Book Title: Tulsi Prajna 1978 07
Author(s): Shreechand Rampuriya, Nathmal Tatia, Dayanand Bhargav
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 23
________________ आचार्य कुन्दकुन्द जैन दार्शनिक साहित्य के पुरस्कर्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं । विद्वानों इनका समय ईसा की प्रथम शताब्दी निश्चित किया है । अतः शौरसेनी प्राकृत में ग्रन्थ लिख कर जैन दर्शन को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने वाले ये प्रथम आचार्य हैं। इनकी अब तक 20-25 रचनाएं प्राकृत भाषा में उपलब्ध हो चुकी हैं। उनमें 'प्रवचनसार ' ' समयसार' एवं 'पंचास्तिकाय' ये तीन ग्रन्थ विशाल हैं और जैन दर्शन को समझने की कुंजी हैं । विद्वत् जगत् में इनका पर्याप्त प्रचार हुआ है । कुन्दकुन्द की अन्य रचनाएं भी यद्यपि अध्यात्म की दृष्टि से पर्याप्त महत्त्वपूर्ण हैं, किन्तु उनका अधिक प्रचार नहीं हुआ है । 'नियमसार' उनमें से एक है । 'नियमसार' का वैशिष्ट्य + डा० प्रेम सुमन जैन 'नियमसार' के यद्यपि तीन संस्करण उपलब्ध हैं, किन्तु इसकी मूल गाथाओं का आलोचनात्मक संशोधन अभी तक नहीं हुआ है । डा० उपाध्ये ने 'प्रवचनसार' की भूमिका में इस ग्रन्थ के सम्बन्ध में संक्षेप में कुछ परिचय दिया है । उसके अतिरिक्त इस ग्रन्थ के विषय में कोई गवेषणात्मक लेख भी मेरे देखने में नहीं आया । जबकि 'प्रवचनसार' आदि ग्रन्थों पर भारतीय एवं विदेशी विद्वानों ने पर्याप्त प्रकाश डाला है । कुन्दकुन्द के ग्रन्थों के प्रसिद्ध टीकाकारों ने भी इस ग्रन्थ पर टीका नहीं लिखी और न ही अपनी टीकाओं में 'नियमसार' का कहीं उल्लेख किया है । ग्रन्थभण्डारों में भी 'नियमसार' की हस्तलिखित प्रतियों की संख्या अत्यल्प है । राजस्थान के ग्रन्थ भण्डारों में दो मूलप्रतियां एवं तीन प्रतियां टीका सहित उपलब्ध हैं । इससे स्पष्ट है कि 'नियमसार' किन्हीं कारणों से पठन-पाठन के आकर्षण का केन्द्र नहीं रहा है । फिर भी विषय की मौलिकता और प्रतिपादन में नियमसार का महत्त्व कम नहीं है । ग्रन्थकार : नियमसार में कुल 187 प्राकृत की गाथाएं हैं। गाथाओं की भाषा, शैली एवं विषय + जैनालाजी एवं प्राकृत विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अ० भा० संगोष्ठी में पठित अंग्रेजी लेख का रूपान्तर । 1. डॉ० उपाध्ये, प्रवचनसार, भूमिका, पृ० 23-24 2. (i) जैन ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय, बम्बई (ii) सेक्रेड बुक्स आफ दी जैन एवं (iii) स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट सोनगढ़ द्वारा प्रकाशित । खण्ड ४, अंक २ Jain Education International For Private & Personal Use Only १०३ www.jainelibrary.org

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