प्रमोदितः । उदुपधादिति किं ? स्वेदितमनेन । भावादिकर्मणोरिति किं ? रुचितं कार्षापणम् । सेडित्येव- प्रभुक्त ओदनः । व्यवस्थितविभाषा चेयं तेन शब्विकरणानामेव भवति । गुध् परिवेष्टने [पाणि. धा. ११९५] गुधितमित्यत्र न भवति । कर्मक्रिया एकफलोद्देशप्रवृत्ताऽनेकक्षणसमूहरूपा, तस्या आदिक्षणः आदिकर्म । आद्यक्षणे प्रवृत्ते धात्वर्थभूता क्रिया नाऽप्रवृत्तेति वचनम् । अथवा न्यायसिद्धोऽयमर्थः, आदिक्षणमात्रे क्रियात्वारोपात्, तदुक्तम्
"समूहः स तथाभूतः, प्रतिभेदं समूहिषु ।
समाप्यते ततो भेदे, कालभेदस्य सम्भवः ॥" इति ।
तथा पूङः कितौ इति पूङः परः क्त्वाप्रत्ययः निष्ठा च सेड् न किद् भवति । पवितः, पवितवान् ।
मुनेः- पाणिनेः सूत्रानुसारठयं गुणातिदेशिकविचारः । श्रीमद्गुरोः प्रसादेन प्रापञ्चि मतिकीर्तिना ॥१६॥
श्रीयुगप्रधानश्रीमच्छ्रीजिनसिंहसूरिविजयिराज्ये श्रीमद्गुरूणां श्रीजयसोममहोपाध्यायानां प्रसादेनाऽनुभावेन मतिकीर्त्तिना पाठकश्रीगुणविनयविनेयेन प्रापञ्चि- प्रपञ्चितो विस्तारितः । श्लोकबन्धेन पाणिनिसूत्रानुसारेण शब्दानुशासननिष्णातमतीनां विदुषां पुरः प्रकाशितः इत्यर्थः ।
इति श्रीगुणकित्त्व-षोडशिका ॥ पं० श्रीजीवकीर्तिगणि-लिखितं ॥
१. मृषस्तितिक्षायाम् - १/२/२० २. उदुपधाद् भावादिकर्मणोरन्यतरस्याम् - १/२/२१ ३. पूङः क्त्वा च - १/२/२२
Page #21
--------------------------------------------------------------------------
________________
अनुसन्धान-५६
श्रीमुरीबाई-तेरमास (हरखासुत-शिवराजकृत)
- संपा. रसीला कडीआ
वि.सं. १८९२मां रचायेल 'श्रीमुरीबाई-महासतीना तेरमास'नी हस्तप्रत 'श्री कोडाय जैन महाजन भण्डार'मांथी प्राप्त थयेल हती. कुल ५२ गाथामां आ तेर मास निरूपाया छे. मागशर सुद १३ने गुरुवारना रोज तेनी रचना थयेली छे. रचनाकार श्रीशिवराज (सवराज) लोंकागच्छनो श्रावक छे. ते सायलानो निवासी छे. तेना पितानुं नाम हरखा छे.
जैन गुर्जर कवि भा. ६, पृ. ३१२-३१३ पर आ कृतिनी नोंध 'मूलीबाईना बारमास-५२ गाथा' ओम मूकी छे. प्रस्तुत कृतिनो 'तेरमास'थी उल्लेख छे. जै.गू.क. मां कृतिना आरम्भ-अन्त आ प्रमाणे छ : आदि :
हुं तो नमुं सिद्ध भगवंत, मुकी मन आमलो रे गुण गाउं मुलीबाई सती, सहुको सांभलो रे सती श्रावण सुंदर मास, कैसे रे वखाणुं रे
जेहनी साख सिद्धांत मोझार, वदवा न जाणुं रे अंत :
संवत अढार बांणुओ, जोड्या मागसीर मास रे तीथि तेरस में गुरुवार, पख अजवास रे मूलीबाई तणो महिमा, चउ दस गाजे रे भणे हरखासुत सवराज, सायलामां बिराजे रे
आ प्रत राजकोटना प्राणजीवन मोरारजी शाह पासे होवानुं नोंधायुं छे. आ प्रतमां मुरीबाईनो उल्लेख मुलीबाई छे. तेरमासनी प्रतमां पण क्यांक मुलीबाई तरीके उल्लेख छे. वळी, 'आदि'मांनी ४थी पंक्ति ‘वदवा न जाणुं' अने प्रस्तुत कृतिमां 'वढवाण जाणुं रे'नो तफावत ध्यान खेंचे छे. बीजी गाथामां 'तिहां क्रीडा करे नरनार' वांचतां अहीं 'वढवांण' शहेरनो उल्लेख साचो जणाय छे. अंते कवि पोतानो 'सवराज' तरीके उल्लेख को छे ज्यारे प्रस्तुत 'तेरमासा'मां
Page #22
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
'सिवराज' तरीके उल्लेख छे. ' बारमास' नी प्रत मळी नथी तेथी बन्नेना वधु पाठ-भेद नोंधी शकाता नथी.
११७
शीर्षक सूचवे छे तेम आ कृतिमां लोंकागच्छना (स्थानकवासी) साध्वी-महासतीजी -मुरीबाईना तप- शीलना गुण गाती जीवन झरमरने बार - मासी स्वरूपमां आलेखाई छे. लिप्यन्तर करती वखते 'ष'नो ज्यां ख थतो होय त्यां सीधो 'ख' करवामां आव्यो छे. शब्दान्ते अनुनासिक होय तो आगलो वर्ण अनुस्वार ले छे, (जेमके - रतन - रतंन / जाणुं - जांणुं) अ भाषाकीय वलण नोंधनीय छे.
मध्यकालीन गुजराती साहित्यमां 'फागु'नी पेठे बारमासी स्वरूप खूब ज खेडायुं छे. अधिक मासवाळु वर्ष होय तो ते 'तेरमासा' तरीके पण ओळखाय छे. मोटे भागे जैन कविओओ नेम - राजुल के स्थूलिभद्र - कोशाना जीवनवृत्तान्तने पसंद कर्तुं छे. मुख्यतः तेमां बारे मासना विशिष्ट वर्णन साथे नायिकाविरह आलेखायो छे. सामान्यतः अन्त मिलनथी आवे छे. सं. १६४९मां श्रीउदयरत्ने 'नेमिनाथ तेरमासा' लख्या छे.
प्रस्तुत कृति अना स्वरूपलक्षणोनी रीते जुदी पडे छे. अहीं नायिकानो विरह अने अन्ते मिलन वर्णवाया नथी, पण प्रत्येक महिने श्रीमुरीबाई संयमना मार्गे केवी रीते आगळ वधे छे तेना विकासना सोपान आलेखाया छे. महिनाओनुं विशिष्टता साथेनुं प्रकृतिवर्णन अहीं गेरहाजर छे.
ओक श्रावके साध्वीजीना जीवनने आलेख्युं छे. ओमां दरेक महिने अमनो तप-जपना मार्गे थतो आध्यात्मिक विकास अन्ते संथारो ग्रहण करवा पर्यन्त पहोंचे छे तेनी वात करी छे. कवि पोते पण जैन धर्ममां श्रद्धा राखनारा छे. पोताना घरनी सामे ज, जीवणभाई शेठ अने झमकु शेठाणीओ 'थानक' (स्थानक) बनाव्युं होवाथी, कविना दिलने अत्यन्त आनन्द उपजे छे. ते समये वखतचंद राजा राज्य करतो हतो तेवी औतिहासिक माहिती पण अहीं मळे छे. कवि पोते स्थानकवासी जैनमतमां ऊंडी श्रद्धा धरावनारा अने धर्मानुरागी श्रावक होवानुं उपरोक्त माहिती जणावे छे.
प्रस्तुत रचनाना प्रत्येक मासमां कुल ४-४ गाथाओ छे. श्रावण मासथी तेनो प्रारम्भ थाय छे, जेमां मुरीबाईना जन्मस्थळ अने मातपिता तथा बाळपणनी
Page #23
--------------------------------------------------------------------------
________________
११८
अनुसन्धान-५६
विगतो मळे छे. मुरीबाई दशा - श्रीमाळी वणिक श्रीरतनशा अने अमृतबाईथी थयेल पुत्री छे. तेओ वढवाणमां रहेता हता. मुरीबाई रूपे अने गुणे अजोड हतां. पिताने प्राणना आधार सम हतां. आज्ञांकित होवाथी माता - पिताने खूब वहालां हतां. बाळपणथी ज पूर्वपुण्यना संस्कारो जागृत थया होय ते धर्मने पामेलां हतां धर्ममां अनन्य रुचि हती.
बीजा मास (भादरवा)मां मुरीबाईनी यौवन अवस्थानुं वर्णन छे. कोठारी नानजी साथे लग्न थया. ओरमाया सन्तान होवानी वात छे, जेथी नानजी कोठारी बीजवर होवानुं जणाय छे. संसार मांड्यो छे पण मनमां वैराग्य वसेलो छे. रंगभोगनी वात तेने रुचती नथी. भक्तिमां सदा तल्लीन रहे छे. सदा तप-आयंबिल के उपवास करती रहे छे. साधु-साध्वीने सूझतो आहार वहोराववो गमे छे. अषाढ मासमां जेम मेघ मुशळधार वरसे छे तेम मुरीबाई धर्मकार्योमां
(खोडाढोरने खाण आपवुं गरीबगुरबांने दान आपवुं, पतिनी संपत्तिनो अनेक जरूरियातोने दान आपी योग्य उपयोग करवो) व्यस्त रहे छे. घरमां ओरमान सन्तानोने पोतानां करी लीधा छे. ओमनी आंख क्यारेय मानी याद आवी भीनी न थाय ते जुभे छे.
त्रीजा (आसो) मासमां मुरीबाईनो आन्तरिक वैराग्य विशेष दृढ थतो वर्णव्यो छे. सदा उपाश्रये जती रहेती होवाथी, संसारमां ओने हवे कशी आशा जणाती नथी. ‘संसार चार दिवसना चांदरडा जेवो छे, कठपूतळीनो खेल छे, ओ ज्यां कर्मना मार्या नचावे तेम नाचवानुं छे. सगावहालां घणां छे पण अन्त समये तो कोई साथे आवनार नथी तेथी आ संसार- दावानळमांथी - बळतामाथी
मने बहार काढवी जोईओ' अवुं मंथन शरू थाय छे. उपाश्रयमां आठे पहोर आवी, सती-साध्वीनां चरणो सेवे छे. बीजी बाजु, मोह-ममता छोडी, धननो छूटे हाथे दान आपवामां, साधर्मिक भक्तिमां, विकलांग प्रत्ये विशेष वहाल दर्शावी, अनेक जीवोने शाता पहोंचाडे छे.
—
त्रीजा महिनामां संसारना जूठा स्वरूपने ओळखी, मुक्त थवानुं मन्थन चालतुं बताव्युं हतुं. हवे चोथा (कारतक) मासमां से मार्गे प्रयाण थाय तेवी, करणीमां परिवर्तित थाय छे. सतत अरिहन्त देवनुं ध्यान करे छे. वस्त्रो पहेरवामां सादाई आवी. शणगारनो त्याग कर्यो. विषय- कषाय छोड्या. खावा
Page #24
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
पीवानी अनेक वानगीनो त्याग कर्यो. सेंथो पूरवार्नु छोड्यु. पांथी पाडवा- पण छोड्यु. आंखमां काजळ लगाववानुं छोडी दीधुं. मधुर कण्ठ हतो छतां हवे मोटे अवाजे गाती नथी, क्यारेय निन्दा-कूथली करती नथी. मोटेथी हसती नथी. सत्संगनो महिमा समजती थई छे, तेथी ज्यां सोबत बराबर न लागे त्यां ते सोबतथी दूर रहे छे.
पांचमा (मागशर) मासमां मुरीबाईनो अध्यात्मभाव अटलो विकसे छे के आर्या आणंदबाई जेवा गुरु मळे छे अने तेमनी पासे धर्मनो अभ्यास करे छे. बार व्रत अंगीकार करे छे. हवे मुरीबाईने घरना काममां चित्त रहेतुं नथी, वधुने वधु समय ते उपाश्रये आणंदबाई पासे शीखती रहे छे. सामायिक, प्रतिक्रमण अने पोसहनी लेह लागी छे. अस्थिर संसारमा रहेQ ओने माटे हवे केदखाना जेवू थई पड्युं छे. संयम मार्गे क्यारे जाउं, क्यारे घेर आवन-जावनना फेरां बंध थशे ? क्यारे मोहनी तांत तोडुं ? - आ ज लेह लागी छे हवे मुरीबाईने !
छठ्ठा (पोष) मासमां मुरीबाई हवे संसारमाथी नीकळवानो मक्कम निरधार करे छे. घरमां सौने स्पष्ट जणावी दे छे के पोताने हवे दीक्षा लेवी छे, आ वातनी आडे कोइओ आवq नहि. अहीं मुरीबाईना चारित्र्यनी उत्कृष्टता कवि सरस वर्णवी छे. घरमां सौ प्रथम आ वात सांभळी, ओरमान दीकरो आ वातनो विरोध करे छे. कहे छे - "शा माटे तमारे दीक्षा लेवी ? लाडकोडथी उछेर्या पछी हवे मने छोडीने जशो ? क्यारेय अमने कडवां वेण कह्यां नथी. माथीये अदकेरो स्नेह तमे आप्यो छे." आम कही दीकरो चोधार रडी पडे छे. पीयरनो परिवार पण करगरे छे. पण मुरीबाई सौने संसारनु दुःख, संसार स्वरूप वर्णवे छे अने सौने पोतानी वात माटे मनावी ले छे.
सातमा (माह) मासमां संयम लेवानी तैयारी दर्शावी छे. पात्रां ने पुस्तको लीधां. खूब ज धन खरच्यु. लींबडीमां आवीने दीक्षानो उत्सव कर्यो. लींबडीना शेठ रघुभाईले आ उत्सव पोताने शिरे ऊठावी पुण्यकर्म बांध्युं. रतनबाई तेमना गुरु बन्या. दीक्षाना पाठ, नवा ग्रन्थो, जीव-अजीवना भेद, चोराशी लाख योनि वगेरे शीखवाड्या.
आठमा मास (फागण)मां अमणे लीधेली दीक्षानी वात छे. सं. १८६५ना
Page #25
--------------------------------------------------------------------------
________________
१२०
अनुसन्धान-५६
वसंत मासनी वद चोथे, श्रीरतनबाईना हाथे दीक्षा थई. रत्नचिन्तामणि सरीखा महाव्रत पामी मुरीबाई खुश छे. संसारसमुद्रमांथी मारा गुरुजीओ डूबतांनी बांय पकडी मने बहार काढी छे अनो अमनो सन्तोष छे. अटले ज कुटुंब कलकले छे, पीयरनो परिवार धूस्के धूस्के रडे छे त्यारे काचना कटका माटे \ रत्न खोवाय ? ओम समजावी, दरेकने शक्ति प्रमाणे व्रत-पच्चक्खाण उचरावे छे.
नवमा (चैत्र) मासमां तेओ विचारे छे : "आयखानो कशो भरोसो छे नहि तो तप करीने कर्म टाळवा ओ ज ओक उपाय छे." आथी अमणे छठ्ठ अने अठ्ठम तप शरू कर्या. ९६दोषनो त्याग करी, निर्दोष आहार वापरतां. (श्वेतांबर मूर्तिपूजक सम्प्रदायमा आहारना दोष ४२+५ = ४७ गणाय छे. स्थानकवासी सम्प्रदायमां ९६ दोषो गणाव्या छे.) उपवासो वधता जाय छे. १५ उपवास तो असंख्य वार करे छे. मासखमण (महिनाना उपवास) करवाना शरू कर्या. कायाने भाडं आपवानुं समजी, विगयत्याग करी, लूटुं अन्न वापरता. लीलुं शाक खावा, यावज्जीव छोड्यु. पोते क्यारेय चेली नहि करे तेवो निरधार करे छे. जेम आंबाना लाकडानो थांभलो मजबूत- टकी शके तेवो नथी होतो तेम आ देह काचा कुम्भ पेठे गमे त्यारे तूटी जवानो छे तेम समजी, तपमां अने वीर प्रभुना गुण गावामां लीन रहे छे.
दसमा (वैशाख) मासमां तप हजु वधु उग्र बनतुं जाय छे. हवे आहारमा मात्र बे ज द्रव्य ले छे. वस्त्रो जूनां पहेरे छे. छाश अने लोट वापरे छे. ९३ दिवस सुधी आ ज आहार रह्यो त्यारे आंखो तगतगवा लागी. जे जोइने शेठ रघुभाई अमने विनती करीने बे रोटली लेवाने समजावी दीधां. आ आहार उपर तप तो चालु ज हता. शरीर हाडपिंजर बनी गयु. शरीरनी नसोनुं जाळं देखावा लाग्युं. आम, तप करी, कायामांथी जाणे सर्व कस काढी लीधो.
___ अगियारमा (जेठ) मासमां हवे मुरीबाईने देहनो जाणे के भार लागे छे ! क्यारे अने वोसिरावू ? आथी, तप उग्रतर बनतुं चाल्यु. आठ उपवासने पारणे दस उपवास अq घणा दिवस चाल्यु. परिषहो सह्या – नित्य नवा नवा. सिंह पेठे दीक्षा पाळी. रागद्वेषने तो चकचुर कर्या. सर्पनी कांचळी जेवू शरीर थई गयु. मात्र अमां हवे आत्मा ज ओकलो रह्यो छे, बाकी कायामां कशुं नथी.
Page #26
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
१२१
संथारो हवे निश्चित हशे अम जणावी कवि हवे बारमा मास (अषाढ)ने वर्णवे छे.
अषाढ मासे अनशन लई, खमतखामणां करी, देह वोसराववानुं मुरीबाईओ पगलुं भर्यु. रघुभाई तथा मेघबाई शेठाणीओ सती-साध्वीओने ऊलटभेर दान आप्यां. खेतशीभाईनी पुत्री झमकुबाई तेमनी सेवामां रही. १३ दिवसनो संथारो करी सं. १८९०ना अषाढ सुद १४ना शुक्रवारना रोज स्वर्गवास-काळधर्म पाम्या. मुरीबाईनी जीवनकथा अहीं पूरी थाय छे.
तेरमा अधिक मासमां कवि पोतानी अने पोताना समयनी विगतो आपे छे. कविना घरनी पासे स्थानक (उपाश्रय) छे. जीवणभाई शेठ अने झमकुबाई शेठाणी) करावेल छे. आ स्थानक जोईने कवि- दिल ठरे छे. साधुजननी सेवा, हृदयमां भक्ति लावीने करवानी ते प्रेरणा आपे छे. मानवनो भाव दुष्कर छे. पुण्यकर्मने कारणे उत्तम ओवो जिनधर्म प्राप्त थयो छे तेनी कवि सराहना करने छे.
आ रचनासमये न्यायप्रिय राजा वखतसिंह राणा राज्य करता हता. अंते तेओ प्रस्तुत रचनानी साल अने कविनाम आपे छे ते मुजब आ रचना सं. १८९२ना मागशर सुद १३ने गुरुवारना रोज करवामां आवी छे. अर्थात् मुरीबाई महासतीना काळधर्म पाम्या बाद बे वर्षमां ज आ रचना थई छे. कविओ पोताने हरखाना दीकरा शिवराज (जे सायलामां रहे छे) तरीके ओळखाव्यो
___ आम, आ तेरमासा ओ परम्परित बारमासी प्रकार करतां थोडं अलग प्रकार- होवाथी, तेमां तत्कालीन समयना राजानी, कविनी माहिती होवाथी, औतिहासिक मूल्यवत्ता धरावे छे. अहीं परम्परित प्रकृतिवर्णननी ओथ लेवाई नथी, के विरहनो ऊंडो, उत्कृष्ट सूर नथी, छतां श्रीमूरीबाई महासतीना तपोमय जीवननी झरमर कशाय ओप विना ओवी सुन्दर रीते आलेखी छे के श्रीमुरीबाईनी मोक्ष मार्गनी लेह उत्कृष्टपणे दर्शावी शक्या छे. ओ रीते आ कृति अनोखी छे.
Page #27
--------------------------------------------------------------------------
________________
१२२
अनुसन्धान-५६
महासती मुरीबाईना तेर मास ॐ नमः सिद्धं । अथ श्रीमुरीबाई महासतीनां मैना लिखा छे.
(हरीनामना मैनानी देशी) हुं तो नमुं रे सिद्ध नरंद, मूकी आंबलो रे. गुण गाउं मुरीबाइ सती, सौ को सांभलो रे. सती श्रावण सुंदर मास, जेसे जेसे वखांणु रे. जेनी सांख्य सिद्धांत मोझार, वढवांण जाणुं रे. ॥१॥
तिहां क्रीडा करे नरनार, बेठां गोख जाली रे, तेमां रहे रतंनसा वणीक, दसो श्रीमाली रे. तस्य घरुणी अमृतबाई, मधुरं बोले रे.
तस्य कुंखे उपनां मुरीबाई, नहिं तस्या तोले रे ॥२॥ अमृतजाइ सुता सोय, सुंदरी सारी रे, जेनां रूप तणो नहि पार, सुर अवतारी रे, मात पित्या तणुं वचन, मुलीबाई न लोपे रे. पित्याने प्रांण आधार, कदी नव कोपे रे ॥३॥
बालापणमां बाई, कुचाल नवि चाली रे. माताने तु(उ)रणीवे, तनया बहु वाली रे. पूर्व पुंन्य तणे पसाय, पामी धर्म वेलो रे. भणे हरखासुत सिवराज, मास ओ पहेलो रे. ॥४॥१
॥ मास बीजो ॥ सखी भादरवे भरपूर, जोबन जब आयो रे. कोठारी नानजी घेर, सगपण करायो रे. परणी आवी पतीने घेर, करे बहु भगती रे. जेनें मन वसीयो वैराग, डगावी न डगती रे. ॥१॥
जेनें रंगभोगनी वात, मंन नथी गमती रे, ओ तो करे उपवास आंबिल, आतम बहु दंमती रे.
Page #28
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
१२३
नारी पासे निर्मल सील, करंम बहु कापे रे.
साध साधवीने सुझंतां आहार, मुरीबाई आपे रे. ॥२॥ वस्त्र-पात्र पोषे अपार, पाले धर्म गाढो रे. जिम वरसे मुसलधार, मेघ आसाढो रे. खोडा ढोरने खवरावे खांण, अजा बहु उगारे रे. रांकढीकनें दीये गर्थ, दोष निवारे रे. ॥३॥
गर्थ तणां भर्या भंडार, दांन बहु दीधा रे. आप्या मानवि राखी ओझ, मनुखा लावो लीधा रे.
ओरमाया उपर आंख्य, खुणो नवि भीज्यो रे. भणे हरखासुत सिवराज, मास ओ बीजो रे. ॥४॥ सळंग ८
॥ मास त्रीजो छे ॥ आसोओ आसा तोडि, संसारनी सर्वे रे. मुरीबाई मन करे विचार, कर्म कुंण करवे रे. आ तो चार दिवसनां चांदरडा, बाजीगरनी बाजी रे. संसारना खोटा खेल, थावं सुं राजी रे ॥१॥
सगासागवा बहु कोय, छे सुखनां बेली रे. अंत समें आपणुं नहि कोय, जावं मेली रे. हवे बलतामांथी काढुं, जे दउं मारे हाथे रे.
ते मारुं निरधार, आवे मारे साथे रे. ॥२॥ मोह ममता मुरीबाई, न राखे लिगार रे. धर्म-हेते वावर्यु धन, गरथ भंडार रे. तृप्ता कर्या घंणा जीव, साता उपजावे रे. साधर्मीसुं घंणो सनेह, धर्म गुंण भावे रे. ॥३॥
कंगाल तणो जांण्यो, मुरीबाई मालवो रे. लुला अपंग जे जीव, तेंने पालवो रे. अपासरे आवे आठे पोर, सेवे सति चरण रे. भणे हरखासुत सिवराज, मास ओ त्रण रे. ॥४॥ सळंग १२
Page #29
--------------------------------------------------------------------------
________________
१२४
अनुसन्धान-५६
॥ मास चोथो ॥ सखी आव्यो कार्तक मास, जे करणी मांडी रे. मुरीबाईइं विषय कषाय, मेल्या सर्व छांडी रे. आछो वस्त्र पेरे नहि अंग, सणघार न सजे रे. ओक मंनें अरिहंत देव, ध्यान धरी भजे रे. ॥१॥
मुख वावरे नहि मुखवास, सोपारी नवि खावे रे. जेनें गंमें ज्ञाननी गोठ, अंतरमां भावे रे. करे नहिं अंजन मंजन, सेंथो नवि पूरे रे.
गीत गावें नहिं सरले साद, कंठ मधुर रे. ॥२॥ वलि विकथा केरी वात, कदी नवि करे रे. जेथी लागें पोताने पाप, तेथी बहु डरे रे. दांत देखाडी करे नहिं गुझ, हसी नवि ल्ये ताली रे. कदी केस तणें अलंकार, पाती नवि ढाली रे. ॥३॥
नारी नीच तणी संगत, कदी नवि करे रे. जेनां वचंन अमृत समांन, दीठे दिल ठरे रे. स्त्रीचरित तणो लवलेश, न जाणे लिगार रे. भणे हरखासुत सिवराज, मास ओ च्यार रे. ॥४॥ सळंग १६
॥ मास ५मो ॥ सती मागसरे मोहनी, मुरीबाई उतारी रे. द्वादश कीधा अंगीकार, थया वृ(व्रतधारी रे. आरजाजी आणंदबाइ, सती सुधा वखांणु रे. सीखवी मुरीबाइने समाग, प्रथम जाणु रे. ॥१॥
करे पोसा में पडिकमणा, दिनमां दोय वेला रे. सतीनों करे घणुं संग, रहे नित्य भेला रे. मुरीबाई न करे घरनों काम, धर्म लय लागी रे.
विषय-वेल तणा जे जोर, मुक्या सर्वे त्यागी रे. ॥२॥ जेणे जाण्यों अथिर संसार, सुख जांण्यां काचा रे. भाक्सी सरिखा जाण्यां भोग, मुरीबाई साचा रे.
Page #30
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
चित चिंतवण करे अह, संसार के दी मेलूं रे. बलतामांथी नीकली बार, संजम के दी खेलूं रे. ॥३॥ घरे आवणनां फेरा, कदी हुं छंडुं रे. जो तूटे मोहनी तांत, तो कर्मने खंडुं रे.
मारे लेवो संजम भार, नावे केनें आंच रे.
भणे हरखासुत सिवराज मास से पांच रे ॥४॥ सळंग २०
॥ मास छठो ॥
सती पोषे थइ प्रसिद्ध, दिख्या वात काढी रे. मारे लेवो संजम - भार, मत करो कोई आडी रे. बोल्यो ओरमायो दीकरो, के सुंण मारी माय रे. मारी सती सिरोमणी मात, विजोग किम थाय रे ॥१॥ लाडे कोडे रूडी पेर, उछेर्या अमने रें. संसार तज्यो स्या माट, घटे नहि तंमने रे.
मारी जननी अंगजायाथी, वधु तमे राख्या रे .
कदि कडवा कोहेला वेण, मनें नहि भाख्या रे. ॥२॥
हाथ जोडीनें करगरे, मांनों मारुं कयुं रे.
तमें ल्यो छो दिक्षानों नांम, नवि जाय रयुं रे.
के छे पीयरनों परिवार, सउ को करगरी रे. अखि वरसे जलधार, नेत्र भरीयां मंन गली रे. ॥३॥ मुरीबाई संसारनुं दुःख, वरणव्यं वली रे. उतर्यो सहुनें अंगोअंग, गया मंन गली रे. आज्ञा लीधी ततकाल, करी झटपट रे.
१२५
भणे हरखासुत सिवराज, मास से छठो रे. ॥४॥ सळंग २४
॥ मास सातमो ॥
महा मैंने मुरीबाई, करी छे सारी रे.
जेनें संजमनी सामग्री, लागे घणुं प्यारी रे. लीधा पात्रा नें पुस्तक, खरच्यां धन घणा रे . सहुने मंन उलट भाव, न राखी मणां रे. ॥१॥
Page #31
--------------------------------------------------------------------------
________________
१२६
अनुसन्धान-५६
आव्या सेर लींबडी मुझार, सती मुरीबाई रे. को दिख्या तणो ओछव, सेठ रघुभाई रे. जिन मत दीपाव्यो जोर, भली भली भांते रे.
सेर लींबडीना साहुकार, वावरे पुंन्य खाते रे ॥२॥ मुरीबाई थया उजमाल, हरख नवि माय रे. मुनें अदरावो महाव्रत, क्षिण लाखेणी जाय रे. कर जोडी मुलीबाई कहे, सिर नामी रे. रतनबाई आपो दिक्षाय, करी मेरबांनी रे. ॥३॥
सीखवे दीक्षा तणा जे पाट, नित्य नवा ग्रन्थ रे. सीख्या जीव-अजीवनां भेद, जाण्यां सर्व अर्थ रे. चोरासी लाख जीवा, जोंननी जांणी जात रे. भणे हरखासुत सिवराज, मास ओ सात रे. ॥४॥ सळंग २८
॥ मास आठमो ॥ फागणे फेरा मिटाया, आवणगमणनां रे. मुरीबाई आदर्या महाव्रत, रतन चिंतामणनां रे. सवंत अढारसें पांसठ, वसंत मासे रे. वदि चोथे लीधी दिक्षाय, रतनबाई पासे रे. ॥१॥
कुटंब सहु कलकले, सामों नवि जुवे रे. पीयरनों परिवार, ध्रुसके रुवे रे.. मुरीबाइ कहे ततकाल, स्या माटे रुवो रे.
तमे काचना कटका माट, रतन केंम खोवो रे. ॥२॥ भंमतां अनंता काल, मनुष भव आव्यो रे. कांइ आदरो सत सीयल, लहो धर्म लावो रे. आदरीया व्रत पचखाण, जेनी जेवी सगती रे. मुरीबाई आव्या रतनबाई पास, करे बहु भगती रे. ॥३॥
संसार समुदरमांथी, गुरणीजीये तारी रे. मारी बुडतांनी झाली बांह, काढी मुनें वारी रे. संजम खेले खांडाधार, करे पूरण खाटे रे. भणे हरखासुत सिवराज, मास ओ आठ रे. ॥४॥ सळंग ३२
Page #32
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
१२७
॥ मास नवमो ॥ चईतरे चित जोयुं, मुलीबाई विचारी रे. आउखानो भरोसो नाहिं, घडि जाय प्यारी रे. आवसे परदेसी आणां, पाछां नहि वले रे. मुंने आवेला आ जोग, पछे नहि मले रे. ॥१॥
जो बांधुं तप तरवार, तो शिवसुख मले रे. जो कुएं करणी अघोर, तो कर्म ज टले रे. करे छठ ने अठम, बेसे आसन वाली रे.
निर्दोषण लावे आहार, छन्नु दोष टाली रे. ॥२॥ मासखमणा करे मंनगंमता, पंनरनो नहि पार रे. कर्मने दीधो दावानल, बाली कीधो छार रे. विगय मात्र वावरे नाहिं, लुखुं लावे अन्न रे. काया जाणी भाडारुप, आपें जांणीउ गंन रे. ॥३॥
नीलुं वंजन वरज्युं जावजीव, चेली नव्य खपे रे. वीर प्रभुजीनां गुण गाय, बेठा मुख जंपे रे. काचा कुंभ सरिखी जांणी देह, न करो आंबा थुभो रे. भणे हरखासुत सिवराज, मास ओ नोमों रे. ॥४॥ सळंग ३६
॥ मास १०मो ॥ वैसाकें वावरे द्रव्य दोय, त्रीजु द्रव्य नव्य लीये रे. सति जुंनां पेरे वस्त्र, छास लोट पीये रे.. त्राणु दिन पीधी वलि प्रास, आंखुं तगतगे रे. ओ सती आगल सुंदरी, बीजी नव्य लागे रे. ॥१॥
सेठ रघुभाई करी वीनती, समझावी दीधा रे. बे रोटलीनां लीधा आहार, उपरे आकरा तप कीधां रे. हालंतां खडखडे हाड, पग दोरी समान रे.
नस-जालुं नरवी देखाय, जिह्वा सुकुं पान रे. ॥२॥ आप तणो अवगुण लेवे, परनें सोभा देता रे. हुं एक जिह्वांइ करी, वर्णव करुं केता रे.
Page #33
--------------------------------------------------------------------------
________________
१२८
सौनां उपरे समताभाव, नहिं केनें दुखदाई रे. अजवाल्युं कोठारीनुं कुळ, सती मुरीबाई रे ॥३॥ वचंन कथंन तणा जे वेण, न धरें कांने रे, जेनें अडाव्यं मोक्ष्यसुं मंन, करी अकध्यांने रे.
तप करी कायामांथी, काढी लीधो सर्व कस रे . भणें हरखासुत सिवराज मास से दस रे ॥४॥ सळंग ४०
॥ मास इग्यारमो ॥
जेठे जांणपणुं सतीये, घणुं आण्यं रे.
कदि वोसरावूं मारी देह, बने अवुं टांणुं रे. पछे बांधी तपनी टेक, अन्न नवि खावुं रे. आठनें पारणे दस, अवुं बहु दिन चलाव्यं रे. ॥१॥ वलि परिसा तणी चोट, नित्य नवी मेले रे. जो आवे देव दांणव, तेथी नव्य छले रे. सूरपणे लीधी दिक्षा, सीहपणे पाली रे. रागद्वेष कर्या चकचुर, कर्म दीधा बाली रे. ॥२॥ लालच नें लपसा लेप, नहिं लगारि रे.
अ साची सती मुरीबाई, जाउं बलिहारी रे.
सुके भुके कर्यो सरीर, नहि रुद्र नें मांस रे. मांहि रयो वालो वलगी, जीव तणो हंस रे. ॥३॥
अनुसन्धान-५६
सर्पनुं खोखुं जेवुं, ओवी करी काया रे. तप करी सोस्युं सरीर, नवि राखी माया रे. हवे करसे संथारो सती, संदेह नैं लगार रे. भणे हरखासुत सिवराज, मास इग्यार रे. ॥४॥
॥ मास बारमों ॥ सती आसाडे अणसण, आलवी सुता रे . अनंता भवना काप्या, कर्म जे खुता रे . नमण खमण मुरीबाई, बहुविध कीधी रे. खंमत खांमणा खंमावी देह, वोसिरावी दीधी रे. ॥१॥
Page #34
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऑगस्ट २०११
सेठ रघुभाइ घेर जाणो, मेघबाई सेठांणी रे. जेणे आप्या सतीयुं नें दांन, उलट भाव आणी रे. खेतसीभाई धुया झमकुबाई, करे सुत अर्थ रे. सतीयुंनी करे सेवा, अंत समें समृद्ध रे ॥२॥ वैराग घोडे थया असवार, सती मुरीबाई रे .. धंन माता अमृत कुंख, मणीरतंन जाई रे. सुभ प्रणांमनें सुभ लेसा, अंत समें आवी रे. गया देवलोक मोझार, कर्म खपावी रे ॥३॥
अजवांली चौदस दिन, आथमी बेठो मेर रे. सुक्रवारे सीधो संथार, चाल्यो दिन तेर रे.
ने युवानें असाडे, निरवांण पोता निरधार रे.
भणे हरखासुत सिवराज, मास अ बार रे. ॥४॥ सळंग ४८
॥ मास अदिक ॥
अदक मासे अदका करी, सती गुण गावो रे. तमें करो करणी दिन रात, कर्म खपावो रे. सतीनुं थयुं सुध कांम, आप विचार करवो रे. जप तपने सत सीयल, चितमां धरवो रे ॥१॥
उत्तंम धर्म जिन-मार्ग, मल्यो पुंन्य जोगे रे. दुकर मानवनो भव, भाख्यो वीतरागे रे. मारा घर पासे थांनक, दीठे दिल ठरे रे. राणो वखतसंग भुपाल, अन्या नवि करे रे. ॥२॥ जीवणभाई कराव्यो थांनक, घरे झमकुं सेठाणी रे. जों गाया अविचल प्रताप, साख समाणी रे. साधुजननी करो सेवा, भगती लावन रे. पूरा थयामास तेर, गाथा बावन रे. ॥३॥
१२९
संवत अढारसे बाणुंये, जोडी मागसर मास रे. तिथि तेरस नें गुरुवार, पख अजवास रे.
Page #35
--------------------------------------------------------------------------
________________ 130 अनुसन्धान-५६ मुरीबाई तणो महिमाय, चिहुं दिसि गाजे रे. भणे हरखासुत सिवराज, सायलामां विराजे रे. // 4 // इति श्री महाशती मुरीबाईनो 13 मास संपूर्णम् // श्रेयोस्तु सुभं भवतु // शब्दार्थ कडी/पंक्ति कडी/पंक्ति 1/1 आंबलो = वट 35/2 छार = राख 2/3 घरुणी = गृहिणी/स्त्री 35/4 गंन = गुण 2/4 उपनां = जन्म्या 36/1 नीलुं = लीलुं 4/3 पसाय = कृपा थकी 36/1 वंजन = व्यंजन/शाक के चटणी 7/3 अजा = बकरी जेवी वानगी 7/4 रांकढीक = गरीबगुरबां 36/3 आंबा थुभो = आंबाना थांभला 7/4 गर्थ = धन जेवो निःसार 8/2 ओझ = उदारता 36/4 नोमों = नवमो 10/1 सगासागवा = सगावहाला 37/3 प्रास = प्राश/खावू/आरोगवू 11/3 साता = शांति/शाता 40/2 अडाव्युं = लगाड्यु 12/1 मालवो = मालव देशनो राजा 41/2 वोसरावू = त्यजूं 14/4 सरले साद = दीर्घ/प्रलंब अवाजे 42/1 परिसा = परिषह ? = कर्मनी निर्जरा 15/4 पाती = पांथी/सेंथो अर्थे स्वेच्छाथी भोगवाता कष्टो 17/4 समाग = समाय/सामयिक ? 43/3 रुद्र = रुधिर 19/1 अथिर = अस्थिर/चंचळ 46/3 धुया = पुत्री 19/2 भाक्सी = केदखानुं 47/3 लेसा = लेश्या = अध्यवसाय = 21/1 दिख्या = दिक्षा भाव परिणाम 27/2 अदरावो = आदरवूनुं प्रेरक 48/2 सीधो = सिद्ध थर्बु, सफळ थर्बु 28/3 जोंन = योनि 48/3 युवाने असाडे = अषाढना मध्य भागे 31/3 सगती = शक्ति 49/1 अदक = अधिक 32/3 खाटे = लाभ थवो 50/4 अन्या = अन्याय