Book Title: Namaskar Swadhyay Prakrit Vibhag
Author(s): Dhurandharvijay, Jambuvijay, Tattvanandvijay
Publisher: Jain Sahitya Vardhak Sabha
View full book text ________________ 498 श्रीमद्हेमचन्द्रसूरिविरचितस्य प्राकृतद्वयाश्रयमहाकाव्यस्य सप्तमसर्गस्य संदर्भः। [प्राकृत कम्माई वोसिरन्ता, अतुट्टिरेणं तवेण सकन्ता / अफुडिअ अचलिअमहिमा आयरिआ दितु ते बोहिं // 63 // व्याख्या-कर्माणि व्युत्सृजन्तः आत्मनो दूरीकुर्वन्तः / ननु अनादिकालालीनकर्मणां कथं व्युत्सर्ग इत्याह / अत्रोटिना अच्छिदुरेण / संपूर्णेनेति यावत् / तपसा शक्नुवन्तः सामर्थ्य बिभ्रतः / 5 अस्फुटितः अन्यौजसा अखण्डितः अत एव अचलितः अकम्पितः / स्थिर इत्यर्थः / महिमा माहात्म्यं येषां ते तथा / ते सर्वप्रसिद्धा आचार्या बोधिं जिनधर्मावाप्तिं ददतु प्रयच्छन्तु // 63 // फुट्टिअमोहो लोओ चल्लइ अपमिल्लिअबओ मोक्खे / जेहिं अपमीलिअच्छं पेच्छामो ते उवज्झाए // 64 // व्याख्या-यैः कृत्वा स्फुटितः विदारितो मोहो येन स तथा / अपमीलितव्रतः उबुद्धचारित्रः 10 लोको मोक्षे चलति गच्छति / तान् उपाध्यायान् अपमीलिताक्षं निर्निमेषनयनं यथा भवति एवं पश्यामः / उपाध्यायदर्शने वयं सतृष्णा इत्यर्थः // 64 // ___ अणउम्मिल्लिअ नाणोम्मीलणआ हरिसपसविरा लोए / . सुअ जलमोज्झाया पवरिसन्तु वित्थरिअगुणभरिआ // 65 // - व्याख्या- अनुन्मीलितम् अनुभूतं यज्झानं तस्य उन्मीलना व्यञ्जकाः / हर्ष प्राणिप्रमोद 15 प्रसवितारः जननशीलाः। विस्मृताः सर्वत्र प्रसृता ये गुणास्तैर्मृताः निचिता उपाध्याया लोके जनमध्ये श्रुतमेव निर्मलपावित्र्यहेतुत्वाद् जलं प्रवर्षन्तु / निर्वृतिफलोत्पत्तये अस्मभ्यं प्रयच्छन्त्वित्यर्थः // 65 // नो रूसइ नो तूसइ जेऊण मणं लयम्मि जो नेन्तो। मोत्तुं भवं विणीअं तं साहुजणं नमसामि // 66 // व्याख्या-यो भवं मोक्तुं त्यक्तुं मनो जित्वा वशीकृत्य लये साम्यावस्थायां नयन् सन् नो 20 रुष्यति अमित्रे रोपं न करोति / नो तुष्यति, मित्रे तोषं न करोति / तं विनीतं जितेन्द्रियं साधुजनं नमस्यामि // 66 // ____ अखंड तपथी कर्मोने दूर करता, सामर्थ्यने धारण करता, तथा अखंड अने अचल छे महिमा जेमनो एवा आचार्यो बोधि-सम्यक्त्व आपो // 63 // ( उपाध्याय भगवंत-) .. 25 जेमना लीधे मोह दूर थवाथी अने चारित्र प्रगट थवाथी लोको मोक्ष तरफ प्रयाण करे छे ते उपाध्याय भगवंतोतुं अमे अनिमेष नयने दर्शन करीए छीए // 64 // अप्रगट ज्ञानने व्यक्त करनारा, हर्षने फेलावनारा तथा विस्तृत गुणोथी परिपूर्ण एवा उपाध्याय भगवतो लोकोमां श्रुतज्ञानरूपी जलनी वृष्टि करो // 65 // . .. ( साधु भगवंत-) 30 ..... संसारनो त्याग करवा माटे मननो जय करीने मनने लय पमाडता जेओ शत्रु उपर रोष करता नथी तेमज जेओ मित्र उपर राग धरता नथी ते साधु जनोने हुं नमस्कार करूं छु / 66 / /
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