Book Title: Pradyumna Charitra
Author(s): Somkirtisuriji, Babu Buddhmalji Patni, Nathuram Premi
Publisher: Bharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad

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Page 314
________________ प्रद्युम्न चरित्र ३०७ जन “जय जय” आदि मांगलिक शब्दों और स्तुतिमयी वाक्योंसे प्रभाव प्रगट करते थे और सियार सारंगी बीणा आदि बाजे उन्हें प्रसन्न करते थे ।५६-५८। हे भव्यजनों ! तुम्हें इन सब सुखोंको पुण्यके फल समझकर पापकार्य करना छोड़ देना चाहिये, और धर्मका संग्रह करना चाहिये ।५६। प्रद्युम्नकुमारने अपनी कामवती स्त्रियोंके साथ बहुतसे धनका बहुतसे वैभवका और बहुतसे भाई बन्धुओंका सुख उपभोग किया। संसारमें जितने भी सारभूत सुख थे, वे सब उन्हें प्राप्त हो गये । क्योंकि उनका पुण्य बहुत प्रबल था। और तीनों लोकोंमें ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं है, जो पुण्यसे प्राप्त न हो सकता हो ।६०-६१। तथा पापसे, कोई दुःख नहीं हैं जो नहीं भोगने पड़ते हों। ऐसे लोग पाप करने ही से होते हैं, जो अपना पेट भरनेके लिये ही रातदिन चिंतित रहते हैं, वस्त्र और भोजनके बिना धरतीमें पड़े रहते हैं, शरीर छिल जाता है, दूसरोंके घर नौकरीचाकरी करते हैं, रूप लावण्यरहित होते हैं, दीन होते हैं, बिन बान्धवोंके होते हैं, धूप और वायुकी सर्दी गर्मी सहा करते हैं, भाई बन्धुओंकी निंदा और जगह २ तिरस्कार सहते हैं ।६२-६४। इसप्रकार प्रद्युम्नकुमार पूर्वपुण्यके फलसे प्राप्त हुए नानाप्रकारके पंचेन्द्रियजन्य सुखोंका अनुभव करते थे। उन्होंने जो सुख भोगे, उनका वर्णन करनेके लिये बृहस्पतिके समान ऐसा कौन विद्वान है जो समर्थ हो ? धर्मसे सुख, निर्मल सज्जनता और सौम्यता प्राप्त होती है, ऐसा समझकर भव्य. जनोंको निरन्तर ही जिन धर्मका सेवन करना चाहिये ।६५-२६७।। इति श्रीसोमकीर्ति भाचार्यकृत प्रद्युम्नचरित्र सस्कृतप्रन्धके नवीन हिन्दीभाषानुवादमै प्रद्युम्न के पुण्यफलका वर्णन करने वाला बारहवां सर्ग समाप्त हुआ। • दूसरी मूल प्रतिमें यह श्लोक नहीं है, और बारहवें सर्गकी समाप्ति भी यहां नहीं है। पहली प्रतिमें जहां तेरहवां सर्ग समाप्त हुआ है वहां दूसरी बारहवां समाप्त हुआ है। इस तरह एक सर्गका अन्तर पड़ गया है। Jain Educat International For Privale & Personal Use Only www.Melibrary.org

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