Book Title: Pat Darshan
Author(s): Kalpana K Sheth, Nalini Balbir
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 101
________________ राजा सोचने लगा। जब तक समता नहीं होगी तो धर्मकार्य कैसे होंगे? वह आगे रास्ते चल पड़ा। क्रमशः छ: महीने बीत गए / सूर्यास्त का समय हो रहा था। एक विशाल वट वृक्ष देखते ही उसके नीचे रात्रि निर्गमन के लिए रुकने का सोचा। वृक्ष के पत्तों का संस्तारक तैयार किया। स्वयं की आलोचना करने लगा, अभी समता नहीं आई, अगर आई होती तो देवी खुद आकर मुझे मार्गदर्शन देती। राजा निद्राधीन हो गया। एक राक्षस वहां आकर कहने लगा, "अरे राजन्! राज्य के अहंकार से तूने मेरी स्त्री और धन छीन लिया था, वह कर्म अब उदय में आया है।" वह राजा को उठाकर चलने लगा। सोचने लगा कि इसका क्या करूं? स्वयं उसे खाऊं, समुद्र में डाल दूं, या उसके सहस्र टुकड़े कर दूं, फिर भी मेरा क्रोध शांत नहीं हो सकता है। उसने अपनी दैवी माया से लोहे के नुकीले कील उत्पन्न किये और जिस तरह धोबी कपड़े को पटक-पटक कर धोते हैं, उसी तरह वह राजा के शरीर को जोरों से पटकने लगा। फिर भी राजा को कषाय उत्पन्न न हुआ। राक्षस ने चार प्रहर राजा को विविध उपसर्ग किये, फिर भी राजा समता भाव से सहता रहा। राक्षस खुद थक गया और राजा को उसी वृक्ष के तले छोड़ आया। सुबह का समय हुआ। गोत्रदेवी प्रगट हुई और कहा, "हे राजन्! सोरठ प्रदेश में श्री पुंडरीक पर्वत है, वहां जाकर चारित्र ग्रहण करो। उस पर्वत की महिमा से सातवें दिन तुझे मोक्ष प्राप्त होगा।" देवी अदृश्य हो गई। वह सोरठ की ओर चलने लगा, वहां रास्ते में मुनिदर्शन हुए। मुनि की देशना से प्रतिबोधित होकर राजा ने चारित्र ग्रहण किया और क्रमशः कंडूऋषि पुंडरीकगिरि पहुंचे। ऋषभदेव की प्रतिमा की वंदना, पूजा की और एकाकी स्थल पर पहुंचकर सूर्य की आतापना ले रहे हैं। आज सातवां दिन है।" दोनों मित्र वार्तालाप कर रहे थे, तभी उन्हें केवलज्ञान उत्पन्न हो गया। अंततः केवली होकर कंडूमुनिजी ने सिद्धपदमोक्षपद प्राप्त किया। विमलगिरि, मुक्तिगिरि को भावपूर्वक वंदन। जूनागढ़ का नृप प्रभु दर्शन करके इन्द्र समीप आकर बैठा। उसने सौधर्म गणधर से सिद्धाचलजी का माहात्म्य पूछा। तब श्री वीर भगवंत ने कहा, "यह राजा के वंश में महिपाल नामक कुष्ठ रोगी राजा उत्पन्न होगा। उनका पूरा बदन कुष्ठ रोग से व्याप्त होगा और उसकी दुर्गंध से उसे नगर के बाहरी प्रदेश में रहना होगा। असाध्य वेदना उसे भुगतनी होगी। चैत्रमास का अष्टह्निक महोत्सव करने अनेक विद्याधर युगल शत्रुजय पहुंचे हुए हैं। एक विद्याधरी ने अपने स्वामी विद्याधर से कहा, "स्वामी हम दोनों सूर्यकुंड में स्नान करेंगे और बाद में ऋषभदेव की सूत्र पूजा विधि सम्पन्न करके ही वापिस घर लौटेंगे।" दोनों ने सूर्यकुंड में स्रान किया और सूर्यकुंड के पानी से शांतिकलश भरा। दोनों ऋषभदेव की मूर्ति के सन्मुख गये। उन्होंने सात्र-पूजा विधि शुरू की। शांतिकलश के जल से प्रभु की मणिमय मूर्ति का प्रक्षालन किया। भक्तिभाव पूर्वक विधि सम्पन्न की और शांतिकलश शांतिजल से भर दिया। दोनों ने वापिस घर की ओर प्रयाण किया। मार्ग में कुष्ठरोगी महिपाल की दर्दभरी चीख, आक्रन्द सुना। विद्याधरी ने करुणा से प्रियतम से इस विषयक पूछा, तब उसने बताया कि "यह महिपाल नामक कुष्ठरोगी नृप है। पूर्वकृत कर्मोदय जागृत हुआ है जो असाध्य रोग से पीड़ित है। मगर उसका एक उपाय है। अगर उसे सिद्धाचलजी स्थित सूर्यकुंड के जल का स्पर्श हो जाये तो यह रोग मिट सकता है, ऐसा मैंने मुनि से जाना है।" विद्याधरी के हर्ष की सीमा न रही। तुरन्त ही उसने विमान रुकवाया। शांतिकलश के शांतिजल से उसने नृप के शरीर पर छिटकाव किया, तो उसके अठारह प्रकार के कुष्ठरोग बाहर निकलने लगे और कहने लगे, "हे राजन्! अपना सात जन्मों से वैर था। मगर तुम्हारे इस सूर्यकुंड जलसे- शांतिकलश के शांतिजल के प्रभाव से अब हमारी शक्ति मंद हो गई है, जिससे अब हम नहीं रह पायेंगे।" और वे चले गये। राजा का रोग अदृश्य हआ और वह निरोगी हो गया। सर्वत्र हर्षोत्सव, हर्षोल्लास का महोत्सव होने लगा। एक बार चारण मुनि पधारे। राजा ने उन्हें आहार से प्रतिलाभित किया और कुष्ठ रोग का कारण पूछा। मुनि ने कहा, "इस जन्म से पूर्व सातवें जन्म में तूने मुनि का उपघात किया था, वह तेरे पाप कर्म क्रमशः क्षय होकर जो बचे थे, उससे तुझे कुष्ठरोग हुआ था।" मुनि का कथन सुनकर राजा को जातिस्मरण ज्ञान उत्पन्न हुआ। पूर्वभव प्रत्यक्ष देखा। 94 पटदर्शन

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