Book Title: Tulsi Prajna 1978 07
Author(s): Shreechand Rampuriya, Nathmal Tatia, Dayanand Bhargav
Publisher: Jain Vishva Bharati
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रत्ति देवया वंदिया आगता, एक्कमासितो बारमूले, तदणु दोमासितो, तदणु तेमासितो, तदणु चाउम्मासितो, पंचमओ खुड्डतो, ते वोलेउखुड्डओ वंदितो। खमगा रुट्ठा । निग्गच्छंती चाउमासितेण वत्थंते घेत्तुं भणिता
'कडपूयणे ! तवस्सिणो न वंदसि ? दोसीणविद्धसणं वंदसि ।' . सा भणति-भावखमगं वंदामि, ण पूयासक्कारमाणिणो।' ते वेगंतेण सामरिसिता । देवता चेल्लगरक्खणत्थं पडिचोयणत्थं च सण्णिहिता चेव ।
बितियदिवसे चेल्लओ दोसीणमाणेतुमालोएत्ता चाउम्मासितं णिमंतेति । तेसिं तदिवसं पारणगाणि, तेण पडिगहगे से निट्ट दं । मिच्छा दुक्कडं, तुब्भ मते खेलमल्लतो ण दिण्णो त्ति । तमणेण उप्परातो खेलमल्लए छुढं । एवं तेमासिय दोमासिएहिं जाव मासिएण अ। फेडेता कुसणियलंबणं गेण्हंतो खमएहिं हत्थे गहितो। तस्स चेल्लगस्स अदीणस्स विसुद्ध परिणामस्स केवलमुप्पण्णं ।
देवया भणति–'कोधाभिभूता कहं तुब्भे वंदियवा ?' [ताहेते] खमगा संवेगमावण्णा-मिच्छा मे दुक्कडं, अहो ! बालस्स माहप्पं, अम्हेहिं पुण आसातितो। तेसि पि सुहअज्झवसाणाणं केवलमुप्पण्णं ।
प्रशस्त पद ताओ ठाणा सुसीलस्स सुव्वयस्स सगुणस्स समेरस्स सपच्चक्लाणपोसहोवासस्स पसत्था भवन्ति, तं जहा- अस्सि लोगे पसत्थे भवति; उववाए पसत्थे भवति ; आजाती पसत्था भवति ।
शील, व्रत, गुण, मर्यादा, प्रत्याख्यान और पौषधोपवास से युक्त पुरुष के तीन स्थान प्रशस्त होते हैं :-(1) इहलोक प्रशस्त होता है। (2) उपपात प्रशस्त होता है, (3) आगामी जन्म (देवलोक या नरक के बाद होने वाला मनुष्य जन्म) प्रशस्त होता है।
-ठाणं, 3/316
खण्ड ४, अंक २
१३६
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