Book Title: Vishva Kartutva Mimansa Evam Jagat Kartutva Mimansa
Author(s): Sushilsuri, Jinottamvijay
Publisher: Sushil Sahitya Prakashan Samiti

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Page 58
________________ अथ कथमिव पृथ्वी आदि पदार्थ किसी बुद्धिमान् कर्ता के बनाये हुए हैं (कार्य होने से 'घटवत्'), यह अनुमान ठीक नहीं है क्योंकि इस अनुमान में व्याप्ति का ग्रहण नहीं होता। 'प्रमाण द्वारा व्याप्ति के सिद्ध होने पर ही साधन से साध्य का ज्ञान होता है' यह सर्ववादियों द्वारा अभिमत सिद्धान्त है। प्रश्न यह उठता है कि ईश्वर ने शरीर धारण करके विश्व-जगत् को बनाया अथवा अशरीरी होकर ? यदि ईश्वर ने शरीर धारण करके विश्व-जगत् को बनाया है तो वह शरीर हम लोगों की तरह दृश्य है या पिशाच आदि की तरह अदृश्य ? यदि वह शरीर हमारी तरह दृश्य है, तो इसमें प्रत्यक्ष से बाधा आती है। हमें ऐसा कोई दृश्य शरीरवाला ईश्वर दिखाई नहीं देता; जो घास, वृक्ष, इन्द्रधनुष, बादल इत्यादि की सृष्टि करता हो। अतएव जहाँजहाँ कार्यत्व है वहाँ-वहाँ सशरीर कर्तृत्त्व है, यह व्याप्ति नहीं बनती। कार्यत्व हेतु यहाँ साधारण अनैकान्तिक हेत्वाभास है। जो हेतु पक्ष, सपक्ष और विपक्ष में रहता है, उसे साधारण अनेकान्तिक कहते हैं। जैसे-पर्वत वह्नि-अग्निवाला है, प्रमेय होने के कारण; यहाँ प्रमेयत्व हेतु अग्निरूप साध्य के धारक पर्वत के पक्ष में रहता है, महानस रूप सपक्ष में रहता है और पर्वत से भिन्न साध्य विश्वकत्तुं त्व-मीमांसा-४३

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