Book Title: Tulsi Prajna 1978 07
Author(s): Shreechand Rampuriya, Nathmal Tatia, Dayanand Bhargav
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 67
________________ भाषा की दृष्टि से आगमों को दो युगों में विभक्त किया जा सकता है—ई०पू०-400 से ई० 100 तक का पहला युग है। इसमें रचित अंगों की भाषा अर्ध-मागधी है। दूसरा युग ई० 100 से ई० 500 तक का है । इसमें रचित या नि'ढ आगमों की भाषा महाराष्ट्री प्राकृत है। आगमों के भेद प्राचीन व्यवस्था में आगम के दो ही भेद थे-अंग प्रविष्ट और अंगबाह्य । वर्तमान में मूर्तिपूजक श्वेताम्बर आगमों के छः विभाग मानते हैं-(1) अंग (2) उपांग (3) प्रकीर्णक (4) छेदसूत्र (5) मूलसूत्र (6) चूलिकासूत्र । स्थानकवासी तथा तेरापन्थी सम्प्रदाय प्रधानतया आगम के चार विभाग करते हैं--(1) अंग (2) उपांग (3) मूल (4) छेद। दिगम्बर मान्यता के अनुसार आगम-साहित्य का सर्वथा लोप, वीर निर्वाण के 683 वर्ष तक, हो गया । प्रस्तुत निबन्ध का विषय आगमों की रचना, व्यवस्था या मान्यता विषयक विस्तृत ऊहापोह या विचारणा करना नहीं है । उसका विषय है आगम ग्रन्थों व उनकी व्याख्याओं में 'महावीरकालीन भारत की सभ्यता और संस्कृति का अध्ययन । सारी सामग्री आगम ग्रन्थों से लेनी है अतः उनकी संक्षिप्त जानकारी अस्थानीय नहीं मानी जानी चाहिये। आगम-ग्रन्थ अत्यन्त विशाल और विस्तृत हैं। उनकी भाषा अर्धमागधी है। वे जन-भाषा में रचे गए । परन्तु जन-भाषा का परिवर्तन होने पर जब उन्हें समझने की दुरूहता प्रतीत हुई तब उन पर अनेक व्याख्यात्मक ग्रन्थ लिखे गये । नियुक्ति, भाष्य, चूणि, टीका, दीपिका, अवचूरी, स्तबक और 'जोड़ हिन्दी में अनुवाद-ये इनके व्याख्यात्मक ग्रन्थ हैं . इनकी रचना यथा-क्रम हुई है। इनमें नियुक्ति और भाष्य की भाषा प्राकृत, चणि की संस्कृत मिश्रित प्राकृत, टीका-दीपिका और अवचूरि की संस्कृत, स्तबक' और जोड़ की की भाषा गुजराती-मिश्रित राजस्थानी है। इनका अध्ययन किये बिना हम आगमों में निर्दिष्ट तत्त्वों की यथार्थता को नहीं पकड़ सकते । आगमों की रचना सूत्र परिपाटी से हुई है, अतः उन सूत्रों को उन्हीं के व्याख्यात्मक ग्रन्थों के आधार पर समझा जा सकता है। 1. पाइयसहमहण्णव उपोद्घात, पृ० 30-31 2. वीर निर्वाण 62 वर्ष तक- केवली । " 162 , - चौदहपूर्वी " 345 , - दसपूर्वी , 565 , – ग्यारह अंगधर 683 , - आचारांगवित् तत्पश्चात् समस्त विनाश । [जैन सत्य प्रकाश-वर्ष 1, अंक 7, पृ० 213-215-मुनि दर्शनविजयजी का लेख । ] 3. स्तबकों के प्रसिद्ध रचयिता धर्मदासगणि हैं । 4. तेरापन्थ के चतुर्थ आचार्य श्रीमज्जयाचार्य ने अनेक आगमों पर 'जोड़ें रची। खण्ड ४, अंक २ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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