Book Title: Kangda Jain Tirth
Author(s): Shantilal Jain
Publisher: Shwetambar Jain Kangda Tirth Yatra Sangh

View full book text
Previous | Next

Page 39
________________ (१४) पूजा रचाई गई और साथ ही सब ने स्तवन कीतन आदि का भी खूप आनन्द उठाया। मुनिराजों ने भावपूजा द्वारा अपनी आत्मा को आनंदित किया । इस अवसर पर वहाँ राजकीय और प्रजाकीय पुरुषों की भारी भीड़ लग गई थी। संघ ने उन से खूब प्रेम वार्तालाप किया। वहाँ विराजमान कुछ वृद्ध लोगों ने इस तीर्थ की बड़ी प्रशंसा की और तीर्थ सम्बन्धी अपनी जानकारी की कथा सुनाने लगे उन्हों ने बताया कि यह तीर्थ भगवान् श्री नेमिनाथ २२वें तीर्थकर के समय में कटौच वंशीय महाराजा सुशर्म चन्द्र के कर-कमलों से स्थापित हुआ था और कहने लगे कि यह भगवान् श्री आदिनाथ की जो प्रतिमा है वह बड़ी प्रभाविक है और किसी को बनाई हुई न होकर स्वयंभू है और अनादि है । इसका बड़ा भारी अतिशय चमत्कार है जो आज भी प्रत्यक्ष है । देखिये-भगवान के चरणों की सेवा करने वाली जो अम्बिका देवी (देवी की मूर्ति) है, इसके प्रक्षालन का पानी चाहे वह फिर एक हजार घड़ों जितना हो, भगवान् के प्रक्षालन के पानी के साथ, बिल्कुल पास पास होने पर भी कभी नहीं मिल जाता । मन्दिर के मुख्य गर्भागार में, चाहे कितना ही स्नात्र जल क्यों न पड़ा हो और फिर बाहिर से दरवाजे इस प्रकार बन्द कर दिये जावें कि एक कोड़ी भी अन्दर न जा सके तो भी क्षण भर में वह सब पानी सूख जायेगा। ऐसे और भी प्रभाव इस प्रतिमा के आज भी दीख रहे हैं। इस प्रकार वृद्ध लोगों की जबान से सब लोग तीर्थ महिमा सुन रहे थे कि इतने में राजा नरेन्द्रचन्द्र जो के प्रधान मनुष्यों ने उपाध्याय श्री की सेवा में संघ सहित दरबार में पधारने की विनति की। राजा नरेन्द्रचन्द बड़े न्यायो, सुशील, सद्गुणी और धर्म प्रेमी थे । यह विशुद्ध क्षत्रिय थे । इनका कुल सोमवंशीय कहलाता Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

Loading...

Page Navigation
1 ... 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104