Book Title: Tulsi Prajna 1978 07
Author(s): Shreechand Rampuriya, Nathmal Tatia, Dayanand Bhargav
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 26
________________ इसके बाद ग्रन्थ में जीवादि छह पदार्थों का निरूपण है । (9-49) । फिर सम्यक्त्व, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यग्चारित्र का कथन किया गया है (51-55)। व्यवहार चारित्र का वर्णन करते हुए ग्रन्थकार ने व्रत, समिति, गुप्ति और पंचपरमेष्ठी के स्वरूप को कहा है (56-76) । तथा निश्चयनय से चारित्र के वर्णन में प्रतिक्रमण (77-94), प्रत्याख्यान (95-106), आलोचना (107-112), प्रायश्चित (113-121), परमसमाधि (122-133), परमभक्ति (134-140) तथा परम आवश्यक (141-158) का निरूपण किया गया है। ग्रन्थ के अंतिम अधिकार में शुद्धोपयोग का वर्णन है। जिसमें अतीन्द्रिय ज्ञान, निर्वाण आदि का स्वरूप कहा गया है (159-181) अन्त में ग्रन्थ का फल कहा गया है कि जिनमागं के प्रति कभी भी अभक्ति नहीं करना चाहिए (186)। वैशिष्ट्य : 'नियमसार' की उपर्युक्त विषयवस्तु जैन परम्परा के ग्रन्थों में पर्याप्त प्रचलित है। टीकाकार ने उसे 12 अधिकारों में विभक्त कर प्रस्तुत किया है। यह विभाजन ग्रन्थकार के द्वारा नहीं किया गया है । क्योंकि कुन्दकुन्द के अन्य ग्रन्थों में यह प्रवृत्ति नहीं है । ग्रन्थ का अधिकांश विषय परम्परा से गृहीत है। अतः उतने भाग में कुछ नवीनता नहीं है। किन्तु कुछ दार्शनिक तत्त्व ऐसे हैं, जिनका वर्णन पहली बार नियमसार' में ही किया गया है। अतः ऐसे विषय मौलिक और महत्त्वपूर्ण हैं । रत्नत्रय का स्वरूप यद्यपि आगमों में एवं तत्त्वार्थसूत्र में वर्णित है, किन्तु तत्त्वार्थसूत्र में 'तत्त्वार्थ का श्रद्धान करना' यह सम्यग्दर्शन की परिभाषा है ।1 उत्तराध्ययन में भी नौ पदार्थों का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन कहा गया है। जबकि कुन्दकुन्द के नियमसार में कहा है 'अत्तागमतच्चाणं सद्दहणादो हवेइ सम्मत्तं' (5)। यहां तत्त्वों के अतिरिक्त आप्त और आगम का श्रद्धान करना भी आवश्यक माना गया है । तत्त्वों में सात पदार्थ न लेकर छह द्रव्यों को ही तत्त्वार्थ कहा गया है (9) । श्रद्धान को स्पष्ट करते हुए आगे कहा गया है कि विपरीत आग्रह से रहित एवं मलिनता व अस्थिरता से रहित श्रद्धान ही सम्यक्त्व है (51-52) । यहां यह ज्ञातव्य है कि नियमसार में सम्पग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का प्रयोग तो हुआ, किन्तु 'सम्यग्दर्शन' शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है । उसके स्थान पर 'सम्यक्त्व' ही कहा गया है। नियमसार के सम्यक्त्व की इसी परिभाषा को समन्तभद्र एवं वसुनन्दि ने भी आगे चल कर स्वीकार किया है। यद्यपि विभिन्न आचार्यों ने सम्यग्दर्शन की विभिन्न परिभाषाएं दी हैं । आप्त की परिभाषा देने में भी नियमसार ने पहल की है (5-7)। जिन 18 दोषों से आप्त को रहित होना चाहिए उनके नाम भी यहां दिये गये हैं (6) । सम्भवतः समन्तभद्र ने आप्त की परिभाषा कुन्दकुन्द के इस सन्दर्भ के आधार पर ही दी है। आगे चलकर वसुनंदि श्रावकाचार में 'अत्ता दोस विमुक्को' (7) कह कर इसका समर्थन किया गया है। 1. तत्त्वार्थ सूत्र, 1-2 2. उत्तराध्ययन, 28114-15 3. डॉ० के० सी० सोगानी, एथीकल डॉक्टराइन इन जैनिज्म, पृ० 62 १०६ तुलसी प्रज्ञा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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