Book Title: Lonkashahka Sankshipta Parichay
Author(s): Punamchandra, Ratanlal Doshi
Publisher: Punamchandra, Ratanlal Doshi

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Page 239
________________ ( 203 ) // कवाली // बहाना धर्म का करके, कुशुरु हिंसा बढ़ाते हैं। बिम्ब पे, बील, दल, जल, फूल, फल माला चढ़ाते हैं // टेर। नेत्र के विषय पोषन को, रचे नाटक विविध विधि के / हिंडोला रास और साँजी, मूढ़ मण्डल मंडाते हैं // 1 // करावें रोशनी चंगी, चखन की चाह पूरन को। बता देवें भगति प्रभु की, आप मौजें उड़ाते हैं // 2 // लिखा है प्रकट निशि भोजन, अभक्ष्यों में तदपि भोंदू / रात्रि में भोग मोदक का, प्रभू को क्यों लगाते हैं // 3 // न कोई देव देवी की, मूर्ति खाती नजर आती। दिखा अंगुष्ट मूरति को, पुजारी' माल खाते हैं // 4 // कटावें पेड़ कदली के, बनावें पुष्प के बंगले / भक्ति को मुक्तिदा कहके, जीव बेहद सताते हैं // 5 // सरासर दीन जीवों के, प्राण लूटें करें पूजा। बतावें श्रङ्ग परभावन् कुयुक्ति षठ लगाते हैं // 6 // सुगुरु श्री मगन मुनिवर को, चरण चेरो कहे 'माधव' / धर्म के हेतु हिंसा जो, करें सो कुगति जाते हैं // 7 // ' पुजारी-पूजा, अरि, लेखक

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