Book Title: Lonkashahka Sankshipta Parichay
Author(s): Punamchandra, Ratanlal Doshi
Publisher: Punamchandra, Ratanlal Doshi

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Page 228
________________ ( 182) •सवाहिं अणुजुत्तिहिं, मतिमं पडिलेहिया / सव्वे अक्कंत दुक्खाय, अतो रूब्वे अहिंस्या // 6. . .. एयं खुणाणिणो सारं, जं नहिंसइ किंचणं / अहिंसा समयं चेव, एतावत्तं वियाणिया // 10 उंड्ढे अहेय तिरियं, जेकेइ तस थावरा / सव्वत्य विरति कुज्जा, संति णिव्वाण माहियं // 11 अर्थात्-पृथ्वी, अप, तेजस वायु, बनस्पति, बीज सहित तथा त्रस प्राणी, इस तरह छः कायरूप जीव कहे गये हैं, इनके सिवाय संसार में कोई जीव नहीं है इन रूव जीवों का दुःख अप्रिय है, ऐसा युक्तिओं से बुद्धिमान का देखा हुआ है / अहिंसा और समता ही मुक्ति मार्ग है, ऐसा समझ कर किसी जीव की हिसा नहीं करे, यही ज्ञानी का सार है। उर्ध्व अधो और तिर्यक दिशा में जो जीव रहने वाले हैं उनकी हिंसा से निवृत्ति करने को निर्वाण मार्ग कहा है। , (3) “दाणाण सेटे अभयप्ययाणं"। सूत्रकृतांग श्रु०२ अ०६। (4) पुन. सूत्र कृतांग श्रु० 2 अ० 17 में “जे इमे तस थावरा पाणा भवंति तेणो सयं समारंभत्ति, णो अण्णे हि समारंभाति, अण्णं समारंभंतं न समणु जाणंति, इति से महतो आयाणाओ उवसंते उवसंते उवट्टिए, पडिविरते से भिक्खू / (5) ज्ञाता धर्म कथांग में मेघकंवार ने हार्थी के भव में एक पशु की दया की जिससे संसार परित् कर दिया, स्वरयं सूत्रकारने वहां पाणाणु सम्पयाए। आदि से संसार को परि मित कर देने का कारण दया ही बताया है /

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