Book Title: Tulsi Prajna 1978 07 Author(s): Shreechand Rampuriya, Nathmal Tatia, Dayanand Bhargav Publisher: Jain Vishva Bharati View full book textPage 7
________________ वचन-वीथी दो ठाणाई अपरियाणेत्ता आया णो आरम्भ और परिग्रह-इन दो स्थानों केवलिपण्णत्तं धम्मं लभेज्ज सवणयाए, तं को जाने और छोड़े बिना आत्मा केवलीजहा-आरंभे चेव, परिग्गहे चेव। प्रज्ञप्त धर्म को नहीं सुन पाता । दो ठाणाई अपरियाणेत्ता आया णो आरम्भ और परिग्रह - इन दो स्थानों केवलं बोधि बुज्झज्जा, तं जहा-आरम्भ को जाने और छोड़े बिना आत्मा विशुद्ध चेव, परिग्गहे चेव। बोधि का अनुभव नहीं करता। दो ठाणाई अपरियाणेता आया णो आरम्भ और परिग्रह-इन दो स्थानों केवलं मुडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं को जाने और छोड़े बिना आत्मा मुण्ड हो, पध्वइज्जा, तं जहा-प्रारंभे चेव, परिगहे गृह त्याग, सम्पूर्ण अनगारिता को नहीं चेव। पाता। दो ठाणाई अपरियाणेत्ता आया णो आरम्भ और परिग्रह-इन दो स्थानों केवलं बंभचेरवासमावसेज्जा, तं जहा- को जाने और छोड़ बिना आत्मा सम्पूर्ण ब्रह्मआरंभे चेव, परिग्गहे चेव। चर्य वास (आचार) को प्राप्त नहीं करता। दो ठाणाई अपरियाणेत्ता आया णो आरम्भ और परिग्रह-इन दो स्थानों केवलेणं संजमेणं संजमेज्जा, तं जहा-आरंभे को जाने और छोड़े बना आत्मा सम्पूर्ण संयम बेव, परिग्गहे चेव। के द्वारा संयत नहीं होता। दो ठाणाई अपरियाणेत्ता आया जो आरम्भ और परिग्रह-इन दो स्थानों केवलेणं संवरेणं संवरेज्जा, तं जहा- आरंभे को जाने और छोड़े बिना आत्मा सम्पूर्ण चेव, परिग्गहे चेव । संवर के द्वारा संवृत्त नहीं होता। दो ठाणाई अपरियाणेत्ता आया जो आरम्भ और परिग्रह-इन दो स्थानों केवलमाभिणिबोहियणाणं उप्पाडेज्जा, तं को जाने और छोड़े बिना आत्मा विशुद्ध जहा-आरंभे चेव, परिग्गहे चेव । आभिनिबोधिक ज्ञान को प्राप्त नहीं करता। दो ठाणाई अपरियाणेत्ता आया णो आरम्भ और परिग्रह -- इन दो स्थानों केवलं सुयणाणं उप्पाडेज्जा, तं जहा-आरंभे को जाने और छोड़े बिना आत्मा विशुद्ध चैव, परिग्गहे चैव । ___ श्रुतज्ञान को प्राप्त नहीं करता। दो ठाणाई अपरियाणेत्ता आया णो आरम्भ और परिग्रह-इन दो स्थानों केवलं प्रोहिणाणं उप्पाडेज्जा, तं जहा- को जाने और छोड़े बिना आत्मा विशुद्ध आरंभे चे व, परिग्गहे चेव । अवधिज्ञान को प्राप्त नहीं करता। दो ठाणाई अपरियाणेत्ता प्राया णो आरम्भ और परिग्रह–इन दो स्थानों केवलं मणपज्जवणाणं उप्पाडेज्जा, तं जहा को जाने और छोड़े बिना आत्मा विशुद्ध - आरंभे चेव, परिग्गहे चेव । मन:पर्यवज्ञान को प्राप्त नहीं करता। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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