Book Title: Vishva Kartutva Mimansa Evam Jagat Kartutva Mimansa
Author(s): Sushilsuri, Jinottamvijay
Publisher: Sushil Sahitya Prakashan Samiti

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Page 34
________________ निष्क्रम्य भुवनं भासयन्ति, एवं ज्ञानमप्यात्मनः सकाशाद् बहिनिर्गत्य प्रमेयं परिच्छिनत्तीति । तत्रेदमुत्तरम् । किरणानां गुणत्वमसिद्धम्, तेषां तैजस् - पुद्गलमयत्वेन द्रव्यत्वात् । यश्च तेषां प्रकाशात्मा गुणः स तेभ्यो न जातु पृथग् भवतीति । तथा च धर्मसंग्रहिण्यां याकिनी महत्तराधर्मसूनुपूज्य श्री हरिभद्रसूरीश्वरःकिरणा गुणा न दव्वं तेसि पयासो गुणो न वा दव्वं । जं नाणं पायगुणो कहमदव्वो स अन्नत्थ ॥१॥ मन्तूण न परिछिन्दइ नाणं णेयं तयम्मि देसम्मि । आयत्थं चिय नवरं अचित सत्तीय विष्णेयं ॥२॥ लोहोपलरससत्ती प्रायत्था चेव भिन्नदेसं पि। लोहं प्रागरिसंती दीसइ इह कज्जपच्चक्खा ॥३॥ एवमिह नाण सत्ती आयत्था चेव हृदि लोगंतं । . जइ परिछिदइ सम्मं को णु विरोहो भवे तत्थं ॥४॥ संस्कृतच्छायाकिरणा गुणा न द्रव्यं, तेषां प्रकाशो गुणो न वा द्रव्यम् । यज्ज्ञानमात्मगुरणः, कथमद्रव्यः स अन्यत्र ।। १ ।। गत्वा न परिच्छिनत्ति, ज्ञानं ज्ञेयं तस्मिन् देशे । प्रात्मस्थमेव न वरम्, अचिन्त्य शकत्या तु विज्ञेयम् ।। २ ॥ विश्वकर्तृत्व-मीमांसा-१६

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