Book Title: Mahabandh
Author(s): Fulchandra Jain Shatri
Publisher: Z_Acharya_Shantisagar_Janma_Shatabdi_Mahotsav_Smruti_Granth_012022.pdf

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Page 10
________________ महाबंध १३५ ३. आबाधाकाण्डक प्ररूपणा तीसरा अनुयोग द्वार आबाधाकाण्डक प्ररूपणा है। आयुकर्म को छोडकर शेष कर्मों का जितना उत्कृष्ट स्थितिबन्ध हो उसकी स्थिति के सब समयों में वहाँ प्राप्त आबाधा के समयों का भाग देनेपर जितना लब्ध आवे उतने समयों का एक आबाधाकाण्डक होता है। अर्थात् उत्कृष्ट स्थितिबन्ध से लेकर उत्कृष्ट स्थिति में से जितने समय कम हुए हों वहां तक स्थितिबन्ध के प्राप्त होनेपर उस सब स्थितिबन्ध सम्बन्धी विकल्पों की उत्कृष्ट आबाधा होती है। अतः इन्हीं सब स्थितिबन्ध के विकल्पों का नाम एक आबाधाकाण्डक है। ये सब आबाधाकाण्डक प्रमाण स्थितिबन्ध के भेद पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण होते हैं। इसी विधि से अन्य आबाधाकाण्डक जानने चाहिए। यह नियम स्थितिबन्ध में वहीं तक समझना चाहिए जहाँ तक उक्त नियम के अनुसार आबाधाकाण्डक प्राप्त होते हैं। आयु कर्म के स्थितिबन्ध में उसकी आबाधा परिगणित नहीं की जाती, वह अतिरिक्त होती है, इसलिए कर्म भूमिज मनुष्य और तिथंचों में उत्कृष्ट या मध्यम किसी भी प्रकार की आयु का बन्ध होने पर आबाधा पूर्व कोटि के त्रिभाग से लेकर आसंक्षेपाद्धाकाल तक यथा सम्भव कुछ भी हो सकती है। नारकियों, भोगभूमिज तिर्यंचों और मनुष्यों तथा देवों में भुज्यमान आयु में छह महिना अवशिष्ट रहने पर वहाँ से लेकर आसंक्षेपाद्धाकाल तक आबाधा कुछ भी हो सकती है। अतः आयुकर्म में उक्त प्रकार के आबाधाकाण्डकों के सम्भव होने का प्रश्न ही नहीं उठता। ३. अल्पबहुत्व प्ररूपणा इस अनुयोग द्वार में १४ जीवसमासों में जघन्य और उत्कृष्ट-आबाधा, आबाधास्थान, आबाधाकाण्डक, नानागुण हानिस्थान, एकगुण हानिस्थान जघन्य और उत्कृष्ट स्थितिबन्ध और स्थितिबन्धस्थान पदों के आलम्बन से जिस क्रम से इन पदों में अल्प बहुत्व सम्भव है उसका निर्देश किया गया है । ४. चौवीस अनुयोगद्वार आगे उक्त अर्थपद के अनुसार २४ अनुयोगद्वारों का आलम्बन लेकर ओघ और आदेश से स्थितिबन्ध को विस्तार के साथ निबद्ध किया गया है। अनुयोगद्वारों के नाम वही हैं जिनका निर्देश प्रकृतिबन्ध के निरूपण के प्रसंग से कर आये हैं। मात्र प्रकृतिबन्ध में प्रथम अनुयोग द्वार का नाम प्रकृतिसमुत्कीर्तन है और यहाँ उसके स्थान में प्रथम अनुयोगद्वार का नाम अद्धाच्छेद है । अद्धा नाम काल का है । ज्ञानावरणादि किस कर्म का जघन्य और उत्कृष्ट कितना स्थितिबन्ध होता है, किसकी कितनी आबाधा होती है और आबाधा को छोडकर जहाँ जितनी कर्मस्थिति अवशिष्ट रहती है उसमें निषेक रचना होती है, इस विषय को इस अनुयोगद्वार में निबद्ध किया गया है। शेष अनुयोगद्वारों में अपने-अपने नामानुसार विषय को निबद्ध किया गया है। सर्व स्थितिबन्ध और उत्कृष्ट स्थितिबन्ध में यह अन्तर है कि सर्वस्थितिबन्ध अनुयोगद्वार में उत्कृष्ट स्थितिबन्ध होनपर सभी स्थितियों का बन्ध विवक्षित रहता है और उत्कृष्ट स्थितिबन्ध अनुयोगद्वार में उत्कृष्ट स्थितिबन्ध होनेपर मात्र अन्त की उत्कृष्ट स्थिति परिगृहित की जाती है। यहाँ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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