Book Title: Lonkashahka Sankshipta Parichay
Author(s): Punamchandra, Ratanlal Doshi
Publisher: Punamchandra, Ratanlal Doshi

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Page 226
________________ (190) " पूजादिक सामग्री के प्रभाव से द्रव्य पूजा करणे असमर्थ है. इस वास्ते सामायिक पारके काया से जो कुछ फूल गंथना. दिक कृत होवे सो करे। प्रश्न-सामायिक त्याग के द्रव्य पूजा करणी उचित नहीं ? उत्तर-सामायिक तो तिसके स्वाधीन है / चाहे जिस वखत कर लेवे, परन्तु पूजा का योग उसको मिलना दुर्लभ है, क्यों कि-पूजा का मंडाण तो संघ समुदाय के आधीन है, कदेई होता है, इस वास्ते पूजा में विशेष पुण्य है / जैनात्वाद पृ०४१७) इस प्रकार वेही विजयानन्दजी यहां भावस्तव रूप सामा. थिक को त्याग कर युक्ति से सावद्य पूजा में प्रवृत्त होने की आज्ञा प्रदान करते हैं, एक सामायिक का उदय आना दुर्लभ कहता है तो दूसरा उल्टा पूजा का योग कठिन बताता है / इस प्रकार मन गढ़त लिख डालने वालों को क्या कहा जाय ? श्रीमान् विजयानन्द सूरि के मन्तव्यानुसार तो सामायिक में ही फूल गूंथ लेने चाहिये, क्योंकि इन्हीं का कथन (सम्यक्त्व शल्योद्धार में ) है कि-फूलों से पूजना फूलों की दया करना है। आश्चर्य तो यह है कि-सम्यक्त्व शल्योद्धार में तो इस प्रकार लिखा, और जैन तत्वादर्श में सामायिक में द्रव्य पूजा का निवेध भी कर दिया ! वास्तव में सामायिक उदय आना ही कठिन है इसमें मन वचन व शरीर के योगों को आरम्भादि सावध व्यापार से हटा कर निरारम्भ ऐसे सम्बर में लगाना होता है, जो कि उतने समय का चारित्र धर्म का आराधन है / गृहस्थ लोगों से

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