Book Title: Tulsi Prajna 1978 07
Author(s): Shreechand Rampuriya, Nathmal Tatia, Dayanand Bhargav
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 32
________________ पाश्चात्य आचार विज्ञान का यह विवादात्मक प्रश्न भारतीय नैतिक चिन्तना के प्रारंभिक युग से ही विवाद का विषय रहा है । यद्यपि इस सम्बन्ध में भारत में उतनी बाल की खाल नहीं उतारी गई, जितनी की पश्चिम में । जैनागम सूत्रकृतांग में बौद्ध विचारणा की हेतुवाद सम्बन्धी धारणा का रोचक उपहास प्रस्तुत किया गया है । बौद्धागम मज्झिमनिकाय में भी बुद्ध ने स्वयं को हेतुवाद का समर्थक माना है और निर्ग्रन्थ (जैन) परम्परा को फलवाद का समर्थक बताया है । यद्यपि निर्ग्रन्थ परम्परा को एकांत में फलवादी मानना एक असंगत धारणा है; क्योंकि पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती जैनागमों में हेतुवाद का भी प्रबल समर्थन किया गया है, जिस पर प्रमाणपूर्वक थोड़ी गहराई से विचार करना आवश्यक है । यह तो निर्विवाद सत्य है कि बौद्ध दर्शन हेतुवाद का समर्थक है। बौद्ध विचारणा नैतिक मूल्यांकन की दृष्टि से कर्ता के हेतु अथवा कार्य के मानसिक प्रत्यय को ही प्रमुखता देती है । धम्मपद के प्रारम्भ में ही बुद्ध कहते हैं – “सभी प्रकार के शुभाशुभ आचरण में मानसिक व्यापार ( हेतु ) ही प्राथमिक हैं, मन की दुष्टता और प्रसन्नता अर्थात् मन के भले बुरे होने पर ही कर्म भी शुभाशुभ हुआ करते हैं, और उसी से सुख-दुःख मिलता है । (धम्मपद १.२ ) । यही नहीं मज्झिमनिकाय में एक और प्रबल प्रमाण है जहाँ बुद्ध कर्म के मानसिक प्रत्यय की प्रमुखता के आधार पर ही बौद्ध परम्परा और निर्ग्रन्थ परम्परा में अन्तर भी स्थापित करते हैं । बुद्ध कहते हैं " मैं (निर्ग्रन्थों के) काय-दण्ड, वचन दण्ड और मन-दण्ड के बदले काय-कर्म, वचन - कर्म और मन कर्म कहता हूं और निर्ग्रन्थों की तरह काय- कर्म (कर्म के बाह्य स्वरूप) की नहीं, वरन् मन- कर्म ( कर्म के मानसिक प्रत्यय ) की प्रधानता मानता हूं 14 जैनागम सूत्रकृतांग भी इस तथ्य का समर्थन करता है कि बौद्ध परम्परा हेतुवाद की समर्थक है । ग्रन्थकार ने बौद्ध हेतुवाद का उपहासात्मक चित्र प्रस्तुत किया है । सूत्रकार प्रव्रज्या ग्रहण करने को तत्पर आर्द्रक कुमार के सम्मुख एक बौद्ध श्रमण के द्वारा ही बौद्ध दृष्टिकोण को निम्न शब्दों में प्रस्तुत करवाते हैं "खोल के पिण्ड को मनुष्य जानकर भाले से छेद डाले और उसको आग पर सेके अथवा कुमार जानकर तुमड़े को ऐसा करे तो हमारे मत के अनुसार प्राणिवध का पाप लगता है । परन्तु खोल का पिण्ड मानकर कोई श्रावक मनुष्य को भाले से छेदकर आग पर सेकें अथवा तुमड़ा मानकर कुमार को ऐसा करे तो हमारे मत के अनुसार उसको प्राणिवध का पाप नहीं लगता है" । मज्झिमनिकाय और सूत्रकृतांग के उपरोक्त सन्दर्भों के आधार पर यह सिद्ध होता है कि बौद्ध नैतिकता हेतुवाद का समर्थन करती है, दूसरे शब्दों में उसके अनुसार कर्म की शुभा - शुभता का आधार कर्ता का आशय है, न कि कर्म परिणाम । फिर भी हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि सैद्धान्तिक दृष्टि से हेतुवाद का समर्थन करते हुए भी व्यवहारिक रूप में बौद्ध 4. मज्झिमनिकाय, सुत्त 56 5. सूत्रकृतांग - नालन्दा का एक प्रसंग ११२ Jain Education International For Private & Personal Use Only तुलसी प्रज्ञा www.jainelibrary.org

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